शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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| राजा को अपनी बुद्धि से नियोगी करने का और नियोगी का लोभ से अन्यथा करने पर दण्डयोग्य होने का एवं भ्राता आदि न होने पर कुछ कहने पर दण्ड योग्य होने का निर्देश | २८७ | असंदिग्ध उत्तर के लक्षण | २९१ |
| संदिग्ध उत्तर के लक्षण | " | ||
| दण्डयोग्य प्रतिवादी के लक्षण | " | ||
| ४ प्रकार के उत्तर | २९२ | ||
| सत्योत्तर के लक्षण | " | ||
| मिथ्योत्तर के लक्षण | " | ||
| कचहरी में बुलाने योग्य स्त्रियों का निर्देश | २८८ | मिथ्योत्तर के ४ प्रकार | " |
| प्रत्यवस्कन्दन के लक्षण | " | ||
| विवाद को लगाकर मर जाने पर पुत्र को विवाद करने का निर्देश | " | प्राङ्न्याय के लक्षण | २९३ |
| प्राङ्न्याय के ३ प्रकार | " | ||
| अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आने पर दण्ड देने का निर्देश | " | व्यवहार के ४ पाद | " |
| प्रथम निर्णय के योग्य न्याय वा विवाद का निर्देश | " | ||
| प्रतिभू (जमानतदार) के कृत्यों का निर्देश | " | एक विवाद में दो वादियों की क्रिया नहीं होने का निर्देश | २९४ |
| विवाद के साधनों की जांच कर लेने का निर्देश | २८९ | साधन के भेद | " |
| पक्ष के लक्षण | " | तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्त्व और छल के लक्षण | २९५ |
| भाषा (अर्जीदावा) के दोषों का निर्देश | " | विवादी को अपने-अपने साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश | " |
| पक्षाभास को छोड़ देने का निर्देश | २९० | जो दोष गुप्त हों उनको सभासद प्रकट करें, इसका निर्देश | " |
| अप्रसिद्ध के लक्षण | " | कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश | २९६ |
| निराबाध या निष्प्रयोजन के लक्षण | " | लिखित के दो प्रकारों का निर्देश | " |
| असाध्य या विरुद्ध के लक्षण | " | लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश | " |
| निरर्थक या निष्प्रयोजन के लक्षण | " | राजशासन के ३ प्रकार | " |
| दण्डनीय वादी के लक्षण | २९१ | साधनक्षम लेख्य के लक्षण | २९७ |
| उत्तर लेखन का निर्देश | " | साधनायोग्य लेख्य के लक्षण | २९८ |
| अच्छे लेख से फल का निर्देश | " |