भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 208 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

है, किन्तु कथावस्तु का विस्तार एवं चरित्र का पूर्णतया निदर्शन प्राप्त होता है। कमानुसार ब्राह्मण साहित्य में (जो संहिताओं की व्याख्या करते हैं) यज्ञीय विधि-विधानों के साधनाभूत कथाओं का ही आश्रय लेते हैं जैसे-शुनः शेप की कथा, ऐतरेय ब्राह्मण में मनु-आख्यान के रूप में विस्तार लेता है। गौतम राहु-गण की आख्यायिका, उद्दालक और आरूणि की कथा का स्वरूप बनाता है आदि।

इस प्रकार क्रमशः वैदिक कथाओं की अपेक्षा ब्राह्मण की कथाओं में काफी विकास का अनुभव होता है। ये सब कथा-शिल्प के गौरव हैं। तदनन्तर-उपनिषदों अर्थात् अध्यात्म विधा के आगार वेदान्तों में लोकसंदर्भित कथाओं का प्रायः अभाव दिखायी पड़ता है। ब्रह्म-ज्ञान, आत्म ज्ञान, यज्ञीय विधि आदि का चिन्तन एवं व्यवस्था कथा में प्राप्त होता है। वेदों में प्रयुक्त उमा-हैमवती का मुग्धकारी आख्यान, केनोपनिषद मे नचिकेता, कठोपनिषद में सत्यकाम, जाबालि तथा उनकी माता की कथा, इन्द्र विरोचन की कथा, प्राण की श्रेष्ठता विषयक अनेक आख्यान विभिन्न उपनिषदों में गुरू-शिष्य की परम्परा के माध्यम से आध्यात्मिक ज्ञान के रूप में परिवृंहित होते हुए अन्त मे ब्रह्म-ज्ञान में केन्द्रित हो जाते हैं।

कथाशिल्प क्रमानुसार रामायण मे (पूर्व-वर्णित मंजूषा-शैली) के रूप में अपने पूर्ण विकास को सम्प्राप्त राम की आधिकारिक कथा के साथ बहुशः प्रासङ्गिक एवं अप्रासङ्गिक कथाओं का आगार है। रामायण में आध्यात्मिक एवं लौकिक आदि सभी कथा प्रकारों का संतुलन के साथ पूर्ण विकास दिखायी देता है। पात्र एंव संवाद योजना अद्भुत बन पड़ा है। शिक्षा का माध्यम सूक्तियों का उद्रेक बडा ही मनोरम है। पात्रों द्वारा हर प्रकार के क्षेत्रों का जैसे-राज-परिवार, ऋषि-मुनि, कोल-भील, वानर-राक्षस, पुण्यात्मा-पापी आदि का प्रतिनिधित्व कराया गया है। उदाहरणस्वरूप अयोध्याकाण्ड मे श्रवण कुमार की कथा, अरण्य काण्ड में पंचाप्सर तीर्थ एवं माण्डकर्णि मुनि की कथा, शूर्पणखा, खर-दूषण वध, जटायु, शबरी आदि। किष्किन्धा काण्ड में

[ 11 ]