संग्रह पर लौटें




















शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
पृष्ठ 59स्थायी लिंक
( ६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| १६ वर्ष से ऊपर की अवस्था वाले पुत्रादि के ताड़नादि का निषेध | १५३ | विभाग कर देने का अन्यथा अनर्थ की सम्भावना का निर्देश | १५८ |
| दौहित्र आदि का पुत्रादिकों से बढ़कर पालन करने का निर्देश | ,, | २ सौत स्त्रियों एवं २ मादाओं को एक पुरुष या नर पशु के साथ एकत्र रखने का निषेध | ,, |
| स्वामी के लक्षण | ,, | ब्याजी धन या दिये ऋण धन का विभाग करने का निषेध | १५९ |
| एक शय्या पर सदा स्त्री के साथ सोने का निषेध | ,, | शाश्वत मैत्री रखने के लिये त्याज्य कर्मों का निर्देश | ,, |
| वर और मित्र की परीक्षा करने का निर्देश | १५४ | बिना साक्षी या ऋणपत्र लेख के ऋण न देने का निर्देश | ,, |
| वर के लक्षण | ,, | उत्तमोत्तमादिक पुरुषों के लक्षण | ,, |
| कन्या के लक्षण | ,, | बिना दान किये कभी कोई दिन व्यतीत न करने का निर्देश | १६० |
| विद्या और धन का संचय करने का निर्देश | १५५ | यथेष्ट दान-धर्म करने का निर्देश | ,, |
| धनार्जन के उपयोगों का निर्देश | ,, | दान से शत्रु को भी मित्र बन जाने का निर्देश | ,, |
| धन की अपेक्षा विद्या की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, | परलोक-सुखसाधन 'संविद्' दान के लक्षण | ,, |
| अवश्य धनार्जन करने का निर्देश | ,, | पारितोष्य, श्रियादत्त या यशोऽर्थक दान के लक्षण | ,, |
| धन के प्रभाव का निर्देश | १५६ | आचारदत्त या ह्रीदत्त दान | १६१ |
| व्यवहार में लेख की आवश्यकता का निर्देश | १५७ | भीदत्त दान | ,, |
| मित्रता के नाते बिना ब्याज के भी धन देने का निर्देश | ,, | नष्टदान | ,, |
| लिखा-पढ़ी के साथ सूद पर धन देने का एवं अन्यथा रीति से न देने का निर्देश | ,, | आराध्य देव को सर्वोत्कृष्ट मानना | ,, |
| आहारादि में लज्जा-त्याग का निर्देश | ,, | वशीकर वस्तुओं में दान तथा सरलता | ,, |
| उचित व्यय करने का निर्देश | १५८ | विचार करके स्नेह या द्वेष करना | ,, |
| भार्या आदि की रक्षा करने का निर्देश | ,, | अतिक्रूरतादि का निषेध | १६२ |
| सस्त्रीक प्रौढ़ पुत्रों को धन का |
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( १० )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| अतिक्रूरता आदि से अनिष्ट फल | १६२ | हिंस्र पुरुषादि की उपेक्षा करने का निषेध | १६६ |
| अपने को अधिक श्रेष्ठ न मानना | ” | चुगुलखोरी आदि दोषों से गुणियों के गुणों के ढंक जाने का निर्देश | ” |
| देवादिकों पर प्रभुत्व रखने का निषेध | १६३ | बाल्यावस्था आदि में मां आदि के मरने में महापातक के फल का निर्देश | ” |
| देवादिकों के तिरस्कार उचित नहीं | ” | दुःखप्रद विषयों का निर्देश | ” |
| युवती स्त्री, धन तथा पुस्तक को परहस्तगत करने का निषेध | ” | सुखकारक न होनेवाली ६ बातों का निर्देश | ” |
| अल्प कारण से बड़े अर्थ का एवं अधिक धन-व्यय होने से कीर्ति के त्याग का निषेध | ” | जीवन्मुक्त, खल या पशु के तुल्य के लक्षण | १६७ |
| बीर सैनिकों के दुर्वचन भी सहना | ” | खल पुरुष के लक्षण | ” |
| विनोद में भी दुखी करनेवाले वचन बोलने का निषेध | १६४ | आशाबद्ध लोगों के लिये जगत् की सम्पूर्ण वस्तु की प्राप्ति से भी कमी बोध होने का निर्देश | ” |
| कहने का असर न हो वाले से कुछ भी न कहने का निर्देश | ” | धूर्त पुरुष के कर्मों का निर्देश | ” |
| बुरे व्यसनों से अलग न करने वाले नीच की नृशंसता | ” | प्रीतिकारक व दुःखदायी पुत्र के लक्षण | ” |
| कुमित्र के लक्षण | ” | प्रीति देनेवाली स्त्री के लक्षण | १६८ |
| कठोर वचन से मित्र के शत्रु बन जाने का निर्देश | ” | आनन्ददायिनी तथा दुःखदायिनी माता के लक्षण | ” |
| स्वबलाधिक शत्रु को कन्धे पर भी ले चलने का निर्देश | ” | आनन्ददायक पिता के लक्षण | ” |
| 'मनुष्य का भूषण सुजनता है' इसका निर्देश | १६५ | मित्र के लक्षण | ” |
| अश्वादिकों में वेगादिक गुणों की भूषणता तथा अन्यथा (विपरीत) होने पर दूषणता का निर्देश | ” | मानहानिकारक कार्यों का निर्देश | ” |
| एक ही नायक आदि से ही परिवार आदि की शोभा का निर्देश | ” | मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संसर्ग रखने का निषेध | १६९ |
| दुःखकारक कार्यों का निर्देश | ” | ||
| स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश | ” |
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( ११ )
| विषय एवं निर्देश | पृष्ठ | विषय एवं निर्देश | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय | १६९ | सतर्कता से व्यवहार करने का निर्देश | १७२ |
| व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का निर्देश | ” | दूर रहते हुई भी समीपस्थ की भांति कार्य करनेवालों का निर्देश | १७३ |
| अधिक व्ययवाले कार्यों को न करने तथा लाभवाले कार्यों को करने का निर्देश | १७० | वेदादि के पण्डितों का बिना नीतिशास्त्र के चतुर न बनने का निर्देश | ” |
| तपस्यादि में प्रतिनिधि बनाने में हितकारिता के अभाव का निर्देश | ” | प्रथम निर्धनतादि के बाद धनी आदि होने में सुख-प्राप्ति का निर्देश | ” |
| मधुरभोजी आदिको निर्धनता आदि की इच्छा रखने का निर्देश | ” | मृतापत्यता आदि से अनपत्यता आदि की श्रेष्ठता का निर्देश | ” |
| मूर्ख जनों के कृत्य | १७१ | प्रथम सुखकर पश्चात् दुःखकर विषयों का निर्देश | १७४ |
| सत्त्वगुणी तेज की सर्वाधिक श्रेष्ठता का निर्देश | ” | कुमन्त्री आदिकों से राजादिकों के नाश का निर्देश | ” |
| स्वकर्म से ब्राह्मण की सर्वाधिक महत्ता का निर्देश | ” | शिक्षानुसार हस्त्यादि का सद्गुणादि के धारण करने का निर्देश | ” |
| स्वधर्मस्थ ब्राह्मण से क्षत्रियादि के डरने का निर्देश | ” | अधिकार प्राप्त होने पर स्वयं प्राप्त होनेवाली ३ बातें | ” |
| धर्म को हानि न पहुँचानेवाली वृत्ति की श्रेष्ठता | ” | गृहस्थियों के सुखदायक विषयों का निर्देश | १७५ |
| कृषिवृत्ति की सर्वाधिक उत्तमता | १७२ | अन्तःपुर में नियुक्त करने योग्य पुरुषों के लक्षण | ” |
| भिक्षा की अधमता तथा कश्चित् भिक्षा व सेवा की भी उत्तमवृत्तिता | ” | समय बांधकर कार्य करने आदि का एवं अर्थ और धर्म में आत्मादि की नियुक्ति करने का निर्देश | ” |
| आश्चर्य्यादि कर्मों से महाधनी न बन सकने का निर्देश | ” | प्रवास के समय में सुखदायी अनपत्य भार्य्यादि ६ का निर्देश | ” |
| बिना राजसेवा के विपुल धनप्राप्ति न होने एवं राजसेवा की अतिशय कठिनता का निर्देश | ” | ||
| राजाओं के साथ सर्प की भांति | ” |
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( १२ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा को भी शान्त घोड़े आदि से भी बाजार के अन्दर न जाने का निर्देश | १७६ | बिना जज की आज्ञा के वादी-प्रतिवादी के विषय में सत्यासत्यादि बातें न कहने का निर्देश | १७९ |
| पथिकों को यात्रा के समय कर्त्तव्या-कर्त्तव्य विषयों का निर्देश | ” | अन्य के विवाद को ग्रहण कर किसी के संग विवाद न करने का निर्देश | ” |
| शीघ्र वृद्धता लानेवाले विषयों का निर्देश | ” | बिना शास्त्रज्ञान के न करने योग्य विषयों का निर्देश | १८० |
| प्रिय होने के उपाय | ” | पारतन्त्र्य से बढ़कर दुःख और स्वतन्त्रता से बढ़कर सुख न होने का निर्देश | ” |
| अप्रिय होने के कारणों का निर्देश | ” | प्रत्यक्षादि ४ प्रमाणों से व्यवहार ज्ञान होने का निर्देश | ” |
| स्तुति से देवता के वशवर्ती होने का निर्देश | ” | मित्र और शत्रु के प्रकारों का निर्देश | १८१ |
| स्वदुर्गुणों का स्वयं विचार करने का निर्देश | १७७ | ४ पादों से युक्त उत्तम मित्र के लक्षण | ” |
| महान् पुरुष के लक्षण | ” | बैरभाव रखनेवालों के दो लक्षणों का निर्देश | १८२ |
| साधु पुरुष तथा खल पुरुष के लक्षण | ” | परम शत्रु और एकतरफा शत्रु भाइयों के लक्षण | ” |
| कलहकारक क्रीडा आदि करने का निषेध | १७८ | राजाओं की परस्पर कृत्रिम-मित्रता का निर्देश | ” |
| मित्र के प्रति कर्त्तव्याकर्त्तव्य विषयों का निर्देश | ” | सहज मित्र कहलानेवालों का निर्देश | १८३ |
| बलवान के प्रति विपरीत बातें न करने का निर्देश | ” | विद्यादि ५ की सहज मित्रता का निर्देश | ” |
| मनुष्य को आपत्ति पड़ने पर कर्त्तव्य कर्मों का निर्देश | ” | सार्थक पुत्र के लक्षण | ” |
| वृद्धजनों के अनुकूल वचन-बोलने का एवं किसी की स्त्री को घूर कर न देखने का निर्देश | १७९ | स्वाभाविक शत्रु के लक्षण | ” |
| अन्य के अपराधी बालक को दण्ड न देने का निषेध | ” | परस्पर शत्रु कहलानेवालों का निर्देश | ” |
| ग्राम को छोड़कर अन्यत्र वास करने की अवस्थाओं का निर्देश | ” | मूर्ख पुत्रादिकों की शत्रु संज्ञा का निर्देश | ” |
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( १३ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मूर्खों के लिए उपदेश देने का निषेध | १८४ | रिपु-पीड़ित प्रजाओं का साम-दान से संग्रह करने का निर्देश | १८७ |
| राजाओं के स्वाभाविक शत्रु-उदासीन-मित्र राजाओं के लक्षण | ,, | स्वप्रजाओं का साम-दान से पालन का निर्देश | ,, |
| मित्र और शत्रु राजाओं के प्रति राजाओं के आचरण का निर्देश | ,, | प्रजाओं के साथ दण्ड तथा भेद के प्रयोग से राज्य-नाशका निर्देश | १८८ |
| मित्रादि के प्रति सामादिकों का विचार स्वयुक्तियों से करने का निर्देश | १८५ | दण्ड के लक्षण | ,, |
| मित्रता होने के कारणों का निर्देश | ,, | दण्ड के भेद का निर्देश | ,, |
| मित्र के लिये साम तथा दान वाक्यों के लक्षण | ,, | दण्ड के प्रभाव एवं राजा को धर्मरक्षार्थ दण्डधर होने का निर्देश | ,, |
| भेद तथा दण्ड-वाक्यों के लक्षण | ,, | घमण्डी आदि गुरुजनों को भी दण्ड देने का निर्देश | १८९ |
| उदासीन के शत्रु बनने का निर्देश | ,, | दुष्टों की हिंसा को अहिंसा मानने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के प्रति सामवाक्य के लक्षण | १८६ | उचितानुचित दण्ड देने से राजा के इष्टानिष्ट-फलकथन का निर्देश | ,, |
| शत्रु के लिए दान का स्वरूप-निर्देश | ,, | सत्ययुगादि में दण्ड का अभाव एवं त्रेतादियुगों में क्रम से पूर्ण, पौन एवं अर्ध दण्ड देने का सकारण निर्देश | १९० |
| शत्रु के प्रति भेद का स्वरूप-निर्देश | ,, | राजा को युगप्रवर्तक होने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के प्रति दण्ड का स्वरूप-निर्देश | ,, | धार्मिक तथा अधार्मिक प्रजाओं के होने के कारणों का निर्देश | ,, |
| मित्र, शत्रु तथा उदासीन राजाओं को बलवान् न होने देने निषेध | ,, | पापी राजा के राज्य में समय पर वृष्टि न होने का निर्देश | १९१ |
| सामादिकों को करने में क्रम का निर्देश | १८७ | स्त्रैण और क्रोधी होना राजा को निषिद्ध होने का निर्देश | ,, |
| शत्रुभेद से सामादिकों की व्यवस्था का निर्देश | ,, | राजा को काम-क्रोध त्याग करने का निर्देश | ,, |
| मित्र के लिये केवल साम-दान के प्रयोग का निर्देश | ,, |
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( १४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| काम, क्रोध तथा लोभ त्याग कर दण्ड देने का निर्देश | १९१ | पतली रस्सी या छड़ी आदि से मारने योग्य के लक्षण | १९६ |
| 'राजा ऊपर से क्रूर होकर दण्ड देवे' इसका निर्देश | ,, | नीच कर्म कराने योग्य अपराधी का निर्देश | ,, |
| चुगलखोरों से देश नष्ट होने का निर्देश | १९२ | वध की शिक्षा कदापि न देने का निर्देश | ,, |
| उत्तम राजा के लक्षण तथा स्वयं दोषमुक्त होने का निर्देश | ,, | अपराधी के असहाय आदि को दण्ड न देना | ,, |
| अपराध के ४ भेद पुनःप्रत्येक के दो दो भेदों का निर्देश | ,, | देशनिष्काशन योग्य अपराधी | १९८ |
| पुनः उक्त अपराधोंके २ भेद एवं सभी अपराधों के पुनः ४ भेदों का निर्देश | ,, | मार्ग-संरक्षण योग्य का निर्देश | १९९ |
| मानंसिकादि ४ अपराधों की परीक्षा का निर्देश | १९३ | संसर्ग से दूषित को दण्ड देकर सन्मार्ग की शिक्षा देने का निर्देश | ,, |
| दण्ड के योग्य पुरुषोंके लक्षण | ,, | राजादिकों से बिगाड़ करनेवाले को शीघ्र नष्ट कर देने का निर्देश | ,, |
| उत्तम पुरुष के विषय में प्रथमादि अपराधों के दण्डों का एवं अन्त में जेल देने का निर्देश | ,, | गणों की दुष्टता करने पर उपाय | ,, |
| अधर्मशील राजा को सदैव भय दिलाने को प्रजा के लिये निर्देश | ,, | ||
| संरोध और नीच कर्म के योग्य पुरुष के लक्षण | १९४ | अधर्मशील राजा और प्रजा के तत्काल नष्ट हो जाने का निर्देश | २०० |
| शास्त्रोक्त दण्डनीय पुरुषों के लक्षण | ,, | ||
| आजीवन बन्धन योग्य पुरुष के लक्षण | ,, | माता आदि के भरण-पोषण का त्याग करनेवाले के लिये दण्ड का निर्देश | ,, |
| मार्गों पर झाडू लगाने योग्य पुरुष के लक्षण | १९५ | उत्तमादि साहस दण्ड के एवं पण आदि के लक्षण | २०१ |
| अधम पुरुषों के बारम्बार अपराध करने पर दण्ड का प्रकार | ,, | कोश के लक्षण | ,, |
| धनवर्ग से अपराध करने पर दण्ड का निर्देश | ,, | सुखप्रद कोश का निर्देश | ,, |
| दुःखप्रद कोश का निर्देश | ,, | ||
| बन्धन तथा ताडन योग्य के लक्षण | १९६ | अन्यायोपार्जित कोश के दुष्टफलों का निर्देश | २०२ |
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( १५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| सुपात्र तथा अपात्र के लक्षणादि का निर्देश | २०२ | मूर्ख के लक्षण | २०७ |
| अधर्मशील राजा के धन को हर लेने का निर्देश | ,, | राजा को परीक्षकों से स्वयं रत्न की परीक्षा कराने का निर्देश | ,, |
| शत्रु के अधीन राज्य होने के कारणों का निर्देश | ,, | हीरा आदि नव महारत्नों का निर्देश | २०८ |
| देवोत्तर-संपत्ति पर कर लगाकर धन न बढ़ाने का निर्देश | ,, | नवरत्नों के वर्ण और नवग्रहों का निर्देश | ,, |
| आपत्ति में अधिक कर बढ़ाने का निर्देश | ,, | सम्पूर्ण रत्नों में वज्र (हीरा) रत्न की श्रेष्ठता का निर्देश | २०९ |
| आपत्तिरहित होने पर सूद सहित धन वापस करने का निर्देश | २०३ | श्रेष्ठ रत्नों के लक्षण | ,, |
| प्रबल दण्ड से अनिष्ट फल | ,, | असत् रत्न के लक्षण | ,, |
| कोश संग्रह करने का प्रमाण | ,, | पुत्रार्थिनी को वज्र धारण करने का निषेध तथा बहुत दिन धारण किये मोती और मूंगा के हीन होने का निर्देश | ,, |
| प्रजा-संरक्षण के फल | ,, | दोषवर्जित रत्न के लक्षण | २१० |
| राष्ट्रवृद्धि के तीन कारण | २०४ | मूल्य अधिक और कम होने के कारण | ,, |
| नीति-निपुणता से कोशवृद्धि का यत्न करने का निर्देश | ,, | मौक्तिक की उत्पत्ति के स्थानों का निर्देश | ,, |
| श्रेष्ठादिनृप के ३ लक्षण | ,, | मोती के रंग और भेद का निर्देश | ,, |
| नीचादि धन के लक्षण | ,, | कृत्रिम मोती के निर्माण का स्थान | २११ |
| प्रजा के सन्ताप से सबंश राजा के नाश का निर्देश | २०५ | मोती की परीक्षाविधि-निर्देश | ,, |
| धान्य-संग्रह करने के प्रमाण का निर्देश | ,, | रत्नों का तुलामान निर्देश | ,, |
| संग्रह योग्य धान्य आदि की परीक्षा का निर्देश | ,, | वज्र का मूल्य-विचार | २१२ |
| ओषधि आदि सब वस्तुओं का संचय करने का निर्देश | २०६ | काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश | २१३ |
| संगृहीत धन की यत्न से रक्षा करने का निर्देश | ,, | माणिक्यादिकों का मूल्य-विचार | ,, |
| स्वकार्य में सदा सजग रहने का निर्देश | २०७ | गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश | ,, |
| संचय की रक्षा न कर सकने पर मूर्खता होने का निर्देश | ,, | अत्यन्त गुण वालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश | ,, |
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( १६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मोतियों की मूल्य-कल्पना | २१३ | काष्ठ आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश | २१९ |
| मोती के भेद और लक्षण | २१४ | भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश | २२० |
| सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश | ” | किसान को भागपत्र लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश | ” |
| सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भाव | ” | क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश | ” |
| स्वर्णादि धातुओं के गुण | २१५ | व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वाँ भाग लेने का निर्देश | ” |
| धातुओं के मूल्य का प्रमाण | ” | दूकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश | २२१ |
| अधिक मूल्य गौ के लक्षण | ” | राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश | ” |
| बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण | २१६ | राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश | ” |
| गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश | ” | राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश | २२२ |
| हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश | ” | नरक के लक्षण का निर्देश | ” |
| उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देश | ” | राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश | ” |
| देश-कालानुसार सबों की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश | २१७ | सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश | ” |
| शुल्क के लक्षण | ” | मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश | २२३ |
| वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश | ” | जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश | ” |
| किसान से भाग ( मालगुजारी ) लेने का प्रमाण | २१८ | द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश | ” |
| उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण | ” | क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश | २२४ |
| तडागादिकों से संपन्न भूमि से प्राप्त राजभाग का तारतम्य निर्देश | ” | शूद्रादि के कर्मों का निर्देश | ” |
| रजतादियुक्त भूमि के लिये राज-भाग-नियम | २१९ | ||
| तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २०वाँ भाग कर लेने का निर्देश | ” | ||
| बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश | ” |
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( १७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश | २२४ | तर्क लक्षण | २२८ |
| ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश | ,, | सांख्य लक्षण | २२९ |
| द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश | ,, | वेदान्त लक्षण | ,, |
| गुरु का लक्षण | २२५ | योग लक्षण | ,, |
| मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश | ,, | इतिहास लक्षण | ,, |
| विद्या और कला के लक्षण | ,, | पुराण लक्षण | ,, |
| विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश | ,, | स्मृति लक्षण | ,, |
| वेदों के ६ अंगों का निर्देश | ,, | नास्तिक मत लक्षण | २३० |
| मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश | ,, | अर्थशास्त्र लक्षण | ,, |
| वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश | २२६ | कामशास्त्र लक्षण | ,, |
| मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण | ,, | शिल्पशास्त्र लक्षण | ,, |
| ऋग्वेद के लक्षण | ,, | अलङ्कार शास्त्र लक्षण | ,, |
| यजुर्वेद के लक्षण | ,, | काव्य लक्षण | २३१ |
| सामवेद के लक्षण | ,, | देशभाषा लक्षण | ,, |
| अथर्ववेद के लक्षण | ,, | अवसरोक्ति लक्षण | ,, |
| आयुर्वेद के लक्षण | २२७ | यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण | ,, |
| धनुर्वेद के लक्षण | ,, | देशादि धर्म लक्षण | ,, |
| गान्धर्ववेद के लक्षण | ,, | गान्धर्व वेदोक्त ७ कलायें | २३२ |
| तन्त्र या आगम के लक्षण | ,, | आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण | ,, |
| शिक्षा के लक्षण | ,, | धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण | २३३ |
| कल्प के लक्षण व भेद | ,, | पृथक् ४ कलाओं के लक्षण | २३४ |
| व्याकरण के लक्षण | २२८ | तडागकूपादि कलाओं के लक्षण | ,, |
| निरुक्त के लक्षण | ,, | ४ आश्रमों का नाम निर्देश | २३७ |
| ज्योतिष लक्षण | ,, | ४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश | ,, |
| छन्द लक्षण | ,, | स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश | २३८ |
| मीमांसा लक्षण | ,, | स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध | ,, |
| स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश | ,, | ||
| साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश | २४० | ||
| यथोक्त पतिसेवा से पतिलोक जाने का निर्देश | ,, |
२ शु० सूची
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( १८ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश | २४० | जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गृह के गृह बनाने के स्थान का निर्देश | २४७ |
| रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश | २४१ | ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश | ,, |
| पतिव्रता स्त्रियों के कर्त्तव्यों का निर्देश | ,, | मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश | ,, |
| पति के समान अन्य स्वामी और पति-सेवा समान अन्य सुख का निषेध | २४२ | मेर्वादिकों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का निर्देश | २४८ |
| शूद्र धर्म का निर्देश | ” | ध्यान योग में प्रतिमा की साधन-मुख्यता का निर्देश | ,, |
| संकर जाति के नियम का निर्देश | ” | बालु से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश | ,, |
| राजा को स्वर्णकारादिकों को सदा कार्य में नियुक्त करने निर्देश | २४३ | शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल | ,, |
| मदिरागृह को ग्राम से पृथक् रखने का निर्देश | २४४ | देव-प्रतिमा की शुभकारिता मानव-प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश | ,, |
| दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश | ,, | सात्त्विकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश | २४९ |
| वृक्षारोपण और पोषण के नियम | ,, | सात्त्विकी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश | ,, | राजसी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| बगीचा लगाने के स्थान का निर्देश | २४५ | तामसी प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश | ,, | अंगुलादिकों के प्रमाणों का निर्देश | २५० |
| वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय | ,, | वामनी, मानुषी, दैवी, राक्षसी प्रतिमाओं के लक्षण | ,, |
| वृक्षों के फल-पुष्प-वृद्धि का उपाय | ,, | स्त्री देवता तथा वामन भगवान की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | ,, |
| आरण्य-वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश | ,, | नर-नारायणादि की प्रतिमाओं की ऊँचाई का प्रमाण | ,, |
| कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश | २४६ | ||
| देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश | ,, |
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( १६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| चण्डी आदि की प्रतिमाओं की ऊँचाई के प्रमाण | २५० | अनेक भुजाओं की व्यवस्था | २५८ |
| असुरों की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | ,, | ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था | २५९ |
| बाल तथा कुमार भावकी प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण | २५१ | हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार | ,, |
| सत्ययुगादि-भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद | ,, | अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| ९ ताल प्रमाण ऊँची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश | ,, | सौख्य दायक प्रतिमा के लक्षण | ,, |
| रम्य प्रतिमा के लक्षण | २५३ | सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन | २६० |
| रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर | ,, | लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश | ,, |
| मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर | ,, | प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश | २६१ |
| अवयवों की आकृति का वर्णन | ,, | युगभेद से वर्णभेद का कथन | ,, |
| अवयवों के अन्तर का प्रमाण | २५४ | वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश | ,, |
| अवयवों की परिधि का प्रमाण | २५५ | युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश | ,, |
| प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण | २५६ | अनुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध | ,, |
| प्रतिमा के आसन का प्रमाण | २५७ | भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश | २६२ |
| योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण | ,, | वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश | ,, |
| देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण | ,, | गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण | २६३ |
| मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश | ,, | स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण | २६५ |
| प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश | ,, | सर्वों के मुख का प्रमाण | ,, |
| मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश | ,, | बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण | ,, |
| प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार | २५८ | शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण | २६६ |
| प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार | ,, | सप्त ताल प्रमाण की मूर्ति के अवयवों का प्रमाण | ,, |
| प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश | ,, | आसुरी आदि मूर्त्तियों के लक्षण | २६७ |
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( २७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शिल्पी को कभी मूर्तियों की वृद्ध-सदृश कल्पना न करने का निर्देश | २६८ | यज्ञ-सदृश सभा के लक्षण | २७३ |
| राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश | ” | सभा में सुननेवालों में वैश्यों के रहने का निर्देश | ” |
| मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध | ” | सभा में जाने का नियम | ” |
| प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालन करने का निर्देश | ” | सभा में निर्णय करनेवालों का क्रम-निर्देश | ” |
| राजा को प्रजा-सुख से सुखी और प्रजा-दुःख से दुखी होने का निर्देश | २६९ | निर्णयकों का तारतम्य | ” |
| शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण | ” | निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण | २७४ |
| शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षण | ” | धर्म का लक्षण | ” |
| व्यवहार-लक्षण | ” | अनुचिन्तन-प्रकार का निर्देश | ” |
| राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देश | ” | दश साधनों का निर्देश | ” |
| पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश | २७० | यज्ञतुल्य सभा के द्वितीय लक्षण का निर्देश | २७५ |
| राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश | ” | दशाङ्गों के कर्मों का पृथक् २ निर्देश | ” |
| स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश | ” | गणक तथा लेखक के लक्षण | ” |
| ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश | २७१ | धर्माधिकरण के लक्षण का निर्देश | ” |
| सभासद के लक्षण | ” | राजसभा में प्रवेश करने का प्रकार | २७६ |
| राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षण | ” | सभा में राजा के कृत्यों का निर्देश | ” |
| राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश | २७२ | राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश | ” |
| देश-जाति-कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश | ” | ||
| देश-जाति-कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश | ” | ||
| कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश | २७७ | ||
| न्यायादिकों के समय का निर्देश | ” | ||
| मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश | ” |
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( २१ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा के समक्ष कार्य निवेदन करने के प्रकार का निर्देश | २७८ | पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश | २८३ |
| अर्थी के लिए राजा के कार्यों का निर्देश | ,, | जब तक राजाज्ञा न हो तब तक प्रत्यर्थी को रोक देने का निर्देश | २८४ |
| लेखक के कृत्यों का वर्णन | ,, | ४ प्रकार के आसेधों का वर्णन | ,, |
| राजा को अन्यथा लेख लिखने वाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, | जिस पर अपराध की शंका या जो अपराधी हो उसी को बुलाने के लिये राजा का निर्देश | ,, |
| राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश | २७९ | अपराधियों को बुलाने के लिये असमर्थादि भृत्यों को न बुलाने का निर्देश | २८५ |
| प्राड्विवाक शब्द के अर्थ का निर्देश | ,, | हीनपक्षादि स्त्रियों को भी न बुलाने का निर्देश | ,, |
| व्यवहार पद का कथन | ,, | निर्वैष्टुकाम (विवाहोद्यत) आदि को आसेध (बुलाने) का निषेध | ,, |
| राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध | ,, | आने में असमर्थ लोगों को सवारी से बुलवाने का निर्देश | २८६ |
| राजा को छलादि का बिना निवेदन किये भी ग्रहण करने का निर्देश | २८० | अर्थी-प्रत्यर्थी के अन्य कार्य में व्यस्त रहने पर प्रतिनिधि करने का निर्देश | ,, |
| स्तोभक के लक्षण | ,, | अप्रगल्भ आदि के उत्तर पक्ष को बन्धु आदि को कहने का तथा पक्ष ठीक-ठीक कह सकने पर ही विवाद को प्रवृत्त करने का निर्देश | ,, |
| सूचक के लक्षण | ,, | जिस किसी से कार्य करा लेने पर वह उसी का किया समझने का निर्देश | २८७ |
| पञ्चाशत् (५०) छलों का वर्णन | २८१ | नियोजित पुरुष को १६ वां भाग भृति (फीस) देने एवं अन्यथा फीस ग्रहण करने वाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, |
| दश अपराधों का वर्णन | २८२ | ||
| राजा द्वारा ज्ञेय २२ पदों का वर्णन | ,, | ||
| दण्ड-योग्य वादी के लक्षणों का निर्देश | ,, | ||
| आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश | २८३ | ||
| पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश | ,, |
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( २२ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राजा को अपनी बुद्धि से नियोगी करने का और नियोगी का लोभ से अन्यथा करने पर दण्डयोग्य होने का एवं भ्राता आदि न होने पर कुछ कहने पर दण्ड योग्य होने का निर्देश | २८७ | असंदिग्ध उत्तर के लक्षण | २९१ |
| संदिग्ध उत्तर के लक्षण | " | ||
| दण्डयोग्य प्रतिवादी के लक्षण | " | ||
| ४ प्रकार के उत्तर | २९२ | ||
| सत्योत्तर के लक्षण | " | ||
| मिथ्योत्तर के लक्षण | " | ||
| कचहरी में बुलाने योग्य स्त्रियों का निर्देश | २८८ | मिथ्योत्तर के ४ प्रकार | " |
| प्रत्यवस्कन्दन के लक्षण | " | ||
| विवाद को लगाकर मर जाने पर पुत्र को विवाद करने का निर्देश | " | प्राङ्न्याय के लक्षण | २९३ |
| प्राङ्न्याय के ३ प्रकार | " | ||
| अपने बन्धु-बल के घमण्ड में आकर स्वयं न आने पर दण्ड देने का निर्देश | " | व्यवहार के ४ पाद | " |
| प्रथम निर्णय के योग्य न्याय वा विवाद का निर्देश | " | ||
| प्रतिभू (जमानतदार) के कृत्यों का निर्देश | " | एक विवाद में दो वादियों की क्रिया नहीं होने का निर्देश | २९४ |
| विवाद के साधनों की जांच कर लेने का निर्देश | २८९ | साधन के भेद | " |
| पक्ष के लक्षण | " | तत्त्व तथा छलानुसार से भूत तथा भव्य दो प्रकार एवम् तत्त्व और छल के लक्षण | २९५ |
| भाषा (अर्जीदावा) के दोषों का निर्देश | " | विवादी को अपने-अपने साधन प्रत्यक्ष दिखाने का निर्देश | " |
| पक्षाभास को छोड़ देने का निर्देश | २९० | जो दोष गुप्त हों उनको सभासद प्रकट करें, इसका निर्देश | " |
| अप्रसिद्ध के लक्षण | " | कूटसाक्षी और साक्ष्यलोपी को दूना दण्ड देने का निर्देश | २९६ |
| निराबाध या निष्प्रयोजन के लक्षण | " | लिखित के दो प्रकारों का निर्देश | " |
| असाध्य या विरुद्ध के लक्षण | " | लौकिक लिखित के ७ प्रकारों का निर्देश | " |
| निरर्थक या निष्प्रयोजन के लक्षण | " | राजशासन के ३ प्रकार | " |
| दण्डनीय वादी के लक्षण | २९१ | साधनक्षम लेख्य के लक्षण | २९७ |
| उत्तर लेखन का निर्देश | " | साधनायोग्य लेख्य के लक्षण | २९८ |
| अच्छे लेख से फल का निर्देश | " |
पृष्ठ 73स्थायी लिंक
( २३ )
| साक्षी के लक्षण और भेद का निर्देश | २९८ | ६० वर्ष से भोग में आती हुई वस्तु को किसी के द्वारा न छीने जा सकने का निर्देश | ३०४ |
| साक्षी की विशेष परीक्षा न करने के विषय | २९९ | आधि आदिका केवल भोग से नष्ट न होने का निर्देश | ३०५ |
| बालादिकों को साक्षी योग्य न होने का निर्देश | ,, | उपेक्षादि कारण से स्वामी को उसके फल प्राप्त न होने का निर्देश | ,, |
| साक्षी लेने में राजा को कालक्षेप न करने का निर्देश | ३०० | अब दिव्य कहने का निर्देश | ,, |
| प्रत्यक्ष साक्षी की साक्षी लेने का निर्देश | ,, | त्रिविध साधन के अभाव में तीन प्रकार की विधियों का निर्देश | ,, |
| दण्ड्य और नीच साक्षी के लक्षण | ,, | युक्ति के लक्षण | ,, |
| एक २ से साक्षी को कथन करने का निर्देश | ,, | कार्यसाधक हेतुओं के लक्षण | ,, |
| साक्षी लेने के प्रकारों का निर्देश | ३०१ | धन ग्रहण करने योग्य प्रतिवादी के लक्षण | ३०६ |
| लेख और साक्षी न मिलने पर भोग से ही विचार करने का निर्देश | ३०२ | जहां पर युक्ति भी असमर्थ हो, वहां पर एवं दुष्कर कर्म के लिये दिव्य करने का निर्देश | ,, |
| कुशलों और कुटिलों द्वारा बनावटी लेख कर लेने का निर्देश | ३०३ | दिव्य को न मानने पर 'धर्मतस्कर' होने का निर्देश | ,, |
| केवल साक्षियों से ही कार्यसिद्धि के न करने का निर्देश | ,, | दिव्य को स्वीकार करनेवाले के उत्तम फलों का निर्देश | ,, |
| केवल भोगों से ही कार्यसिद्धि न होने का निर्देश | ,, | दिव्य-निर्णय में पदार्थों का निर्देश | ३०७ |
| अनुचित शंका उपस्थित करनेवाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, | अग्नि दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| विपरीत शङ्का करने से अनवस्था होने का निर्देश | ,, | शर तथा घट दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| प्रामाणिक भोग के लक्षण | ,, | जल दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| केवल भोग बतानेवाले को चोर समझने का निर्देश | ३०४ | धर्माधर्म मूर्ति एवं तण्डुल दिव्यों के प्रकार का निर्देश | ३०८ |
| केवल आगम (लेख) के भी प्रबल न होने का निर्देश | ,, | शपथ दिव्य के प्रकार का निर्देश | ,, |
| अपराध-तारतम्य से दिव्यतारतम्य का निर्देश | ,, | ||
| दिव्य के निषेध का निर्देश | ३०९ |
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( २४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शिर के बिना दिव्य के अधिकारी का निर्देश | ३०९ | धिग्दण्ड और वाग्दण्ड इन दोनों को सभासदोंके अधीन होने का निर्देश | ३१३ |
| तप्त माष दिव्य के अधिकारी का निर्देश | ,, | दुबारा कार्य के आरम्भ करने में कारण का निर्देश | ,, |
| वादी के दिव्य को स्वीकार करने पर फिर साधन न पूछने का निर्देश | ३१० | पौनर्भव विधि के लक्षण | ३१४ |
| भाषापत्रिका होने पर दिव्य से शोधन करने का निर्देश | ,, | मन्त्री आदि को नियमविरुद्ध फैसला करने पर अर्थदण्ड देने का निर्देश | ,, |
| लौकिक साधन के अभाव में दिव्य देने का निर्देश | ,, | जयी के लक्षणों का निर्देश | ,, |
| साक्षी के भेदनको प्राप्त हो जाने पर शपथों से निर्णय करने का निर्देश | ३११ | जयी को जयपत्र देने का निर्देश | ,, |
| विवाहादिकों में साक्षी को ही निर्णय-साधन होने का निर्देश | ,, | प्रजा की अनुकूलता करनेवाले राजा के गुणों का निर्देश | ३१५ |
| द्वार और मार्ग करने इत्यादियों में भोगको ही प्रमाण मानने का निर्देश | ,, | जीवित रहते हुये माता-पिता के पुत्र को वृद्ध हो जाने पर भी स्वतन्त्र न होने का एवं उन दोनों में पिता की श्रेष्ठता का निर्देश | ,, |
| मानुषी और दैविकी क्रियाओं की व्यवस्था का निर्देश | ,, | पिता के अभाव में माता और माता के अभाव में भाई को श्रेष्ठ होने का निर्देश | ,, |
| ६ प्रकार के निर्णय का निर्देश | ३१२ | पिता की सभी पत्नियोंमें मातृवद् व्यवहार करने का निर्देश | ,, |
| सब के अभाव में निश्चय करने में राजा के प्रमाण होने का निर्देश | ,, | स्वतन्त्रा-स्वतन्त्र का निर्णय | ,, |
| धर्मशास्त्र के अविरोधपूर्वक राजा को नीतिशास्त्र को विचारने का निर्देश | ,, | स्वामित्व का निर्णय | ३१६ |
| विवाद होने के कारणों का निर्देश | ,, | विभाग-विचार | ३१७ |
| अधर्म में प्रवृत्त हुये राजा की सभासद को उपेक्षा न करने का निर्देश | ३१३ | अंशहारियों के क्रमनिर्णय का निर्देश | ,, |
| सौदायिक धन में स्त्री की स्वतन्त्रता का निर्देश | ,, | ||
| सौदायिक धन के लक्षण | ३१८ | ||
| अविभाज्य धन के लक्षण | ,, |
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( २५ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| जलादिकों से धन की रक्षा करनेवाले को दशवां भाग प्राप्त करने का निर्देश | ३१८ | स्वर्णकार की भृति का विचार | ३२२ |
| शिल्पी के लक्षण | ,, | धातुओं में मिलावट करने पर दूना दण्ड देने का निर्देश | ३२३ |
| नर्त्तकादियों का धनविभागविषयक निर्देश | ३१९ | दुर्ग-प्रकरण के आरम्भ में ऐरिण दुर्ग के लक्षण | ३२४ |
| चोरों का धनविभागविषयक निर्देश | ,, | पारिख तथा पारिघ दुर्ग के लक्षण | ,, |
| व्यापारी आदियों का धनविभागविषयक निर्देश | ,, | वनदुर्ग तथा धन्व दुर्ग के लक्षण | ,, |
| आपत्काल होने पर भी नवविध धनों को न देने का निर्देश | ,, | जलदुर्ग तथा गिरिदुर्ग के लक्षण | ,, |
| उत्तम साहस दण्ड के योग्य का निर्देश | ३२० | सैन्यदुर्ग तथा सहायदुर्ग के लक्षण | ,, |
| अस्वामिक धन को चोरों से लेनेवालों को दण्ड देने का निर्देश | ,, | ऐरिणादि दुर्ग का तारतम्य-निर्देश | ,, |
| त्यागयोग्य ऋत्विज और याज्य के लक्षण | ,, | सहाय तथा सैन्य दुर्गों की सब दुर्गों की साधनता का निर्देश | ३२५ |
| राजा को १२ वाँ या १६ वाँ लाभ पण्य में नियत करने का निर्देश | ,, | आपत्काल में अन्य दुर्गों के आश्रय की उत्तमता का निर्देश | ,, |
| व्यापारी के धन की व्यवस्था का निर्देश | ,, | अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्ग के लक्षण | ,, |
| मूल से दूना ब्याज ले चुकने पर उत्तमर्ण को मूल ही दिलवाने का निर्देश | ३२१ | युद्ध-सहायक सामग्रियों से परिपूर्ण दुर्ग से निश्चित विजय होने का निर्देश | ३२६ |
| लिखित नष्ट हो जाने पर साक्षी के आधार पर उत्तमर्ण को धन दिलाने का निर्देश | ,, | सेना-निरूपण प्रकरण के आरम्भ में सेना के लक्षण | ३२७ |
| खोटी वस्तु बेचनेवाले को दण्ड देने का निर्देश | ,, | सेना के भेदों का वर्णन | ,, |
| शिल्पियों की भृति का विचार | ३२२ | स्वगमा और अन्यगमा सेना के लक्षण | ,, |
| सैन्य के प्रभाव का निर्देश | ,, | ||
| ६ प्रकार के बलों का निर्देश | ३२८ | ||
| २ प्रकार के सेनाबलों का निर्देश | ,, | ||
| मैत्र, स्वीय, मौल तथा साद्यस्क सेनाओं के लक्षण | ,, | ||
| सार-असार तथा शिक्षित-अशिक्षित सेनाओं के लक्षण | ३२९ | ||
| गुल्मीभूत, अगुल्मक, दत्तास्त्रादि तथा स्वशस्त्रास्त्र सेनाओं के लक्षण | ,, |
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( २६ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| कृतगुल्म, स्वयंगुल्म, दत्तवाहन और आरण्यक सेनाओं के लक्षण | ३२९ | घोड़ा और घोड़ी के शरीर में दक्षिण तथा वाम तरफ भौंरी के शुभ फल | ३३८ |
| शत्रुबल के तथा दुर्बल सेना के लक्षण | ” | अन्यथा होने पर फलाभाव का निर्देश | ” |
| सेना के शारीरिक बल बढ़ाने के उपाय | ” | भौंरियों के नीचे-ऊंचे होने में फलभेद | ” |
| शौर्यबल बढ़ाने के उपाय | ३३० | शुभ भौंरी के लक्षण | ” |
| सेनाबल, आत्मिकबल व बुद्धिबल बढ़ाने के उपाय | ” | भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की उत्तमता | ३३९ |
| आयुर्बल के लक्षण | ” | भौंरी के स्थानानुसार घोड़े की मध्यमता | ” |
| सेना में पदाति आदियों की संख्या का नियम | ” | 'पूर्णहर्ष' अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| प्रतिमास में व्यय करने का प्रमाण | ३३१ | 'सूर्यसंज्ञक' अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| राजा के रथ का वर्णन | ” | अश्व-वृद्धिकर 'त्रिकूट' अश्व के लक्षण | ” |
| अनिष्ट तथा शुभप्रद गज का लक्षण | ३३२ | अन्य भौंरियों से युक्त अश्वों के लक्षण | ” |
| हाथी के ४ प्रकार | ” | यशोवर्द्धक तथा 'सव्यं' संज्ञक अश्व के लक्षण | ३४० |
| भद्रगज के लक्षण | ” | शिव-संज्ञक तथा क्रूर-संज्ञक के लक्षण | ” |
| मन्द्रगज के लक्षण | ” | इन्द्र-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| मृगगज के लक्षण | ” | विजय-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| मिश्रगज के लक्षण | ३३३ | पद्म-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| गजमान में अंगुलादिकों का प्रमाण | ” | भूपाल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ” |
| भद्रगज के शरीर का मान | ” | चिन्तामणि-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ३४१ |
| मन्द्र तथा मृग गज का मान | ” | ||
| उत्तमोत्तम अश्व के लक्षण | ” | ||
| उत्तम तथा मध्यम अश्व के लक्षण | ” | ||
| नीच अश्व के लक्षण तथा अश्व के अवयवों की मान-कल्पना | ३३४ | ||
| अश्व की ऊंचाई और लम्बाई का प्रमाण | ” | ||
| उत्तम अश्व के अन्य लक्षण | ३३८ | ||
| अश्व के भौंरी के दो भेद | ” |
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( २७ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शुक्ल-संज्ञक अश्व के लक्षण तथा फल | ३४१ | अश्वों के कुठारवादि दोष उत्पन्न होने के कारण | ३४५ |
| अनिष्टकारक अश्वों के लक्षण | ,, | घोड़े की अच्छी तथा बुरी चाल होने में शिक्षक की कारणता का निर्देश | ,, |
| धूमकेतु-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल | ,, | घोड़ों के सुशिक्षक के लक्षण | ,, |
| कृतान्त-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल | ,, | अश्व-सुशिक्षक के कृत्यों का निर्देश | ३४६ |
| घोड़े के पूंछ के शुभाशुभ फल | ,, | अन्यथा ताडन करने से अनिष्ट | ,, |
| भौरियों के अशुभप्रद स्थानों का निर्देश | ३४२ | उत्तम और हीन घोड़े की गति का प्रमाण | ,, |
| आवर्त्त भौरियोंके शुभप्रद स्थानों का निर्देश | ,, | उत्तमादि मण्डलों के प्रमाणों का निर्देश | ३४७ |
| सूर्य-चन्द्रसंज्ञक भौंरी के स्थानानुसार शुभाशुभ फल का निर्देश | ,, | ऋतु के भेद से अश्वशिक्षा के समय में भेद का निर्देश | ,, |
| शुभाशुभ फलप्रद भौंरो के स्थानों का निर्देश | ,, | वर्षर्तु में और विषम भूमि में घोड़े को चलाने का निषेध | ,, |
| एकशृङ्गी तथा एकरश्मि-संज्ञक भौंरी के लक्षण व फल | ३४३ | उत्तमगति से अश्व के फल का निर्देश | ,, |
| कीलोत्पाटी व मध्यम आवर्त्तों के लक्षण व फल | ,, | थके हुए अश्व को धीरे-धीरे चलाने का एवं उनके भक्षणार्थ हितकारक पदार्थ देने का निर्देश | ,, |
| पञ्चकल्याण व अष्टमङ्गल अश्व के लक्षण व फल | ,, | मोच आये अंग पर घोड़े को चाबुक न मारने का निर्देश | ३४८ |
| श्यामकणं अश्व के लक्षण | ,, | मार्ग से चलकर आये हुए घोड़े को गुड़ तथा लवण देने का निर्देश | ,, |
| जयमङ्गल अश्व के लक्षण | ३४४ | पसीना शान्त होने पर लगाम उतारने का निर्देश | ,, |
| निन्दित अश्व के लक्षण | ,, | घोड़ों के अङ्गों को मलकर फेरने का निर्देश | ,, |
| अश्वों की श्रेष्ठ गति के लक्षण | ,, | घोड़ों को मद्य व मांसरस देने का फल | ,, |
| निन्दित 'दलभंजी' अश्व के लक्षण | ,, | ||
| स्निग्ध वर्ण होने से सर्व वर्णगत दोष-नाशकता का निर्देश | ३४५ | ||
| आवर्त्तादिदोष से दूषित होने पर भी पूजनीय अश्व के लक्षण | ,, |
पृष्ठ 78स्थायी लिंक
( २८ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| चारा आदि खिलाने के बाद तत्काल घोड़े की सवारी के दोष | ३४८ | मनुष्य और पशुओं का ताडन द्वारा वश में करने का एवं सैनिकों को धन-दण्ड से दण्डित न करने का निर्देश | ३५३ |
| घोड़ों के लिये उत्तम, मध्यम तथा नीच भोजनों का निर्देश | ३४९ | बैल आदिकों के निवास का सुरक्षित स्थल | ,, |
| घोड़ों की ६ प्रकार की गति का नाम-निर्देश | ,, | राज्य में सौ-सौ योजन पर सेना रखने का निर्देश | ३५४ |
| धारा गति के लक्षण | ,, | बोझ ले चलनेवालों का तारतम्य | ,, |
| आस्कन्दित गति के लक्षण | ,, | राजा को छोटे भी शत्रु पर अल्प साधन से गमन करने का निषेध | ,, |
| रेचित गति के लक्षण | ,, | युद्ध से भिन्न कार्यों में अयोग्य सैनिकों की नियुक्ति का निर्देश | ,, |
| प्लुत तथा धौरीतक गति के लक्षण | ,, | संग्राम में अधिक सेना की आवश्यकता का निर्देश | ,, |
| वल्गित गति के लक्षण | ,, | सन्नद्ध सेना का माहात्म्य | ३५५ |
| बैल के मुखादि का प्रमाण | ३५० | मौल सेना की प्रशंसा | ,, |
| पूज्य सप्तताल बैल के लक्षण | ,, | सेना में अवश्य भेद होने के कारण | ,, |
| श्रेष्ठ बैल के लक्षण | ,, | सेना का भेद होने से अनिष्ट फल | ,, |
| श्रेष्ठ ऊंट के लक्षण | ,, | राजा को शत्रु-सेना में भेद अवश्य डालने का निर्देश | ,, |
| मनुष्य और हाथियों की आयु तथा बाल्यादि अवस्था का प्रमाण | ,, | शत्रुओं को साधने का प्रकार | ३५६ |
| घोड़ा, बैल तथा ऊंट की आयु तथा अवस्थाओं का प्रमाण | ३५१ | शत्रुओं को जीतने का भेद से अन्य उपाय न होने का निर्देश | ,, |
| दांतों के द्वारा बैल व घोड़ों की अवस्था-ज्ञान का निर्देश | ,, | शत्रु की त्यागी हुई सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश | ,, |
| दांतों द्वारा घोड़ों के प्रथमादि वर्ष का ज्ञान | ,, | मित्र की सेना को अपनी सेना में रखने का प्रकार-निर्देश | ,, |
| निन्दित घोड़ों के लक्षण | ३५२ | अस्त्र और शस्त्र के लक्षण और भेद | ,, |
| दांतों द्वारा बैल व ऊंट के आयु की परीक्षा | ,, | ||
| अंकुश के लक्षण | ३५३ | ||
| घोड़ों की लगाम का वर्णन | ,, | ||
| बैल व ऊंट को वश में करने का उपाय तथा उनके मल-शोधनार्थ दंताली का वर्णन | ,, |