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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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१६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि का निषेध१५३विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश१५८
दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश,,२ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध,,
स्वामी के लक्षण,,ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध१५९
एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध,,शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश,,
वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश१५४बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश,,
वर के लक्षण,,उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण,,
कन्या के लक्षण,,बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश१६०
विद्या और धन का संचय करने का निर्देश१५५यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश,,
धनार्जन के उपयोगों का निर्देश,,दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश,,
धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश,,परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण,,
अवश्य धनार्जन करने का निर्देश,,पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण,,
धन के प्रभाव का निर्देश१५६आचारदत्त या ह्रीदत्त दान१६१
व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश१५७भीदत्त दान,,
मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश,,नष्टदान,,
लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश,,आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानना,,
आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश,,वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता,,
उचित व्यय करने का निर्देश१५८विचार करके स्नेह या द्वेष करना,,
भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश,,अतिक्रूरतादि का निषेध१६२
सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का