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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश२७८पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश२८३
अर्थी के लिए राजा के कार्यों का निर्देश,,जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश२८४
लेखक के कृत्यों का वर्णन,,४ प्रकार के आसेधों का वर्णन,,
राजा को अन्यथा लेख लिखने वाले को दण्ड देने का निर्देश,,जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये राजा का निर्देश,,
राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश२७९अपराधियों को बुलाने के लिये असमर्थादि भृत्यों को न बुलाने का निर्देश२८५
प्राड्विवाक शब्द के अर्थ का निर्देश,,हीनपक्षादि स्त्रियों को भी न बुलाने का निर्देश,,
व्यवहार पद का कथन,,निर्वैष्टुकाम (विवाहोद्यत) आदि को आसेध (बुलाने) का निषेध,,
राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध,,आने में असमर्थ लोगों को सवारी से बुलवाने का निर्देश२८६
राजा को छलादि का बिना निवेदन किये भी ग्रहण करने का निर्देश२८०अर्थी-प्रत्यर्थी के अन्य कार्य में व्यस्त रहने पर प्रतिनिधि करने का निर्देश,,
स्तोभक के लक्षण,,अप्रगल्भ आदि के उत्तर पक्ष को बन्धु आदि को कहने का तथा पक्ष ठीक-ठीक कह सकने पर ही विवाद को प्रवृत्त करने का निर्देश,,
सूचक के लक्षण,,जिस किसी से कार्य करा लेने पर वह उसी का किया समझने का निर्देश२८७
पञ्चाशत् (५०) छलों का वर्णन२८१नियोजित पुरुष को १६ वां भाग भृति (फीस) देने एवं अन्यथा फीस ग्रहण करने वाले को दण्ड देने का निर्देश,,
दश अपराधों का वर्णन२८२
राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन,,
दण्ड-योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश,,
आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश२८३
पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश,,