शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः १३
गुणों से नित्य युक्त होने पर ही वस्तुतः राजा कहलाने योग्य होता है, अन्यथा यदि उक्त गुण न हों तो राजा नहीं कहला सकता है ॥
गुणसाधनसंदक्षः स्वप्रजायाः पिता यथा ।
क्षमयित्र्यपराधानां माता पुष्टिविधायिनी ॥ ७८ ॥
अपनी प्रजा (सन्तान) को गुणवान बनाने में पिता जैसे निपुण होता है, वैसे राजा को भी अपनी प्रजा (जनता) को गुणवान बनाने में निपुण होना चाहिये । और जिस प्रकार माता अपनी प्रजा के अपराधों को क्षमा करनेवाली, तथा उनको पुष्ट करनेवाली होती है उसी प्रकार राजा को भी होना चाहिये ॥
हितोपदेष्टा शिष्यस्य सुविद्याऽध्यापको गुरुः ।
स्वभागोद्धारकृद् भ्राता यथाशास्त्रं पितुर्धनात् ॥ ७९ ॥
जिस प्रकार गुरु अपने शिष्य के लिये हित का उपदेश करनेवाला एवं सुन्दर विद्या को पढ़ानेवाला होता है उसी प्रकार अपनी प्रजा के लिये राजा को भी होना चाहिये । जैसे भ्राता शास्त्रानुसार पिता के धन में से अपने भाग (अंश) को ग्रहण करनेवाला होता है वैसे राजा को भी प्रजा से भाग (कर) ग्रहण करना उचित है ॥
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां गोप्ता बन्धुस्तु मित्रवत् ।
धनदस्तु कुबेरः स्याद्यमः स्याच्च सुदण्डकृत् ॥ ८० ॥
जिस प्रकार बन्धु अपने बन्धु के शरीर, स्त्री, धन तथा गुप्त रहस्य की रक्षा करनेवाला मित्र के समान होता है उसी प्रकार राजा को भी प्रजा के लिये होना चाहिये । और आवश्यकता पड़ने पर कुबेर के समान धन देनेवाला, एवं यम के समान अपराधी को यथार्थ दण्ड देनेवाला होना चाहिये ॥
प्रबुद्धिमति सम्राजि निवसन्ति गुणा अमी ।
एते सप्त गुणा राज्ञा न हातव्याः कदाचन ॥ ८१ ॥
प्रकृष्ट बुद्धिवाले श्रेष्ठ राजाओं में ये सभी गुण रहते हैं । अतः राजाओं को उचित है कि इन ७ गुणों को वे कभी भी न छोड़ें ॥
क्षमते योऽपराधं स शक्तः स दमने क्षमी ।
क्षमया तु विना भूपो न भात्यखिलसद्गुणैः ॥ ८२ ॥
जो अपराधों को क्षमा करनेवाला होता है वह 'क्षमाशील' एवं जो दुष्टों का दमन करनेवाला होता है वह 'शक्तिमान्' कहलाता है । किन्तु संपूर्ण गुणों से युक्त होने पर भी राजा यदि क्षमा से रहित होता है तो उसकी शोभा नहीं होती है ॥