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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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तब उस दुष्ट ने चारों रत्नो को जांघ के भीतर डालकर सी लिया और मार्ग मे चिल्लाने लगा कि मैं तो मूस लिया गया (ठगा गया)।

उसके ऐसा करने पर उन सबने यह समझ लिया कि यह कपट कर रहा है और विवाद करते-करते वे सब ऐरावती पुरी में नीतिसार राजा के यहाँ गये और अपनी समस्या को बताया। जब यह सब बात राजा के मन्त्री को पता चली तो उसने अपनी पुत्री से बताया। पुत्री ने उन सबको स्नान, भोजन कराके शृङ्गार, करके क्रम से प्रत्येक से अपना उपभोग करने के लिए कहा और सौ स्वर्ण मुद्राएँ मांगा। क्षत्रिय, ब्राह्मण एवं बढई ने धनाभाव दर्शाया किन्तु जब वह बनिये के पास गयी तो उसने कहा स्वामिनि! चार रत्न लेकर मेरा उपभोग करो।

इस प्रकार मन्त्री की पुत्री अपने शील की रक्षा करती हुई चारों रत्नों को अपने पिता को सौंप दिया। मंत्री ने उन्हें बुलाकर प्रत्येक को दे दिया। वे भी अपना-अपना धन पाकर कृतकृत्य हो अपने-अपने घर गये।

कथा- 53

"चर्मकार की पत्नी की कथा"

शुक ने कहा चर्मण्वती के किनारे चर्मकूट नामक गाँव है। वहाँ दोहड नाम का चमार था उसकी पत्नी देविका परपुरुषों मे आसक्त रहती थी। एक बार चमार चमड़ा खरीदने बाहर गया तो वह उपपति को अपने घर लाई। जब दोनों सुरत कर चुके तभी उसका पति घर के बाहर आ गया। जब उसने पति को आया हुआ जाना तो निरर्थक वाक्य बड़-बड़ाती हुई बाहर आयी। उसका वाक्य सुनकर मूर्ख डर गया और मन्त्रवेत्ता को बुलाने चला गया तब तक उसने उस उपपति को भाग दिया।

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