शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें१२ ॥ शुक्रनीतिः॥
कर अपनी तपस्या के प्रभाव से राजा स्थावर-जङ्गमात्मक जगत् का स्वामी होता है। और अपने भाग (कर) को ग्रहण करनेवाला तथा लोक की रक्षा करने में निपुण इन्द्र के समान ही होता है ॥
वायुर्गन्धस्य सदसत्कर्मणः प्रेरको नृपः ।
धर्मप्रवर्त्तकोऽधर्मनाशकस्तमसो रविः ॥ ७३ ॥
जिस प्रकार से वायु भले-बुरे गन्ध का प्रेरक होता है उसी प्रकार राजा भी भले-बुरे कर्म का प्रेरक होता है। एवं सूर्य जैसे अन्धकार का नाशक एवं धर्म का प्रवर्त्तक होता है वैसे राजा भी अधर्म का नाशक तथा धर्म का प्रवर्त्तक होता है ॥
दुष्कर्मदण्डको राजा यमः स्याद्दण्डकृद्यमः ।
अग्निशुचिस्तथा राजा रक्षार्थं सर्वभागभुक् ॥ ७४ ॥
दुष्कर्म का दण्ड देनेवाला होने से राजा यम के समान है। क्योंकि यम भी दुष्कर्म का दण्ड देते हैं। और अग्नि के समान राजा स्वयं शुद्ध तथा लोक-रक्षार्थ सब लोगों से भाग (कर या हवि) ग्रहण कर भोग करनेवाला होता है ॥
पुष्यत्यपां रसैः सर्वं वरुणः स्वधनैर्नृपः ।
करैश्चन्द्रो ह्लादयति राजा स्वगुणकर्मभिः ॥ ७५ ॥
वरुण जैसे जलसम्बन्धी रसों से सबको परिपुष्ट करता है वैसे राजा भी अपने धन से सब का पोषण करता है। चन्द्र जैसे अपनी किरणों से जगत् को आह्लादित करता है, वैसे ही राजा भी अपने गुण तथा कर्मों से जगत् को आह्लादित करता है ॥
कोशानां रक्षणे दक्षः स्यान्निधीनां धनाधिपः ।
चन्द्रांशेन बिना सर्वैरंशैर्नो भाति भूपतिः ॥ ७६ ॥
जैसे कुबेर अपनी निधियों की रक्षा करने में निपुण होता है वैसे राजा भी अपने कोशों की रक्षा करने में निपुण होता है। यदि चन्द्र का अंश न हो तो केवल अन्य लोकपालों के अंशों से राजा की शोभा नहीं हो सकती है अर्थात् चन्द्र के समान आह्लादकत्व गुण राजा में न हो तो अन्य सभी गुण व्यर्थ हैं अत एव राजा की सार्थकता प्रजा को आह्लाद पहुँचाने से ही होती है ॥
पिता माता गुरुर्भ्राता बन्धुर्वैश्रवणो यमः ।
नित्यं सप्तगुणैरेषां युक्तो राजा न चान्यथा ॥ ७७ ॥
- गुणों से युक्त राजा की प्रजा रंजकता का निर्देश—१. पिता, २. माता, ३. गुरु, ४. भ्राता, ५. बन्धु, ६. कुबेर, ७. यम, इन सातों के वक्ष्यमाण