शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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|---|---|---|---|
| मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध | १८४ | रिपु-पीड़ित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश | १८७ |
| राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण | ,, | स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश | ,, |
| मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश | ,, | प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश | १८८ |
| मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश | १८५ | दण्ड के लक्षण | ,, |
| मित्रता होने के कारणों का निर्देश | ,, | दण्ड के भेद का निर्देश | ,, |
| मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण | ,, | दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश | ,, |
| भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण | ,, | घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश | १८९ |
| उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश | ,, | दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण | १८६ | उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश | ,, |
| शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश | ,, | सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश | १९० |
| शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश | ,, | राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश | ,, | धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश | ,, |
| मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने निषेध | ,, | पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश | १९१ |
| सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश | १८७ | स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश | ,, |
| शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश | ,, | राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश | ,, |
| मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश | ,, |