शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची
शुकसप्तति एक आलोचनात्मक अध्ययन
(UNIVERSITY OF ALLAHABAD / QUOT RAMI TOT ARBORES)
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डी० फिल० उपाधि हेतु प्रस्तुत
शोध प्रबन्ध
| निर्देशिका : | शोधकर्त्री : |
|---|---|
| डा० श्रीमती मंजुला जायसवाल | श्रीमती हिमांशु द्विवेदी |
| रीडर, संस्कृत विभाग | एम.ए. संस्कृत |
| इलाहाबाद विश्वविद्यालय | इलाहाबाद विश्वविद्यालय |
| इलाहाबाद | इलाहाबाद |
संस्कृत विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
इलाहाबाद
2003
5A, बहादुरगंज इलाहाबाद
डा० मंजुला जायसवाल रीडर, संस्कृत विभाग इ०वि०इलाहाबाद
प्रमाण-पत्र
प्रमाणित करती हूँ कि (श्रीमती) हिमांशु द्विवेदी ने डी०फिल उपाधि के लिए प्रस्तुत शोध प्रबन्ध-जिसका विषय- "शुकसप्तति-एक आलोचनात्मक अध्ययन" है- मेरे निर्देशों का निष्ठापूर्वक पालन किया है। इनकी उपस्थिति निर्धारित नियमों के अनुकूल हैं।
शोधकर्त्री का शोध मौलिक एवं उपयोगी है। मुझे श्रीमती हिमांशु द्विवेदीके इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डी०फिल उपाधि हेतु शोध प्रबन्ध प्रस्तुत करने में कोई आपत्ति नहीं है।
विषय सूची
भूमिका
अ-स
पृष्ठ संख्या
प्रथम अध्याय
कथा साहित्य की उत्पत्ति और विकास
1-27
(1) कथा का प्रारम्भिक स्वरूप
(2) कथा का माध्यम
(अ) कथा उपदेश का माध्यम
(ब) कथा ज्ञान का माध्यम
(स) कथा मनोरञ्जन का माध्यम
(3) कथा के भेद
(4) कथा का स्वरूप काल्पनिक अथवा ऐतिहासिक
(5) संस्कृत साहित्य मे प्राप्त कथाओं के विविध रूप
(6) कथा का विकास
(7) कथा का महत्व
(8) भारतीय कथा साहित्य की विशेषतायें
(9) संस्कृत साहित्य में रचित कथाग्रन्थ
द्वितीय अध्याय
कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना
28-48
(क) काव्य विभाजन में कथा का स्वरूप एवं स्थान
(1) काव्य का स्वरूप
(2) कथातत्व
(3) कथातत्व एव कथावस्तु में भेद
(4) कथावस्तु का महत्व
(5) कथा का शास्त्रीयरुप
(6) कथा और आख्यायिका
(ख) शुकसप्तति परिचय
(1) कर्ता
(2) काल
(3) अनुवाद
(4) वर्ण्य विषय
(5) ग्रन्थ का आधार
(6) ग्रन्थ का महत्व
(7) प्रचार एव प्रसार
(8) शुकसप्तति कथा अथवा आख्यायिका
(स) शुकसप्तति पर अन्य ग्रन्थों का प्रभाव
तृतीय अध्याय
शुकसप्तति - कथा परिचय | 49-112
(1) ग्रन्थ का मूलस्वरूप
(2) आधार कथा
(3) शुकसप्तति की कथाओं का परिचय
- देवशर्मा की कथा
- यशोदेवी की कथा
- राजा सुदर्शन की कथा
- विषकन्या विवाह की कथा
- बालपण्डिता की कथा
- मंडक की कथा
- स्थगिका और ब्राह्मण कथा
- वणिक् पुत्री सुभगा की कथा
9 पुष्पहास और रानी की कथा
10 शृङ्गारवती की कथा
11 रम्भिका और ब्राह्मण की कथा
12 कुलालपत्नी शोभिका की कथा
13 वाणिक् पत्नी राजिका की कथा
14 धनश्री और उनके वेणीदान की कथा
-
श्रियादेवी और सुबुद्धि की कथा
-
मुग्धिका की कथा
17 गुणाढ्य ब्राह्मण की कथा
-
सर्षपचौर की कथा
-
सन्तिका और स्वच्छन्दा की कथा
-
केलिका की कथा
-
मन्दोदरी और उसके मयूर-भक्षण की कथा
-
मादुका की कथा
-
धूर्तमाया कुट्टिनी की कथा
24 सज्जनी और देवक की कथा
25 श्वेताम्बर की कथा
26 रत्नादेवी की कथा
-
मोहिनी और कुमुख की कथा
-
देविका और प्रभाकर ब्राह्मण की कथा
-
सुन्दरी और मोहन की कथा
30 मूलदेव और पिशाच की कथा
-
शशक और पिङ्गलनाम सिंह की कथा
-
राजिनी की कथा
-
मालिनी और रम्भिका की कथा
- शम्भु ब्राह्मण की पारडी (साडी की कथा)
35 शम्बक वणिक् की कथा
- नायिनी की रावडी की कथा
37 लाङ्गली (हलवाहा) और सुभगा की कथा
38 प्रियवद विप्र और खटिया के पावे की कथा
39 भूधर वणिक् और उसकी तराजू की कथा
-
सुबुद्धि एव कुबुद्धि की कथा
-
राजपुत्री का रोग और ब्राह्मण की मन्त्रसाधना की कथा
-
व्याघ्रमारी और सिंह की कथा
43 व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा
44 जम्बुक की मुक्ति की कथा
45 विष्णु ब्राह्मण और रतिप्रिया गणिका की कथा
- करगरा और करगरा नाथ की कथा
47 करगरानाथ की कथा
-
मन्त्री शकटाल व दो घोडियो की कथा
-
मन्त्री शकटाल और छडी की कथा
-
धर्मबुद्धि और दुष्टबुद्धि की कथा
-
ब्रह्मष गाङ्गिल की सेना की कथा
52 जयश्री की कथा
53 चर्मकार की पत्नी की कथा
-
विप्र विष्णु के दूतकर्म की कथा
-
श्रीधर ब्राह्मण की कथा
-
सन्तक्त वणिक् की कथा
-
शुभङ्कर की कथा
- दु.शीला पति और गणपति की कथा
- राहड और रूक्मिणी की कथा
- राजदूत हरिदत्त की कथा
- तेजुका ओझा की कथा
- कुहन, उसकी पत्नी और नाई की कथा
- शकटाल और चाणक्य की कथा 64 मण्डुका और उसकी सखी देविका की कथा 65 श्रावक श्रीवत्स की कथा
- हसराट् शङ्खधवल की कथा 67 मकर प्लवङ्गम (बन्दर) की कथा
- वचचेवति की कथा
- वेजिका की कथा
- प्रभावती औरर मदन की कथा (4) कथाओ का वर्गीकरण एवं उद्देश्य
चतुर्थ अध्याय
"कथा में पात्रों का विधान एवं शुकसप्तति के पात्रें का परिचय" 113-139
(अ) कथा में पात्र विधान
(1) कथा में पात्रों की उपयोगिता
(2) पात्रों का वर्गीकरण
(क) इतिवृत्त के आधार पर
(ख) घटनाओं के आधार पर
(ग) नाट्यशास्त्रीय लक्षणो के आधार पर
(ब) शुकसप्तति के प्रमुख पात्रें का परिचय
(1) मुख्य पात्र
(क) मदनविनोद
(ख) प्रभावती
(ग) शुक
(2) अन्य पात्रो की सामान्य सगणना
पाँचवां अध्याय
"कलापक्ष" 140-177
(अ) भाषा
(ब) शैली
(स) रस
(द) अलङ्कार
(य) छन्द
छठवाँ अध्याय
"संस्करण एवं सूक्तियाँ" 178-195
(1) सामान्य सस्करण
(2) परिष्कृत संस्करण
(3) सूक्तियाँ
(अ) व्यवहारिक सूक्तियाँ
(ब) उपदेशात्मक सूक्तियाँ
(स) शिक्षाप्रद सूक्तियाँ
(द) राजधर्म सम्बन्धी सूक्तियाँ
(य) अन्य पद्यात्मक सूक्तियाँ
(र) गद्यात्मक सूक्तियाँ
(ल) पद्यात्मक सूक्तियाँ (प्राकृत भाषा)
सहायक पुस्तकों की सूची 196-198
प्रथम अध्याय : कथा साहित्य की उत्पत्ति और विकास
प्रथम अध्याय
कथा साहित्य की उत्पत्ति
और विकास
<u>“कथा साहित्य की उत्पत्ति और विकास”</u>
किसी सजीव सप्राण प्रेरणादायक भावाभिव्यक्ति के लिए तदनुरूप तद्भार वहन समर्थ विधान में ही कला की सार्थकता है। मानव इतिहास की जाज्वल्यमान किरणें अतीत के अन्धकार को जहाँ एक ओर प्रकशित करती हैं अथवा उसकी एकाध चिनगारी के सहारे कल्पना जहाँ तक आगे जा सकती है वहाँ से लेकर आज तक कलाकार का यही उद्देश्य रहा है। ऐसा कोई लक्षण नहीं दिखलाई पडता जिससे यह कहा जा सके कि कला अपने इस चिरपरिचित ध्येय के प्रति आदर शैथिल्य भाव प्रगट कर रही है। अति–अति प्राचीन काल से मानव अपने भावाभिव्यक्ति के लिए अनेक माध्यमों का सहारा लेता आया है। इन माध्यमों में एक सशक्त माध्यम था– “कथा”। 'कथा' शैली के माध्यम से कवियों ने धर्म, दर्शन, नीति, आचार, व्यवहार, इतिहास, भूगोल आदि विवध विषयों का विवेचन प्रचुर मात्रा मे इस प्रकार के रोचक एवं उपदेशात्मक विधि से किया कि वह सस्कृत साहित्य में एक सहज और सशक्त शैली बन गयी।
यदि ये कहा जाय कि कथा की उत्पत्ति का इतिहास उतना ही प्राचीन है। जितना की सृष्टि की उत्पत्ति अथवा मानव उत्पत्ति के विकास का इतिहास तो यह गलत न होगा।
“श्री देवराज उपाध्याय” भी इसी तथ्य का समर्थन करते हुये कहते हैं कि कथा–साहित्य की उत्पत्ति मनुष्य के कौतुहल वृत्ति को संतुष्ट करने के लिये हुई होगी, पर यह कौतुक वृत्ति थोडा आगे बढ़ते ही मानव के भाग्य को, उसके आचरण को, उसके सुख–दुःख के स्वरूप को पहचानने की प्रवृत्ति मे परिणत हो गयी होगी। उसी समय साहित्य का जन्म हुआ होगा। हो सकता है कथा आरम्भ में कथा मात्र रही हो, पर वह कथा साहित्य का युग नहीं रहा होगा, वह युग रहा होगा कथा मात्र का। केवल कथा सुन–सुनाकर कौतुक शान्त कर देने वाला, परन्तु जिस दिन
अमानवीय तत्वो की स्थिति अपने यहाँ बनाये रखते हुए भी मनुष्य की दिलचस्पी मनुष्य में बढ़ने लगी होगी और यह संस्कार उगने लगा होगा कि इनका अस्तित्व मानव में सोयी शिथिल भाव या क्रिया तरङ्गों को जगह देता है। उसी दिन कथा साहित्य के प्रथम सुप्रभात का आर्विभाव हुआ होगा, और उसी दिन कथा साहित्य ने प्रथम किरणें देखी होगी।¹
प्रारम्भ मे कथायें मौखिक रूप मे प्रचलित रही होगी जिनके विषय अधिकांशतः परी, प्रेत आदि रहे होंगे। वस्तुतः इस प्रकार की कहानियों के कथन द्वारा व्यक्ति आनन्द का अनुभव करता रहा होगा। यही कारण है कि सभ्य एवं असभ्य सभी जातियाँ कहानी कथन के द्वारा अपना, अपने परिवारजनों एवं मित्रों का मनोरञ्जन करती थी। यह प्रवृत्ति विश्व के अन्य भाषाओ के कथा-साहित्य के विकास के प्रसङ्ग में भी देखी जा सकती हैं।
वस्तुतः कथाओं का प्रारम्भ मनुष्य की कौतूहल या कौतुक प्रवृत्ति के फलस्वरूप ही हुआ। इस तथ्य का समर्थन "पंडित बलदेव उपाध्याय" ने भी किया है।² इस प्रकार संस्कृत साहित्य के अन्तर्गत एक नवीन काव्य विधा का जन्म हुआ। वस्तुतः कथा मनुष्य की स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति के प्रागट्य का एक साहित्यक माध्यम है।
(1) कथा का प्रारम्भिक स्वरूप :
अतीत में जाने पर यह बात स्पष्ट होती है कि आरम्भिक काल में कथायें कथन और श्रवण की परम्परा से व्यवहृत होती हुई व्यक्ति के जिज्ञासा, मनोरञ्जन और आत्मपरितोष का साधन थीं, जैसे-जैसे मानव सभ्यता एवं समाज का विकास होता गया वैसे-वैसे इन कथाओं का सम्बन्ध मानव जीवन की अनुभूतियों एवं वाह्य
1 श्री देवराज, "कथा साहित्य में मेरी मान्यतायें" पृ. 17-26
2 संस्कृत साहित्य का इतिहास- पं बलदेव उपाध्याय
[2]
जगत के सत्य से सम्बद्ध होता गया। अब कथायें नीति, उपदेश, सत्य-आचरण, आत्मोन्नयन एवं सुधार की शिक्षा देने का माध्यम बनीं, साथ ही मनोरञ्जन करने के उद्देश्य से भी युग सत्य की अभिव्यक्ति का माध्यम बनीं।
कथा ने साहित्यिक विधा के आवरण को कब ओढा यह निश्चयपूर्वक कह सकना तो संभव नहीं है किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जिस दिन मानव अपने भावाभिव्यक्ति के लिये सजग हुआ और जिस दिन उसमें साहित्यिक अभिरूचि का उदय हुआ, उसी दिन कथा-साहित्य का जन्म हुआ होगा। यह अवश्य है कि कथा-साहित्य की उत्पत्ति मनुष्य के जिज्ञासा वृत्ति को सन्तुष्ट करने के लिये हुई होगी। उस काल में मानवीय अथवा अमानवीय दोनों तत्वों को कथा में स्थान दिया गया रहा होगा, किन्तु उस काल में मात्र कथा श्रवण के द्वारा ही व्यक्ति की कौतूहल प्रवृत्ति को शान्त कर दिया जाता था। कालान्तर में जिस समय मानव आत्माभिव्यक्ति के प्रति सजग हुआ उसी दिन कथा-साहित्य का जन्म हुआ होगा।
(2) कथा का माध्यम :
सामान्यतया जिस समय कथा-साहित्य का प्रादुर्भाव हुआ होगा उस समय उसका स्वरूप मौखिक ही था। अतः लोगों द्वारा मौखिक कथायें ही सुनाई जाती थीं। जैसे-दादा-दादी, नाना-नानी प्रायः बच्चों को मौखिक रूप से ही तरह-तरह की उपदेशात्मक कहानियाँ सुनाते थे।
(अ) कथा-उपदेश का माध्यम :
सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में प्रायः किसी न किसी रूप में कथा के बहाने मनुष्य के लिए सन्मार्ग निर्देश करने के हेतु ही उपदेश और शिक्षा का प्रणयन होता आया है। वैदिक काल से लेकर अब तक उपर्युक्त धार्मिक उपदेश एवं शिक्षा, विज्ञान के
[3]
प्रचार-प्रसार के लिये इस साहित्यिक विधा का क्रमशः उपवृद्धघण होता चला आया है और यह विधा सम्पूर्ण भूमण्डल पर इसी रूप में प्रायः सभी भाषाओं में अन्तर्निहित है। कथा-साहित्य रूप विधा अत्यन्त सहजता से मूढ हृदय को भी अपनी ओजस्विता से शीघ्र ही प्रभावित करती है। यह माध्यम वस्तुतः अनादिकाल से अक्षुण्ण है एवं अनन्तकाल तक इसकी अजस्र धारा बहती रहेगी। साहित्य के इतिहास में इस कला के संवर्द्धन में बौद्ध और जैनियों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। उपदेश या नीति शिक्षा को चरितार्थ करने के बहाने जैनियों ने भी उपर्युक्त माध्यम का खूब सहारा लिया।
"पञ्चतन्त्र", "हितोपदेश" आदि संस्कृत साहित्य के अत्यन्त प्राचीन महत्वपूर्ण ग्रन्थो का दुनियाँ में सभी साक्षर व्यक्ति सम्मान करते हैं, जिसमें नीति, उपदेश, शिक्षा, विज्ञान आदि सम्पूर्ण तत्वों को प्रगट करने का मनोहर माध्यम कथायें ही हैं। सामान्य लौकिक कहानियाँ मात्र मनोरञ्जन की ही सामग्री नहीं है अपितु पशु-पक्षियों की कथाओ के रूप में विशेषतः शिक्षा के लिये ही प्रयुक्त होती रही हैं।
वस्तुतः यह विधा संस्कृत साहित्य की प्राणात्मिका शक्ति है। ऐसा कहने में हमें तनिक भी हिचक नहीं होना चाहिए। संस्कृत साहित्य की संदेश संवाहिका एवं उन संदेशो के बहुआयामी शिक्षण के विषयों से ओत-प्रोत कथा विधा के विषय में "एच०एल० हरिअप्पा" ने विचार व्यक्त करते हुये कहा है¹ कि सशक्त तथा वीर योद्धा होने के लिये विपत्ति में पड़े हुए को बचाने के लिए उदार तथा सहायक बनने, दान लेने और देने, सच्चे बनने तथा ईष्या से मुक्त होने या संक्षेपतः ईश्वर का आदर करने और मानव को प्रेम करने के प्रति उत्साह प्रदान करने के अतिरिक्त प्राचीन कथाओं से हम और क्या उपदेश चाहते हैं।"
¹ एच० एल० हरिअप्पा, "ऋग्वैदिक लीजेण्ड थ्रू दी, एजेज" पृ०- 145
[4]
(ब) कथा-ज्ञान का माध्यम :
वस्तुत. कथाये सुनने के बाद मनुष्य का ज्ञानार्जन होता रहा होगा। जैसे-रामायण में राम-सीतादि की कथा सुनने के बाद सामान्य जन को उनका अनुकरण करने की सीख मिलती थी। "हितोपदेश" आदि की कथायें भी इसी श्रेणी में आती हैं।
(स) कथा मनोरञ्जन का माध्यम :
जबसे मानव का जन्म हुआ होगा, तबसे लेकर आज तक प्रायः लोग खाली समय व्यतीत करने के लिये कहानियों के माध्यम से अपना मनोरञ्जन करते आये हैं। ज्यादातर किसी बात को समझाने के लिये भी कहानियों का उदाहरण देकर ही लोग अपनी बात को मनोरञ्जन ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
(3) कथा के भेद :
वैदिक काल से लेकर सम्पूर्ण वाङ्गमय मे प्राप्त कथाओं को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है- (i) अद्भुत कथा, Fairy Tales (ii) लोककथा Marchen, (iii) कल्पित कथा Myths, (iv) पशुकथा Fables । सूक्ष्म विवेचन के आधार पर सम्पूर्ण कथा-साहित्य को दो भागो मे बांटा जा सकता है -
(i) नीतिकथा--जिसके अन्तर्गत उपदेशात्मक पशु कथायें भी आ सकती हैं।
(ii) लोककथा- जिसके अंतर्गत समस्त प्रकार की अद्भुत, कल्पित एवं काल्पनिक आदि कथाओं को संगृहीत किया जा सकता है।
कथा का विभाजन भारतीय दृष्टि से "नीतिशास्त्र" और "अर्थशास्त्र" के रूप में भी किया जा सकता है। "अर्थशास्त्र" के अन्तर्गत राजनीतिक, दैनिक जनजीवन की झाँकी तथा जीवन के भौतिक मूल्यों का विवेचन रहता है। नीतिशास्त्रों तथा धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित जीवन के उदात्त दृष्टिकोणों के संकलन एवं उद्देश्य का वर्णन रहता है।
[ 5 ]
लोक-कथाओं में इतनी बहुरूपता है कि इनका अति सूक्ष्म विभाजन करना सम्भव नही है, किन्तु स्थूल रूप से इनका वर्गीकरण दो दृष्टिकोणों से किया जा सकता है- (1) प्रयोजन की दृष्टि से, (2) पात्रों की दृष्टि से।
प्रयोजन की दृष्टि से लोक-कथाओं को नीतिकथा, मनोरञ्जन प्रधान कथा और इतिवृत्तात्मक अथवा दन्तकथा तीन वर्गों में रखा जा सकता है।
पात्रों की दृष्टि से कथाओं को तीन वर्गों में रखा जा सकता है।¹ जन्तु कथा, मानवीय कथा, अतिमानवीय कथा।
यद्यपि मनोरञ्जन का तत्व सभी कथाओ में अवश्य ही विद्यमान रहता है, किन्तु जिस कथा का उद्देश्य रोचक ढंग से नीति का उपदेश देना हो, वह नीति कथा तथा जो प्रमुखतः किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के विषय में कोई किंवदन्ती अथवा इतिवृत्त प्रस्तुत करती हो, वह इतिवृत्तात्मक अथवा दन्त कथा कही जायेगी, तथा जिन कथाओं का प्रयोजन मात्र मनोरञ्जन करना हो, वह मनोरञ्जन प्रधान कथायें कहीं जायेंगी।
जन्तु कथा के पात्र प्रमुख रूप से पशु-पक्षी ही होते हैं और प्रयोजन भी इनका बोधात्मक ही होता है। अतएव इनका अन्तर्भाव नीतिकथाओं में ही हो जाता है। मानव के समान गुणों और आचरणो का आवरण यदि पशु-पक्षियों को भी पहनाकर प्रस्तुत किया जाये तो उनसे जो विनोदपूर्ण स्थिति उत्पन्न हो जाती है, उसके प्रभाव से जन्तु-कथा पाठक या श्रोता के मन में सहज ही घर कर जाती है और इसके माध्यम से दिया गया उपदेश भुलाने पर भी नहीं भूलता। साथ-ही-साथ जन्तु-कथाओं में पशु-पक्षियों के स्वभाव आदि का भी सूक्ष्म निरीक्षण देखते ही बनता है।
1 ए०बी० कीथ , 'हिस्ट्री ऑफ संस्कृत लिटरेचर' पृष्ठ- 243
[ 6 ]
मानवीय कथा का मुख्य पात्र मनुष्य ही होता है। ऐसी कथाओं के द्वारा भी लोक-व्यवहार नीति या सदाचार का उपदेश दिया जाता है। अधिकतर इस प्रकार की कथाये इतिवृत्तात्मक ही होती हैं, जिनमें लोक प्रथित मानवों के सम्बन्ध में नाना प्रकार की किवदन्तियाँ रोचक तथा कौतूहल जनक ढंग से ग्रंथित होती हैं।
अतिमानवीय कथाओ के पात्र प्रमुखतः भूत-पिशाच, बेताल, यक्ष-यक्षिणियाँ, अप्सरायें आदि होती हैं। ऐसी कथाये अधिकतर मनोरञ्जनात्मक ही होती हैं। आश्चर्यजनक घटनाओ के वर्णन के द्वारा ये कथायें, श्रोताओ या पाठकों के मन में कौतूहल उत्पन्न करने तथा सृष्टि के रहस्यात्मक पक्ष के प्रति उसकी कल्पना को उद्दीप्त करने मे पर्याप्त सफल होती हैं इसलिए इनमें ऐसी कथाओ का भी नितान्त अभाव नहीं है, जो मानव को उदात्त चरित्रों की ओर आकर्षित करती हैं।
(4) कथा का स्वरूप काल्पनिक अथवा ऐतिहासिक :
कथा के सन्दर्भ में यह तथ्य शीघ्रता से उठता है कि कथा में कल्पना की प्रधानता होती है तथा लेखक किसी ऐतिहासिक तथ्य को अपनी रचना का आधारशिला बनाता है। कथा का इतिवृत्त उत्पाद्य होता है और उत्पाद्य वस्तु कवि कल्पित होती है।¹ जबकि इतिहास का अर्थ इसके विपरीत होता है। इति-ऐसा, ह-निश्चित रूप से और आस-पास हुआ। इस प्रकार इतिहास सत्य घटनाओं को ही उपस्थित करता है। कथा का अविर्भव आदिम मानव की उस अवस्था में प्रस्फुटित हुआ जब वह शिशु था। समस्त लोककथा-साहित्य एवं धर्म गाथाये प्रथमतः दिव्य प्रकृति व्यापारों के वर्णन का रूपक हैं और द्वितीयतः कृषि उत्पादन एवं प्रजनन सम्बन्धी भावाभिव्यक्ति करने का साधन। इन दोनों ही दृष्टिकोणों में गाथाओं के पात्रों का ऐतिहासिक अस्तित्व नहीं है। परन्तु कथा में सदैव ऐतिहासिक तथ्यो का अभाव ही हो ऐसा आवश्यक नहीं है।
1 "उत्पाद्यं कविकल्पितं' धनञ्जय, 'दशरूपक' प्रथम प्रकाश, कारिका 15
[7]
इस सम्बन्ध मे भानु जी ने अपना मत व्यक्त किया है।¹ कोलाहलाचार्य श्री भानुजी के मत से सहमत हैं। इन सबका यही अर्थ है कि यद्यपि कथा कल्पना प्रसूत होती है फिर भी उसमे यत्किंचित् अंश सत्य का भी समाहित रहता है।²
“इस तरह आगे चलकर तीर की गति से निरन्तर कुछ दूर तक चलकर समाप्त हो जाने वाली सीधी-सादी कथा की अवतारणा के कारण व्यापकता तथा विस्तार ने आगे चलकर घनत्व का स्थान ले लिया और जटिलता की तुलना में सरलता का आदर बढ चला पर यह अनिवार्य नहीं कि कथा का स्वरूप सीधा-सादा ही हो।
(5) संस्कृत साहित्य में प्राप्त कथाओं के विविध रूप :
संस्कृत-साहित्य में कथा-विधा में प्रकृति के अनुसार अनेकरूपता मिलती है। प्राचीनतम् साहित्य में इसका कलेवर प्रायः पद्यात्मक ही मिलता है। संभवतः इसके पीछे तत्कालीन सूत् या कथाविद् प्रचलित गाथाओं का गायन किया करते हैं। यही रहस्य संभावित है जिनमें संगीतात्मकता था तथा जिनमे संगीत का पुट अवश्य ही पाया जाता था। नीति-कथाओं में प्रायः गद्यात्मक शैली का निवेश पाया जाता है। उपदेश या शिक्षा के लिए पद्य का प्रयोग ज्यादा होता आया है। इसके पीछे भी बड़ी वैज्ञानिकता है जो अलग चिन्तन का एक विषय है।
“बृहत्कथामञ्जरी”³ अथवा “कथासरित्सागर” जो अत्यन्त प्राचीन कथासाहित्य के उदाहरण स्वरूप पद्यात्मक ही हैं। प्रारम्भ में परिस्थितिवश एवं वर्णनीय विषय की आवश्यकता के अनुसार प्रायः कथायें लघु आकार की हुआ करती थीं जिनमें मुख्यतः कथा का तत्व एवं इतिवृत्त प्रमुख हुआ करता था। कालान्तर में वर्णनशैली के प्रभाव से इसमें बहुत बदलाव आया है। उपर्युक्त शैली के कारण कथाओं के आकार एवं तथ्यों पर भी सुविस्तृत प्रभाव पड़ा है ऐसी कहानियाँ प्रायः पराक्रम, समुद्रयात्रा अथवा विभिन्न
- एकज्ञात सत्यार्थ भूतायाः कथायाः। प्रबन्धस्य कल्पना रचना स्तोक सत्या यथा कादम्बर्यादिः।। बी०राघवन, 'भोजराज श्रृंगार-प्रकाश', पृष्ठ 615 पर उद्धत।
- “प्रबन्ध कल्पनायां प्राक् सत्यां सुज्ञा कथां विदुः।" - बी० राघवन, "भोजराज श्रृंगार प्रकाश" पृष्ठ 615 पर उद्धत।
- गुणादय
$$\text{ }$$
[ 8 ]
स्वभाव की यात्राओ, घटनाओं आदि पर निर्भर करती हैं। बहुत सारी कथाओं में कल्पना द्वारा अनेक प्रकार से उतार-चढ़ाव विस्तार एवं भौतिक घटनाओं से रहित जैसे-आकाशीय, पर्वतीय, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, राक्षस आदि प्राणियो से संबंधित इतिवृत्त पायी जाती हैं। इसमे धर्म-प्राण भारतीयों की धार्मिक भावना ही मूल कारण है।
अद्भूत-कथा, लोक-कथा, कल्पित-कथा, पशु एवं विभिन्न जीव-जन्तु कथाओं के आधार पर कथा-साहित्य का स्वरूप अनेक रूप धारण किये हुए साहित्य मे अपना प्रभाव डालता है। जिनके द्वारा नीति-शास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं जनजीवन की झोंकी लिए भौतिक मूल्यो का विवेचन होता है।
लोककथाओं में प्रयोजन एवं पात्रों की दृष्टि से नीतिकथा एवं दन्तकथा का अनेक प्रकार से विभाग किया जा सकता है। साधारणतः मनोरञ्जक तत्व कथाओं में सर्वत्र उपलब्ध होता है किन्तु उसका परम उददेश्य नीति का उपदेश एवं शिक्षा ही मानी जा सकती है। जन्तुकथा में पात्र पशु-पक्षी हुआ करते हैं जिनके द्वारा किसी खास शिक्षा का बोध कराया जाता है। साथ ही साथ विभिन्न पशु-पक्षियों के स्वभाव आदि की जानकारी से अत्यन्त आनन्द का विषय बनता है। मानवीय कथाओं के द्वारा लोक-व्यवहार नीति, सदाचार का उपदेश लोक प्रसिद्धि मनुष्यों के सम्बन्ध में किवदन्तियों के द्वारा इतिवृत्त बडे ही रोचक ढंग से ग्रथित होता है।
अतिमानवीय कथाओं में यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, अप्सरायें, उत्तलिकायें, भूत, पिशाच, बेतालों, आदि के द्वारा आश्चर्यचकित कर देने वाली घटनाओं के वर्णन से सृष्टि के रहस्यात्मक पक्ष को अत्यन्त रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इसके साथ-साथ मानव के उदात्त-चरित्र को भी कहीं-कहीं पर उजागर किया जाता रहा है।
सस्कृत-साहित्य में कथा-साहित्य के बीज अपने विविध रूप धारण किये हुए वेद साहित्य से ही प्रारम्भ होते हैं। इसमें कोई आश्चर्य एवं जिज्ञासा का विशेष तात्पर्य नहीं है। ऋग्वेद में दार्शनिक सूक्तों का तत्वतः उपनिषदों के विवेचनों से सम्बद्ध है
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एव अनेको सूक्त वाङ्गमय मे प्रबन्ध काव्य एवं नाटकों से सम्बद्ध हैं। ऐसे आख्यान गद्य एवं पद्यात्मक हैं। इनके स्वरूप पर पाश्चात्य विद्वानो में अनेक मदभेद है। पद्यभाग में रोचकता होने से स्थिरता अधिक पायी जाती रही है, एवं गद्यभाग में मात्र कथात्मकता होने के कारण अस्थिरता। ऋग्वेदीय संवाद सूक्तो को गद्यात्मक एवं पद्यात्मक होने के कारण (चम्पू शैली) को पाश्चात्य विद्वान "ओल्डेन वर्ग" ने आख्यान नाम दिया है। संगीत का सहारा लेकर (गीत, नृत्य, वाद्य) प्रबंध एवं नाटक कालान्तर में प्रार्दुभूत हुए। इस प्रकार वैदिक साहित्य मे संवाद सूक्तों में कथा का स्वरूप सर्वत्र अर्न्तनिहित है। जो समय-समय पर युग-युगान्तर में परिस्थिति विशेष के परिवर्तन एवं नवीन कल्पनाओ के आधार पर बदलती हुई परिवृद्धित होकर के साहित्य में आकर्षण के केन्द्र है।
ऋग्वेद के अनेकों आख्यान उपवृंहण के आधार पर ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद ग्रन्थ, सूत्रग्रन्थ एवं रामायण, महाभारत तथा पुराणों मे परिवर्तित होकर विश्व-साहित्य में अपना एक अक्षुण्ण स्थान बनाए हुए हैं। वेदों में सम्प्राप्त प्रमुख आख्यान जैसे-शुनःशेप 1/24, अगस्त्य और लोपा मुद्रा 1/179, गृत्समद 2/92, वशिष्ठ और विश्वामित्र 3/53 तथा 7/33, सोम का अवतरण 3/43, त्रयरूप और वृश जान 5/2, अग्नि का जन्म 5/11, श्यावश्व 5/32, वृहस्पति का जन्म 6/71, राजा सुदास 7/18, नहुष 7/95, उर्वशी और पुरूरवा 10/95, सरमापाणि 10/108, देवापि और शान्तनु 10/98, नचिकेता 10/135, च्यवन और सुकन्या 1/116, 117, सोभरि-काण्व 8/19, दध्यंग-आथर्णव 1/116, 12 तथा यम-यमी 10/10 आदि।
उपर्युक्त कथाओं के संरचना की कला अत्यन्त सरल तो अवश्य है किन्तु पूर्ण विकसित नहीं है, ऐसा कहा जा सकता है। इसके साथ-साथ हमें यह भी कहने मे हिचक नही है कि उनमें अतिमानवीय एवं चमत्कारी पात्रों का अभाव सा मालूम पड़ता
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है, किन्तु कथावस्तु का विस्तार एवं चरित्र का पूर्णतया निदर्शन प्राप्त होता है। कमानुसार ब्राह्मण साहित्य में (जो संहिताओं की व्याख्या करते हैं) यज्ञीय विधि-विधानों के साधनाभूत कथाओं का ही आश्रय लेते हैं जैसे-शुनः शेप की कथा, ऐतरेय ब्राह्मण में मनु-आख्यान के रूप में विस्तार लेता है। गौतम राहु-गण की आख्यायिका, उद्दालक और आरूणि की कथा का स्वरूप बनाता है आदि।
इस प्रकार क्रमशः वैदिक कथाओं की अपेक्षा ब्राह्मण की कथाओं में काफी विकास का अनुभव होता है। ये सब कथा-शिल्प के गौरव हैं। तदनन्तर-उपनिषदों अर्थात् अध्यात्म विधा के आगार वेदान्तों में लोकसंदर्भित कथाओं का प्रायः अभाव दिखायी पड़ता है। ब्रह्म-ज्ञान, आत्म ज्ञान, यज्ञीय विधि आदि का चिन्तन एवं व्यवस्था कथा में प्राप्त होता है। वेदों में प्रयुक्त उमा-हैमवती का मुग्धकारी आख्यान, केनोपनिषद मे नचिकेता, कठोपनिषद में सत्यकाम, जाबालि तथा उनकी माता की कथा, इन्द्र विरोचन की कथा, प्राण की श्रेष्ठता विषयक अनेक आख्यान विभिन्न उपनिषदों में गुरू-शिष्य की परम्परा के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में परिवृंहित होते हुए अन्त मे ब्रह्म-ज्ञान में केन्द्रित हो जाते हैं।
कथाशिल्प क्रमानुसार रामायण मे (पूर्व-वर्णित मंजूषा-शैली) के रूप में अपने पूर्ण विकास को सम्प्राप्त राम की आधिकारिक कथा के साथ बहुशः प्रासङ्गिक एवं अप्रासङ्गिक कथाओं का आगार है। रामायण में आध्यात्मिक एवं लौकिक आदि सभी कथा प्रकारों का संतुलन के साथ पूर्ण विकास दिखायी देता है। पात्र एंव संवाद योजना अद्भुत बन पड़ा है। शिक्षा का माध्यम सूक्तियों का उद्रेक बडा ही मनोरम है। पात्रों द्वारा हर प्रकार के क्षेत्रों का जैसे-राज-परिवार, ऋषि-मुनि, कोल-भील, वानर-राक्षस, पुण्यात्मा-पापी आदि का प्रतिनिधित्व कराया गया है। उदाहरणस्वरूप अयोध्याकाण्ड मे श्रवण कुमार की कथा, अरण्य काण्ड में पंचाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, शूर्पणखा, खर-दूषण वध, जटायु, शबरी आदि। किष्किन्धा काण्ड में
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