भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

राम–सुग्रीव मैत्री, बालि–वध, सम्पाति, हनुमान उत्पत्ति आदि कथायें। उत्तरकाण्ड में विश्रवा, कुबेर एवं राक्षस वंश का वर्णन, रावण के जन्म के विषय में अनेक प्रकार की कथाये, हनुमान जी के उत्पत्ति एवं जीवन से सम्बन्धित अनेक चमत्कारी घटनायें, कुत्ते एवं ब्राह्मण की कथा, निमि और वशिष्ठ, ययाति और उनके पुत्र पुरू, मान्धाता–वध, इन्द्र–वृत्रासुर आदि कथाओ का पूर्ण–विस्तार के साथ सुविकसित वर्णन कथा साहित्य का पूर्ण रूप किसको नहीं, लुब्ध एवं द्रवित करता है। सुन्दरकाण्ड एवं युद्ध काण्ड में प्रायः अधिकारिक कथा राम की ही सम्प्राप्त होती है।

कथा सौन्दर्य की अनुपम कृति महाभारत जैसा ग्रन्थ विश्व के किसी भी साहित्य में अलभ्य है। कथा शिल्प के तीनों क्या और भी चाहे जितनी शिल्प की परिकल्पना की जाये महाभारत सबका आकर है। इसमें भी रामायण की भाँति आधिकारिक कथा के साथ–साथ प्रचुर मात्रा में अवान्तर कथाओं का योगदान है। जो आधिकारिक कथा में चार चाँद लगाती हैं। महाभारत के पश्चात कथा साहित्य की संरचनाओं मे महाभारत की नीतियों का प्रयोग इतस्ततः सर्वत्र दिखायी पड़ता है। इसके लिए एक कहावत चरितार्थ है कि पृथिवी पर सुन्दरतम कथाओं का महाभारत के उपाख्यानों मे पूर्णतया समावेश है। पशु कथा महाभारत में पूर्ण विकसित हुई है। महाभारत की अवान्तर कथाओ मे पर्वो के अनुसार आदिपर्व– में गजकच्छप, समुद्रमन्थन, दुष्यन्त–शकुन्तला आख्यान, माण्डव्य ऋषि, एकलव्य, सुन्द–उपसुन्द आदि। सभापर्व में–जरासन्ध, शिशुपाल आदि। वनपर्व में नल–दमयन्ती, अगस्त्य–लोपामुद्रा, परशुराम, सुकन्या, च्यवन महर्षि, गंगावतरण, मान्धाता, उशीनर, अष्टावक्र, शिवि, मुद्गल, सावित्री चरित्र, कर्णजन्म आदि। उद्योग पर्व में विदुला रन्तिदेव, भरत, पृथु आदि। शल्य पर्व में–त्रिपुरों की उत्पत्ति एवं विनाश की कथा, हंस–कौआ आख्यान, देवल मुनि आदि। शान्ति पर्व में–स्वयंभू मनु, परशुराम, पृथु, केकयराज, व्याघ्र, सियार, इन्द्र–प्रहलाद, मत्स्यत्रयी, विडाल, चूहा, ब्रह्मदत्त, पूजनी चिडिया,

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बहेलिया, कपोत--कपोती आख्यान, जन्मेजय प्रसङ्ग, ब्राह्मण बालक की कहानी, सेमल वृक्ष, वायु आख्यान, गौतम, वृत्रासुर आदि आख्यान। अनुशासन पर्व में-सुदर्शन आख्यान, विश्वामित्र जन्म, गीदड और वानर, शूद्र और मुनि, राजा कुशिक, च्यवन मुनि, राजा नृग की कथा, सप्त-ऋषियो के यज्ञ आदि आख्यान महाभारत जैसे-कथा-साहित्य के शिल्प मे नग हैं।

इसी प्रकार कमानुसार उपर्युक्त कथा साहित्य अपनी अबाध गति की अजस्र धारा बहाता हुआ वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, रामायण, महाभारत की सम्पूर्ण कथा, परम्पराओं को पूर्ण विकसित करते हुए पुराणों में भी अपना अक्षुण्ण स्थान बनाये हुए है। महाभारत की तरह पुराणों की भी विशालता का ओर-छोर नहीं हैं। पुराणों में भी मानव जीवन के हर क्षेत्र के सम्पूर्ण पहलुओं को पुराणों के कथा-साहित्य द्वारा पूर्णतया संस्पर्श एवं संस्कार किया गया है। (आधुनिक भारतीय समाज अपने नियमन को प्रतिष्ठित करता है जिसका मेरुदण्ड पुराण ही है।)$^1$

शब्दकोषो के अनुसार प्राचीन कथाओ एवं आख्यायिकाओं का संग्रह पुराणों का अपर नाम है, जिनमे पवित्रतम् धरोहर के रूप में हमारा कथा-साहित्य सुरक्षित है। धार्मिक दृष्टिकोण से रचा गया यह पूर्ण कथा-साहित्य लौकिक व्यवहारों के समस्त अङ्गों का भी पूर्णतया प्रणयन करता है। पुराणों में आख्यान शैली का प्राबल्य है। मानव-जीवन के अभिन्न अङ्ग, दया, परोपकार, मैत्री, करूणा, आस्तेय, अपरिग्रह, सत्याचरण, ब्रह्मचर्य, साहस, सरलता, निरभिमानिता, त्याग, संयम, व्रत, उपवास, जप-तप, दान, तीर्थाटन आदि के नियमन के प्रसङ्ग पुराणों में सर्वत्र बड़े ही रोचक हैं। पुराणों के अनगिनत उपदेश जो सहस्रों वर्षों से मानव कल्याण हेतु प्रयुक्त होते आये, उनकी आज भी उतनी ही महत्ता है।


1 संस्कृत साहित्य का इतिहास-बलदेव उपाध्याय।

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इतिहास एवं कल्पना के आधार पर ये कथाये पुराणों में आकर वंशानुचरित से सम्बद्ध हुई हैं। विषय वैविध्य की दृष्टि से थोड़े में उपर्युक्त मानक इस प्रकार है–विष्णु परुण, यदुवंश विनाश का आख्यान, अष्टावक्र, राजावेन हिरण्यकशिपु, भरत आख्यान, सौभरि उपाख्यान, इन्द्र, दुर्वासा, निभि, वशिष्ठ, ययाति, शान्तनु आदि आख्यान।

भागवत पुराण मे–अवधूतोपाख्यान, कपोत–कपोती दृष्टान्त, तितिक्षु ब्राह्मण, भिक्षुक दृष्टान्त, कपिलदेव दृति संवाद, ऋषभोपदेश, हंसोपदेश एवं जड–भरत आदि वृत्तान्त। गरूण पुराण मे–प्रेत सम्बन्धित हजारों उपाख्यान प्राप्त होते हैं। शिव पुराण मे–दुर्वासा उत्पत्ति। मार्कण्डेय पुराण में–मदालसा उपाख्यान, पतिव्रता स्त्री एवं मान्डव्य ऋषि, सुरथ आख्यान, राजा हरिश्चन्द्र की कथा आदि।

मत्स्य पुराण में–सावित्री आख्यान, कामुकी नारी की कथा, पुरूरवा–उर्वशी, नहुष, रति और ययाति, शर्मिष्ठा, देवयानी, कार्त्तवीर्य–अर्जुन, विदर्भ, अन्धक वंश की कथा, देवापि, शान्तनु, पाण्डु–धृतराष्ट्र, कौरव–पाण्डव, जन्मेजय, लीलावती वेश्या, राजा पुष्पवाहन, त्रिपुर की कथा, हरिकेश यक्ष की कथा आदि। वामन पुराण में–कूर्मावतार प्रसङ्ग, प्रहलाद, अन्धक एवं कलियुग वृतान्त लिङ्ग पुराण में–श्वेत मुनि का जन्म, दधीचि आख्यान, त्रिपुरासर वध, जलन्धर वध आदि। स्कन्ध पुराण में–दक्ष यज्ञ, शिव–लिङ्गार्चन, समुद्रमन्थन, पार्वती आख्यान, पशुपति आख्यान, चण्डिका, कुमार महात्म्य, नारद समागम, महिषासुर आख्यान, त्रिशंकु, विश्वामित्र मोह एवं एकादश रूद्रों का महात्म्य आदि।

भविष्य पुराण में–कृष्ण–पुत्र शाम्ब की कथा।

ब्रह्माण्ड पुराण में–रामायण की कथा, पार्वती आख्यान, शिव–पार्वती विवाह, दक्ष–यज्ञ विध्वंस, कृष्ण, शिव एवं राम की कथायें समुपलब्ध हैं।

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पद्म पुराण मे-समुद्र-मन्थन, पृथु उत्पत्ति, वृत्तासुर संग्राम, वामनावतार, मार्कण्डेय, कार्तिकेय की उत्पत्ति, तारकासुर वध, सूर्य एवं चन्द्रवश वर्णन, गायत्री और सावित्री आख्यान, सुव्रत, पृथु, वैण, उग्रसेन, सुकर्मा, नहुष, ययाति, च्यवन एवं शकुन्तलोपाख्यान, ध्रुव-चरित्र, शिवि, उशीनरचरित्र, रावण-जन्म, कपिल-ब्राह्मण वृत्तान्त आदि वर्णित हैं।

अग्निपुराण मे-साहित्य के समस्त विषयों के साथ धार्मिक कथाओं का प्रसङ्ग प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण मे-गङ्गा, लक्ष्मी, सरस्वती एवं पृथिवी की कथा, तुलसी, स्वाहा-स्वधा, सावित्री चरित्र, दुर्गा और तारा आख्यान, राधिका आविर्भाव की कथा, गणपति जन्म एवं कर्म और चरित्र का वर्णन, अत्यन्त मुग्धकारी कथायें वर्णित हैं।

कालान्तर में उपर्युक्त शास्त्रों की काव्यधारा में, जैन, बौद्ध कथाओं की धारा का भी सम्मिलन मिलता है। इसीलिए भारतीय कथा-साहित्य की (वैदिक काव्य धारा, जैन काव्य धारा, बौद्ध काव्य धारा) में तीन प्रकार प्रसिद्ध हैं। जैन, बौद्ध कथायें संस्कृत पालि एवं प्राकृत भाषाओ के माध्यम से विश्व कथा-साहित्य में अपना अक्षुण्ण स्थान बनाये हुए है। कथाओं की सर्वोत्कृष्ट कलात्मकता वैदिक कथा धारा में ही निहित है जिसे कीथ जैसे पाश्चात्य विद्वान दुराग्रहवश ब्राह्मणवादी मानते हैं।

लोक में प्रचलित कथाओं को बौद्ध एवं जैनियों ने अपने ढंग से संवारा। बुद्ध के उदात्त चरित्र को प्रस्तुत करते हुये जन्तु कथाओं के द्वारा आदर्श रूप में प्रस्तुत करते हुये लोक में बौद्धों ने भ्रमित लोगों को सन्मार्ग दिया। इनके प्राचीनतम संग्रह अवदानशतक प्रसिद्ध हैं संस्कृत जातकमाला (आर्यशूर-कृत) पालि में रचित बौद्ध कथाओं का निदर्शक है।

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नीति एव धर्म के ही परिप्रेक्ष्य मे उपदेश देने वाली कथाओं का उपयोग जैन मुनियों ने भी किया। (नानाधम्मकहायो) तथा (उत्तराञ्झयण सुत्त) आदि आगम ग्रन्थों मे लोकानुरञ्जन के बहाने वैराग्य का उपदेश दिया गया है। इसी प्रकार अर्द्धमागधी, महाराष्ट्री, प्राकृत मे जैनियो का कथा-साहित्य भण्डार है। संस्कृत में भी जैन मुनियों का कथा-साहित्य के सेवा में बहुत अच्छा कार्य है। इस परिप्रेक्ष्य में "हरिषेणाचार्य" द्वारा रचित "वृहत्कथाकोष" दिगम्बर सम्प्रदाय का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। इसी परम्परा में जैन मुनियों के अनेक अवदान हैं। यथा-श्रीचन्द्र का "कथा-कोश", नेमिदत्त का "कथा कोश", जिनेश्वर "कथाकोश प्रकरण", जयसिंह सूरी "धर्मोपदेशमाला" (प्राकृत), हेमचन्द्र "परिशिष्ट पर्वन" आदि प्रमुख ग्रन्थ है।

इस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण होता है। इस कहावत को पूर्णतया चरितार्थ करती हुई कथा-शिल्प की धारा विपुल संस्कृत-साहित्य का सर्वस्व कही जा सकती है। थोड़े में उपर्युक्त ढंग से सम्प्राप्त कथाओं के विविध स्वरूप का विवेचन स्पष्ट करते हुये मुझे यह कहने मे कि साहित्य में कथा प्राणात्मिका होती है, तनिक भी हिचक नही है। विवेचन के अनुसार यह भी अनुभूति होती है कि आधुनिक साहित्य एवं कालान्तर में भी कालचक्र के अनुसार कथा-साहित्य किसी न किसी रूप में प्रवाहित होता ही रहेगा।

(6) कथा का विकास :

संस्कृत के कथा-साहित्य का विकास वैदिक, संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश आदि कई स्थितियों एवं युगों से होकर गुजरता है। इन सभी युगों में कथा-साहित्य का अपना एक विशिष्ट दृष्टिकोण या एक ही जैसा शिल्प-सौन्दर्य एवं मान्यतायें नहीं रही हैं। वैदिक संहिताओं में कथाओं की जगह कथा के तत्व प्रचुर रूप में फैले हुए हैं। मन्त्र-संहिताओं के संवाद सूक्तों में भारतीय साहित्य के विभिन्न पहलुओं को रूप-रंग और वाणी देने वाले संजीवन तत्व मिलते हैं। मंत्र-संहिताओं की

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अपेक्षा ब्राह्मण ग्रन्थो और आरण्यको में कथा, आख्यान एवं आख्यायिका का एक स्वस्थ दृष्टिकोण पनपता हुआ दिखाई देता है।

वैदिक साहित्य के अन्तिम भाग उपनिषद ग्रन्थों में कथा-साहित्य की मूल सम्पदा छिपी हुई प्रतीत होती है। फिर भी उपनिषदों के इस कथावतरण का मूल उद्देश्य साहित्य की अभिवृद्धि न होकर उससे सर्वथा भिन्न अध्यात्म चिन्तन है। इन कथाओ में भारतीय कथा-साहित्य का संवर्धन करने योग्य विशेषतायें भले ही विद्यमान न हों, किन्तु तत्कालीन जीवन के मुख्य आधार, ऋषि, मुनि, ब्रह्मचारी, पुरोहित और राजा आदि को पात्रो के रूप मे देखकर उन कथाओं की पवित्रता पर बड़ी आस्था होने लगती है। परमात्मा, पुनर्जन्म, मोक्ष-ज्ञान, यश, मृत्यु आदि विषयों पर आधारित उपनिषद् ग्रन्थों की ये कहानियाँ मनोरञ्जन की दृष्टि से भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।

'रामायण' और 'महाभारत' की अवतारणा से ज्ञान के क्षेत्र में दो विभिन्न युगों का सूत्रपात हुआ, पौराणिक युग और महाकाव्यों का युग। 'रामायण' और 'महाभारत' भारतीय साहित्य के दो वृहद् विश्वकोश हैं। 'रामायण' की अपेक्षा 'महाभारत' में ऐसे प्रचुर तत्व विद्यमान हैं। बाल्मीकि और व्यास से भी बहुत पहले राम-रावण और कौरव-पांडवों की कथायें बिखरी हुई थीं। इन कथाओं ने तत्कालीन नट-नर्तक, सूत और कुशीलवों द्वारा सारे समाज में प्रचलित उक्त कथाओं का संशोधन करके रामकथा और पाण्डव-कथा का एक साहित्यिक भव्य रूप उपस्थित किया। 'महाभारत' की सैकड़ों कथायें, आख्यायिकायें और आख्यान इस बात की पुष्टि करते हैं कि उस समय तक कथा-साहित्य का अपना एक विशिष्ट स्थान बन चुका था।

पौराणिक युग ने कथा-साहित्य को अधिक लोकब्यापी बनाया। पुराणों की कथाओं का अस्तित्व बहुत समय तक समाज में मौखिक रूप से बना रहा और इसीलिए एक ओर तो उनमें प्रक्षेप जुडे और दूसरी ओर उनके स्वत्व पर स्वतंत्र दन्त

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कथाओं का निर्माण हुआ। इन पौराणिक लोक प्रचलित कथाओं का प्रभाव उस प्रकाश मे बौद्ध जातकों पर स्पष्ट रूप से पड़ा। भगवान तथागत से सम्बद्ध लगभग 'पांच सौ कथाये' इन जातको मे संकलित है। ये जातक कथायें व्यापक और मानवीय समक्ष के बहुत समीप हैं। इनमें यथार्थ कल्पना और व्याख्या के तत्वों का एक सत्य तादात्म्य होने के कारण कथा के क्षेत्र मे इन जातक कथाओं को प्रथम कलात्मक देन कहा जा सकता है। इन कथाओ में समाज की विभिन्न श्रेणियों के लोग, मनुष्य और पशु-पक्षी, नदी, पर्वत, पेड-पौधे की कहानियाँ बडी ही रोचक हैं।

इन कथाओं की ऐसी सवाभिभूत भावना का एक मात्र कारण उनके सुन्दर कथाशिल्प एवं उनको मनोवैज्ञानिक ढंग से सजाने की निपुणता में है। ये कथा कहानियाँ कुछ तो तत्कालीन जीवन के पराक्रमों पर आधारित हैं, कुछ समुद्री यात्राओं से सम्बद्ध, कुछ आश्चर्यपूर्ण घटनाओं से युक्त, कुछ आकाश लोक एवं गन्धर्व लोक का चित्रण करने वाली, कुछ धर्म प्रेरणा से पूरित, कुछ नीतिपूरक और अधिकांश शिक्षात्मक तथा उपदेशात्मक ही हैं।

(7) कथा का महत्व :

भारतीय संस्कृति में संस्कृत साहित्य का योगदान पूरे भू-मण्डल पर छिपा नहीं है। उसका मूलभूत कथा-शिल्प भारतीय शिल्पकारों द्वारा अत्यन्त बारीकी एवं मनोवैज्ञानिक रीति से प्रस्तुत किए जाने के कारण संसार में कथा रसिकों के सम्प्रदाय में अत्यन्त सम्मानित एवं सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करता हुआ प्रशंसित होता चला आया है। वैदिक काल से लेकर आज तक संस्कृत कथा साहित्य एक लम्बे अरसे से विभिन्न युगों में विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल क्रमशः विकसित होता चला आ रहा है एव देश-विदेशों में भारतीय कथायें अनुवाद के रूप में भी सर्वत्र प्रसारित हुई हैं।

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कथा साहित्य के अंकुरण से लेकर फल तक का विकास सुस्पष्ट है। संहिताओं में प्रक्षिप्त होकर धीरे-धीरे कालान्तर मे वही कथा के तत्व बीज रूप में ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यको के आख्यानों में पूर्णतया अंकुरित होकर रामायण, महाभारत, पुराणों के आख्यानो मे पल्लवित, वृहतकथा, जातक, पञ्चतन्त्र में आकर विकास के क्रम में पुष्पित होते हुए बेताल-पचविंशतिका, दशकुमार-चरित एवं हितोपदेश आदि कथा सग्रह के रूप में समाज के सच्चे मायने में पथ प्रदर्शक हैं।

कथा साहित्य प्राचीन काल से लेकर अब तक की अपनी पूरी यात्रा में सस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि अनेकशः भाषाओं का सहारा लेकर युगों से प्रवाहमान होता हुआ एक ही जैसा दृष्टिकोण या शिल्प सौन्दर्य तथा मान्यतायें नहीं रखा, बल्कि विकास के क्रम मे उच्चाउच्च मार्गों को लाँघते हुए भी भारतीय चिन्तन का निर्देशन एवं शिक्षा बदलते हुए भी परिस्थितियों एवं शिल्प में करता आ रहा है। अपनी संजीवनी शक्ति से भूमण्डल पर विभिन्न रूप से अविकसित कथा शिल्प में पूर्ण योगदान करता चला आ रहा है।

कथा साहित्य सबसे अधिक संबलित एवं विपुल संपदा से ओत प्रोत वैदिक काल के उपनिषद् ग्रंथो में विद्यमान है। उन्ही से अनुप्राणित होकर रामायण, महाभारत कालीन कथा-साहित्य सुविकसित होकर विश्व में अपना कोई शानी नहीं रखता। थोडे में हमने पीछे भी कथा साहित्य के विकास पर छिट-पुट विमर्श किया है। अब यहाँ भी इसके विकास पर अधिक न कहकर केवल आध्यात्मिक चेतना से भरपूर मनोरञ्जन की दृष्टि से भी पूर्ण उपयोगी भारतीय कथा कहानियाँ नीतिपरक एवं अधिकांशतः शिक्षाप्रद एवं उपदेशात्मक ही हैं, चाहे वह किसी रूप में बदलती-बिगड़ती कालक्रम में ढलती रही हैं।

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(8) भारतीय कथा-साहित्य की विशेषतायें :

कथा साहित्य की निम्नतः विशेषताये हैं :-

1 कथानको मे नाटकों और काव्यों की भांति पौराणिक या ऐतिहासिक, पात्रों का प्रयोग नहीं होता है बल्कि शुद्ध काल्पनिक जगत का चित्रण मिलता है। यह कथन प्रारम्भिक कथाओं मे तो सत्य प्रतीत होता है, कालान्तर में कुछ ऐतिहासिक कथायें भी लिखी गई।

  1. जीव-जन्तु और पशु-पक्षी भी मानव की बोली-बोलते हैं, अभिनय करते हैं, रोचक ढंग से मानवों को उपदेश देते हैं, उनके साथ सम्पर्क स्थापित करते हैं एवं उनकी सहायता करते हैं तथा स्वयं भी उनसे सहायता की अपेक्षा रखते हैं।

  2. निवेदन की मंजूषा विधि का प्रयोग ब्राह्मण-काल से विस्तार को प्राप्त कर पुराण काल तक पूर्ण परिपक्व अवस्था को प्राप्त होता है।

4 कथा साहित्य का एक विशेष प्रकार नीति कथायें भी हैं। "कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते" अर्थात ये बालोपयोगी हैं और कथाओं के माध्यम से इनमें नीति के रहस्यो की शिक्षा दी जाती है।

  1. इसमें मानव पात्र न होकर जीव-जन्तु या पशु-पक्षी पात्र होते हैं।

  2. ये मुख्यतया नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र से सम्बद्ध हैं।

7 इनमें जीवन का व्यवहारिक पक्ष वर्णित होता है। दैनिक जीवन, दैनिक व्यवहार, व्यक्ति और समाज का सम्पर्क कर्तव्याकर्तव्य का उपदेश आदि वर्णित होता है।

8 इनमें नीति एवं धर्म की शिक्षा दी जाती है, अतः धर्मशास्त्र से भी इनका सम्बन्ध है।

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  1. इनमें जीवन का लक्ष्य आदर्शवादिता न बताकर लोक-व्यवहारज्ञता एवं नीति निपुणता बताया गया है।

  2. इनमें जीवन के भले और बुरे दोनों पक्षों का वर्णन है। जैसे-जीवन की पवित्रता, कर्तव्य पालन, मित्र की रक्षा, वचन-पालन आदि गुणों के वर्णन के साथ ही ब्राह्मणों का छल-प्रपञ्च और दम्भ, अन्तःपुर के कपट-व्यवहार, स्त्रियों की दुश्चरित्रता आदि दोषो का भी वर्णन है।

  3. नीति कथाओं के पात्र पशु-पक्षी आदि मनुष्यों के तुल्य मित्रता, प्रेम, विवाद, लोभ, छल, सन्धि, विश्वासघात, विग्रह आदि करते हैं। उनके राजा, मन्त्री, दूत आदि सभी कुछ हैं। वे अवसरोचित सभी कार्य करते हैं। ये मानवीय गुणों और स्वभाव से युक्त होते हैं।

  4. इनमे प्रमुखता के लिए आदेश या नीति का अंश पद्यों में दिया गया है और कथा गद्य मे दी गई है। एक भाव वाले विभिन्न श्लोक अनेक नीति ग्रन्थों से संग्रह करके वक्तव्य की पुष्टि के लिए दिए गये हैं। स्थान-स्थान पर प्रसङ्गानुसार सुभाषित भी नीतिग्रन्थों आदि से दिए गये हैं।

  5. इनका प्रतिपाद्य विषय सदाचार, राजनीति और व्यवहार ज्ञान है।

  6. इनमें जीवन की सफलता के लिए आवश्यक सभी गुणों का वर्णन है। जिन बातों को न जानने से मनुष्य जीवन में असफल हो जाता है, उनकी चेतावनी भी कथाओं द्वारा दी जाती है।

  7. ये नीति-कथायें, पशु-पक्षियों आदि से सम्बद्ध हैं, अतः मानव मात्र के लिए रोचक और उपादेय हैं।

  8. इनमे एक मुख्य कथा के अन्तर्गत अनेक उपकथाओं का समावेश होता है।

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  1. इनकी शैली सरल और सुबोध है। इनमें पाण्डित्य प्रदर्शन का सर्वथा अभाव रहता है। कथा में प्रवाह और रोचकता है।

  2. इनमें कथा, नीति, सदाचार, व्यवहार ज्ञान, धर्म, दर्शन, उपदेश और काव्य-सौन्दर्य का सुन्दर समन्वय रहता है।

  3. नीति कथायें गद्य मे और उनसे प्राप्त होने वाली शिक्षा पद्य में वर्णित है। इनका उद्देश्य रोचक कथाओं द्वारा त्रिवर्ग की बातों का मार्मिक उपदेश देना है। इनमे चुभते हुए मुहावरे, अनूठी लोकोक्तियाँ तथा रोचक दृष्टान्तों का सर्वत्र प्राधान्य है।

20 कादम्बरी के अतिरिक्त समस्त सस्कृत-साहित्य प्रसादगुण वाली भाषा में लिखा गया है।

  1. जहाँ भी कथा के मध्य छन्द आये हैं, आर्या, अनुष्टुप आदि लघु छन्द ही प्रमुख हैं, किन्तु कालान्तर में रचित कथाओं के मध्य विशालकाय चतुःचरण वाले छन्द भी प्राप्त होते हैं।

  2. सामासिक शैली के प्रधान ग्रन्थों "दशकुमारचरित", "वासवदत्ता" एवं कादम्बरी के अतिरिक्त वर्णन विस्तार न्यून रूप से प्राप्त होता है।

  3. नीति कथायें जहाँ उपदेश प्रधान होती हैं, वहीं लोक कथायें कल्पना प्रधान। यदि नीति कथायें पशु-पक्षियों से सम्बन्ध रखती हैं तो लोककथायें मानव जीवन से अनुस्यूत ही नहीं अनुप्राणित भी हैं।

इस प्रकार भारतीय कथायें सामान्य रूप में भारतीय-संस्कृति के अनुसार चलने तथा लोक व्यवहार में निपुण होने का आदेश देती हैं। इनकी शैली सरल एवं रोचक हैं तथा इनमें पांडित्य-प्रदर्शन का सर्वथा अभाव हैं, कथा में प्रवाह और रोचकता सदैव बनी रहती है। "शुकसप्तति" भी इसी प्रकार की रचना है।

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(9) संस्कृत साहित्य में रचित कथा ग्रंथ :

संस्कृत-साहित्य के अन्तर्गत अनेक कथा ग्रन्थों की रचना हुई, जिनमें प्रथम शुद्ध कथाग्रन्थ विष्णुशर्मा कृत "पञ्चतन्त्र" को माना जा सकता है। " पञ्चतन्त्र" में कल्पित कथाओं का बाहुल्य है तथा साहित्यिक एवं कलात्मक तत्वों का पर्याप्त अभाव है। तथापि " पञ्चतन्त्र" कल्पित-कथाओं का वृहत् संकलन है। तत्पश्चात वह गुणाढ्य कृत "वृहत्कथा" तथा उसके तीन सस्करण के रूप में नेपाल के बुद्धस्वामी कृत "वृहत्कथा संग्रह" (8 वी शताब्दी) क्षेमेन्द्र की "वृहत्कथा मंजरी" तथा सोमदेव भट्ट कृत "कथा सरित्सागर" (1063 से 1081 ई०) का स्थान आता है। इसके पश्चात् कथा-ग्रथो की दीर्घ परम्परा प्राप्त होती है, जिसमें जम्भलदत्त, शिवदास, वल्लभदास तथा सोमदेव के सस्करणो में प्राप्त वेताल कथा-चक, सिंहासनद्वात्रिंशका अथवा द्वात्रिंशत्पुत्तलिका अथवा विक्रम-चरित (1018-63 ई०) शुकसप्तति (लगभग 12 वी शताब्दी), मैथिल कवि विद्यापति कृत "पुरुषपरीक्षा" (15 वी शताब्दी), शिवदास कृत "कथार्णव" (15 वीं शताब्दी) बल्लाल सेन का "भोजप्रबन्ध" (16 वीं शताब्दी) जगन्नाथ मिश्र का "काव्यप्रकाश" (16 वीं शताब्दी) नारायण बालकृत "ईसन्नीति कथा" में ईसप् की कहानियो का "Aesop's Febles" अनुवाद है।

विक्रम चरित सम्बद्ध अनेक कथा-ग्रंथों की रचना की गई है, जैसे-अनन्त रचित "वीर चरित", शिवदास कृत "शालिवाहन कथा", अज्ञात लेखक कृत "विक्रमोदय", मेरूतुंग कृत "प्रबन्ध चिन्तामणि", राजशेखर कृत "प्रबन्ध कोश", हेमचन्द्र कृत "त्रिषष्टिश्लाका पुरूष चरित", सिद्धर्षि कृत "उपमति-भाव प्रपञ्च कथा", जगन्नाथ मिश्र रचित "कथा-प्रकाश", "कथा-कोष, प्रभाचन्द्र कृत "प्रभावान चरित", समय सुन्दर कृत "कालिकाचार्य कथा," सोमचन्द्र रचित "कथा महोदधि", कवि कुंजर कृत "राजशेखर चरित", अज्ञात लेखक कृत "मुक्त चरित", नारायण शास्त्री रचित "कथा लतामञ्जरी," कृष्णराव कृत "कथा पंचक" पाण्डुरंग कृत "विजयपुर कथा" रामास्वामी शास्त्री कृत "कथावली" रामास्वामी शास्त्री कृत "कथावली" तथा "कथाकुसुममञ्जरी आदि।

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संस्कृत की लघु कथाओ के विकास का युग 19 वीं शताब्दी का अन्तिम दशक व 20 वीं शती का प्रारम्भिक काल कहा जा सकता है। सहस्त्राधिक लघु कथायें 1898 ई० से 1910 ई० के मध्य लिखी गई हैं जिनका स्वतन्त्र संग्रहों के रूप में प्रकाशन हुआ है। संस्कृत की लघु कथाओं से सम्बन्धित नौ संग्रह भी इसी समय में निकले हैं तथा दो संग्रह 1898 ई० मे प्रकाश में आये।¹ अम्बिका दत्त व्यास के "रत्नाष्टक" में हास्य व उपदेश प्रधान आठ कहानियों का सग्रह है तथा वेंकट रामशास्त्री के "कथा शतकम्" में देशी-भाषाओं की सौ लघु कथायें सन्निहित हैं। व्यास जी द्वारा कृत "कथा कुसुमम्" में भावपूर्ण कहानियो का समावेश है। 1900 ई० संस्कृत कथाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण वर्ष है, क्यों कि इस वर्ष तीन कथा संग्रह प्रकाश में आये।

  1. कथा संग्रह – केरल वर्मवलिय कोइतम्बुरान।

  2. कथा कल्पद्रुम – "अरेवियन नाइट्स" का अनुवाद – अप्पाशास्त्री राशिवडेकर।

  3. शेक्सपियर नाटक कथावली– मेरी लम्ब के "टेल्स फ्राम शेक्सपियर" का अनुवाद– मेडिपल्ली वेंकट रमणाचार्य।

इन सग्रहों में से प्रथम तो सामाजिक व मनोवैज्ञानिक लघु कथाओं का संग्रह है तथा अन्तिम दो अनूदित कृतियाँ हैं।

व० अनंताचार्य कोडम्बकम् ने 1901 ई० में "कथामञ्जरी" तथा "नाटक कथा" ये दो कथा सग्रह प्रकाश मे लाये। मन्दिकल राम शास्त्री की रचना "कथासप्तति" 1904 ई० में प्रकाश में आई तथा के० तिरुनारायण अयंगर की "गद्यकथा" संग्रह 1910 ई० मे प्रकाश में आयी। ये दो कहानी संग्रह इस युग के सर्वोत्कृष्ट संग्रह कहे जा सकते हैं।


¹ उद्धत 'आधुनिक संस्कृत साहित्य', डॉ० हीरालाल शुक्ल, रचना प्रकाशन 45ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद। प्रथम संस्करण 1971, पृष्ठ– 136-39

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इसके अतिरिक्त सैकडो कथायें समयानुसार प्रकाशित हुईं जो निम्न वर्गों में विषयानुसार विभाजित की जा सकती हैं।

पौराणिक कथायें :

"मणिकुण्डलापाख्यान" "दधीच्युपाख्यान" तथा "पौराणिकी काचिकथा" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर), "उषाहरणम्" (उपेन्द्रनाथसेन कृत), "शिवहास्यम्" (मनुजेन्द्रदत्त कृत), "सत्यदेव-कथा" (रामावतार शर्माकृत), "भद्रसोमा" चारूचन्द्रवन्द्योपाध्याय कृत।

उपदेश प्रधान :

"अदूरदर्शिता", "संशयात्मा विनश्यति" (द्वारका नाथ शर्मा), "शत्रुसंकीर्णे कथ वस्तव्यम्" (नन्दलाल शर्मा) कृत, "दशापरिणति:", "चित्रकार चातुर्यम्", "कुटिल मतिनिमि गोमायु:", "बकचापलम्", "भगवद् भक्त:", "किमर्थ सद्गुरु:" (अप्पाशास्त्री राशिडेकर) कृत, "व्याघ्री विवाहार्थी शृगाल:", "वशीकृत भूत:", "धर्मस्यासूक्ष्मागति:", "ईश्वरस्यधनदानक्रम:" "राक्षसप्रश्नम्", "बुद्धिमाहात्म्यम्" (नयचन्द्र सिद्धान्त भूषण भट्टाचार्य) कृत।

भावात्मक और मनोवैज्ञानिक :

"मदीय: स्वप्न:" (रामनाथ शास्त्री), "सत्यो बालचर:" "विषया समस्या", "बालक भृत्य:" (भट्ट-मथुरानाथ शास्त्री), "साधुमणि:" (के० श्रीनिवास), "रामोनास्तीह भूतले" (उपेन्द्र चन्द्र व्याकरणतीर्थ), "छापापथ:" (चन्द्रचूड़ शर्मा), "प्राधान्यवाद:", "विप्रलब्धा:" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर) कृत।

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हास्य एवं व्यंग्यपरक :

"लालाव्यायोगः", "चषण्डुकः", "शिष्या", "फाल्गुनी गोष्ठी" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "कलिप्रादुर्भाव" (वाई० महालिंग शास्त्री), "दर्दुर विलापः" (चन्द्रचूड़ शर्मा), "वेषमाहात्म्यम्", "व्यसन विमोक्ष", "पुरोहितधौर्त्यम्" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर)।

सामाजिक :

"अपत्यविक्रमः", "क्षुत्कथा", "दीनकन्यका" (विधुशेखर भट्टाचार्य), "वासन्ती" (दिवेन्द्र ब्रह्मचारी), "एकवार दर्शनम्", "दमनीया", "अनावृता" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "ममगृह रहस्यम्" (विश्वेश्वर शर्मा), "पल्लिच्छविः" (उपेन्द्र नाथसेन), "श्रीमती विद्यासुन्दरी देवी" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर), "स्त्री चरितम्", "नैष्ठिक ब्रह्मचारी", (चारूचन्द्र वन्द्योपाध्याय)।

प्रणय सम्बन्धी :

"प्रेमणः प्रतिदानम्", "दीक्षा" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री) "यथार्थ प्रेमिका", "आदर्श पतिः" (चारूचन्द्र वन्द्योपाध्याय)।

ऐतिहासिक :

"क्षत्रिय-पराक्रम" (हरिप्रसाद नर्मदेश्वर), "अंगुलिमालः", "पुरूराजः पौरूषम्", "भारतध्वजः", "विजयिघण्टा", "अत्याचारिणः परिणामः", "पृथ्वीराज पौरुषम्" "आल्हा च ऊदलश्च", "सिंह दुर्गे सिंह वियोगः", "वीरवाणी", "कृत्रिम वूनदी", "चिर अमर हवे बलिदाने", "सामन्त संग्रामः", "अनुपताः" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "बहूपचिकीर्षा-पन्नाधाय" (द्वारका नाथ शर्मा), "क्षत्रकथा-गौतम बुद्ध" (विधुशेखर भट्टाचार्य), "सयोगिता स्वयंवर" (परशुराम शर्मा वैद्य)।

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द्वितीय अध्याय : कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना

विविध :

"दानी दिनेश.", "करूणा कपोती च युवती च" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "परिहासाचार्य", (परशुराम शर्मा वैद्य)।

मौलिक लेखन व अनुवाद की पद्धति के अतिरिक्त सार प्रस्तुतीकरण की पद्धति को भी इस युग के लेखको ने स्वीकार किया जो इस प्रकार है–

1 "रघुवंश सार"- (1900) दत्तात्रय वासुदेव निगुडकर 2. "भास कथा सार"- वाई महालिंग शास्त्री (1897–1965) 3 "कादम्बरीकथासार"- (1900)- नन्द लाल शर्मा 4. "चन्द्रापीड चरितम्"- (1909)- व० अनन्ताचार्य 5. "कादम्बरी कथासार"- आर०वी० कृष्णमाचार्य- (1874–1944) 6. "कादम्बरी कथासार"-त्रयंबक शर्मा काले- (1916) 7. "संक्षिप्त कादम्बरी"- (1916)- काशी नाथ शर्मा 8. "हर्षचरित सार"- व० अनन्ताचार्य 9. "हर्षचरित सार"-आर०वी०कृष्णमाचार्य- (1874–1944) 10 "उदयन चरितम्"-18 अध्याय व० अनन्ताचार्य।


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द्वितीय अध्याय

कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना

''कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना''

(क) काव्य-विभाजन में कथा का स्वरूप एवं स्थान :

(1) काव्य का स्वरूप :

काव्य शब्द 'कु शब्दे धातु से ण्यत्' प्रत्यय लगकर निष्पन्न होता है। काव्य के दो पक्ष हैं-(1) अनुभूति और (2) अभिव्यक्ति। कवि अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति के माध्यम से श्रोता, दर्शक या पाठक तक सम्प्रेषित कर उसे आनन्द मग्न करता है। अभिव्यक्ति के अनेक स्वरूप हो सकते हैं। यही कारण है कि साहित्य के अन्तर्गत काव्य एव काव्यशैलियों के अनेक रुप प्राप्त होते हैं। अनुभूतियों का ग्रहण नेत्रोन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय द्वारा होता है। इन्द्रियग्राहिता के आधार पर काव्यशास्त्रियों ने काव्य के दो भेद किये हैं-दृश्य एवं श्रव्य।¹

भरत ने दृश्य काव्य के पुनश्च दो भेद किये हैं-(1) रुपक (2) उपरुपक।

शैली के आधार पर श्रव्य काव्य के भी तीन भेद किये जा सकते हैं-(1) गद्य काव्य, (2) पद्य काव्य, (3) चम्पूकाव्य²।

कथा की अभिव्यक्ति प्राय. गद्य के माध्यम से होती आयी है किन्तु कभी-कभी उनमें गद्य के साथ पद्य का भी प्रयोग बहुतायत रुप में हुआ है।

(2) कथातत्व :

काव्य का वह अपरिहार्य तत्व है जिसके बिना काव्य रचना सम्भव नहीं है। कथातत्व काव्य का मूलाधार है। भारतीय वाङ्गमय में ही नहीं अपितु विश्व वाङ्गमय के अन्तर्गत किसी भी विद्या के ज्ञान हेतु चाहे वह दार्शनिक हो, साहित्यिक हो, अथवा भौतिक या अधिभौतिक हो कथा तत्व का आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार साहित्य की प्रत्येक विधा में कथा तत्व का होना अनिवार्य है। अतैव दशरूपक-कार रूपकों के प्रमुख तीन तत्व मानते हैं-


  1. "दृश्यश्रव्यत्व भेदेन पुनः काव्यंद्धिधा मतम्।
    दृश्यं तत्राभिनेयं तद्रूपारोपात्तु रूपकम्।।" ''नाट्यशास्त्रा''-32/385
  2. गद्यं पद्य च मिश्रं च तत् त्रिधैव व्यवस्थितम्।"-'काव्यादर्श'1/11.

1 वस्तु, 2 श्रोता, 3 रस।¹

अरस्तू ने भी-कथावस्तु को "ट्रेजडी" की आत्मा माना है। एक अतिलघु कथा का सूत्र कथातत्व से संयुक्त होने पर विशालग्रन्थ का आकार ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार कथातत्व काव्य का प्राण तत्व है।²

(3) कथातत्व एवं कथावस्तु में भेद :

संस्कृत आचार्यों ने कथातत्व को विभिन्न नामों से अभिहित किया है—"कथातत्व, वस्तु, कथानक, इतिवृत्त, कथावस्तु आदि" किन्तु सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनमें कुछ मौलिक भेद अवश्य है। "भरत ने कथावस्तु को इतिवृत्त कहा" ।³

"दशरूपककार धनञ्जय ने इसे वस्तु कहा"⁴

"साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ ने भी इसे वस्तु कहा"⁵ अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कथातत्व, वस्तु और इतिवृत्त का प्रयोग समान अर्थ में हुआ है और कथावस्तु या कथानक का प्रयोग दूसरे अर्थ में। वस्तुतः कथातत्व वह सूत्र है जिसके आधार पर किसी भी काव्य की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसी सूत्र को एक नाटककार—उसे नाटकीय लक्षणों से युक्त करके जब रचना करता है तो वह विधा नाटक कहलाती है। इसी प्रकार एक "महाकाव्यकार" उसे महाकाव्य के लक्षणों से


1 इत्याद्यशेषमिह वस्तुविभेदजात रामायणादि च विभाव्य वृहत्कथा च।
आसूत्रयेत्तदनु नेतृरसानुगुण्याच्चित्रा कथामुचितचारूवच प्रपञ्चैः।
"दशरूपक" प्रथमप्रकाश, कारिका 129, पृ0 106
2 "The plot contains the kernel of that action which is the busibess of tragedy to represent."
Poetry and Fine Art : Butcher Page 337.
उद्धत - "नाटक के तत्व-सिद्धान्त और समीक्षा", विष्णु कुमार त्रिपाठी, पृ0 661
3 "इतिवृत्त तु काव्यस्य शरीर परिकीर्तितम्।
पञ्चिभि सन्धिभिस्तस्य विभागाः परिकीर्तिताः ।। "
"इतिवृत्त द्विधा चैव ..... . .. ... .. .।"
भरत, "नाट्यशास्त्र", एकविंश अध्याय, श्लोक 1-2
4 वस्तुनेता रसस्तेषा भेदक' ।"
"वस्तु च द्विधा।" "दशरूपक", प्रथम प्रकाश, कारिका 16-17, पृ0 12
5 कथायां सरस वस्तु गद्यैरेव विनिर्मितम्- ।, साहित्य दर्पण' 6/332

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युक्त करके उसमे रसभाव आदि के अनुसार परिवर्तन, परिवर्धन करता है तो वह रचना महाकाव्य बन जाती है ठीक इसी प्रकार कथाकार जब उसे कथा के वैशिष्ट्य से युक्त कर देता है तो वह रचना कथा कहलाती है। इस प्रकार एक कथासूत्र ही कथावस्तु का रूप ग्रहण करती है। इसी प्रकार कहा जा सकता है कथातत्व इतिवृत्त या Plot साहित्यिक आवरण ओढने से पूर्वावस्था का नाम है तथा कथावस्तु या कथानक साहित्यिक ढाँचे का नाम है।

कथावस्तु का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। सम्पूर्ण चराचर जगत आतिदैविक, आतिभौतिक, परिस्थितियाँ भौतिक सुख-दुःख, जन्ममृत्यु, जय-पराजय, उत्थान, पतन इत्यादि परिस्थितियाँ कथावस्तु के विषय बनकर कवि को काव्य निर्माण हेतु प्रेरणा प्रदान करती हैं। भूत-भविष्य वर्तमान की समस्त घटनायें कथावस्तु के अन्तर्गत समाहित होती हैं। इस प्रकार जीवन का कोई भी रहस्य संसार का कोई भी विषय कथावस्तु से अछूता नही है।

(4) कथावस्तु का महत्व :

समस्त संस्कृत वाङ्गमय "शिवेतरक्षतये" तथा "सद्यः परनिर्वृतयै" आदि महान उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सर्जित है। अतः संस्कृत साहित्य की प्रत्येक विधा में यह उद्देश्य कूट-कूट कर भरा है। संस्कृत-साहित्य की कथावस्तु में मानव की समस्त शाश्वत प्रवृत्तियों का चित्रण हुआ है। कुछ काव्याचार्यों ने चर्तुवर्ग फल प्राप्ति को ही काव्य का उद्देश्य माना था किन्तु अन्त में बात "सद्यः परनिर्वृतयै" अर्थात् लोकोत्तर आनन्द की प्राप्ति पर ही टिकती है। काव्य का यह उद्देश्य वस्तु के माध्यम से ही संभव होता है। अतः कथावस्तु के महत्व को सभी आचार्यों ने एक स्वर से स्वीकारा है।¹


1 "Tragedy is essentially an imitation not of persons out of action and life, of happiness and misery.......and gainth most powerful elements of attraction in a tragedy the peripeties and discovering are part of the plot" —Aristotle "on the art of poetry" Translated by Ingram by water.

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