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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश३०९धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदोंके अधीन होने का निर्देश३१३
तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश,,दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश,,
वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश३१०पौनर्भव विधि के लक्षण३१४
भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश,,मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश,,
लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश,,जयी के लक्षणों का निर्देश,,
साक्षी के भेदनको प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश३११जयी को जयपत्र देने का निर्देश,,
विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश,,प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश३१५
द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोगको ही प्रमाण मानने का निर्देश,,जीवित रहते हुये माता-पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश,,
मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश,,पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश,,
६ प्रकार के निर्णय का निर्देश३१२पिता की सभी पत्नियोंमें मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश,,
सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश,,स्वतन्त्रा-स्वतन्त्र का निर्णय,,
धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश,,स्वामित्व का निर्णय३१६
विवाद होने के कारणों का निर्देश,,विभाग-विचार३१७
अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद को उपेक्षा न करने का निर्देश३१३अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश,,
सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश,,
सौदायिक धन के लक्षण३१८
अविभाज्य धन के लक्षण,,