शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
चतुर्थ अध्याय : कथा में पात्रों का विधान एवं शुकसप्तति के पात्रें का परिचय
कुछ जगह पक्षियों से सम्बन्धित कथाये भी हैं जैसे मन्दोदरी और उसके मयूर भक्षण की कथा।
एकादिक कथायें चोरो से सम्बन्धित हैं जैसे-सर्षपचौर की कथा।
कुछ कथायें भूत एवं पिशाचों से सम्बन्धित हैं- जैसे मूलदेव एवं पिशाच की कथा, करगरा एवं करगरानाथ की कथा।
इन पक्षियो एव भूत-प्रेतों की कथा के माध्यम से कवि ने सबल पर निर्बल की विजय किस प्रकार होती है आदि भावना का प्रदर्शन किया है।
इस प्रकार समस्त 70 कहानियों का पर्यालोचन करने के बाद दो ही प्रमुख विचार सम्मुख आते हैं-
- विवाहित स्त्री द्वारा कुमार्ग का अनुसरण न करना।
- पराक्रमी, शूरवीर किन्तु धोखेबाज प्राणियों से कमजोर व्यक्ति किस प्रकार अपनी रक्षा करें।
प्राचीन काल से चली आ रही ये दोनों ही भावनायें आज भी समाज में देखी जा सकती है।
[ 112 ]
चतुर्थ अध्याय
कथा में पात्रों का विधान एवं
शुकसप्तति के पात्रों
का परिचय
“कथा में पात्रों का विधान एवं शुकसप्तति के पात्रों का परिचय”
(अ) कथा में पात्र विधान
(1) कथा में पात्रों की उपयोगिता :
किसी भी काव्य का मूलाधार पात्र ही होता है। दशरूपक में धनञ्जय ने रुपक के प्रमुख तीन भेदक तत्व माना (1) वस्तु, (2) नेता, (3) रस। “वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः”।
वस्तु के पश्चात् पात्र कथा का अनिवार्य तत्व है क्योंकि पात्रों के अभाव में कथा का विकास असम्भव है। कथानक के अन्तर्गत पात्रों के आचरण, पात्रों के व्यवहार, उनके कथोपकथन, उनकी जीवनचर्या तात्कालिक सामाजिक एवं सास्कृतिक परिस्थितियों का बोध कराते हैं, साथ ही साथ कर्ता, कवि के जीवन आदि का रहस्योद्घाटन करते हैं।
पात्र रसभिव्यक्ति के केन्द्र बिन्दु होते है। वहीं कथा का आदि और अन्त कर्ता होता है। अतएव कथा में पात्रो की उपस्थिति तो और भी अनिवार्य हो जाती है। लघु कथाओ के अन्तर्गत विस्तृत विविधरूपो का दिग्दर्शन कर पाना तो कवि के लिए कठिन हो जाता है, किन्तु कवि पात्रों के चरित्र चित्रण के माध्यम से विविध प्रकार के जीवन संदेश देने का प्रयास करता है।
'शुकसप्तति' के कथाओं के अन्तर्गत विविध प्रकार के पात्रों का कथन हुआ है। इसमें राज परिवार, ब्राह्मण, राजा-महारानियाँ, राजकुमार, मन्त्री, सेनापति, स्वामीभक्त, सेवक, चोर, कपटी, दास-दासियाँ, गणिकायें गन्धर्व इत्यादि सभी वर्गों के पात्रों का इन कथाओं के माध्यम से वर्णन हुआ है।
(2) पात्रों का वर्गीकरण :
पात्रो का वर्गीकरण कई आधारो पर किया गया है। सामान्यतया पात्र दो वर्गों मे रखे जाते है, (1) पुरुष पात्र, (2) स्त्रीपात्र। शुकसप्तति के समस्त पात्रों को प्रमुख रूप से चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है -
(1) समस्त पुरूष पात्र, (2) समस्त स्त्री पात्र, (3) पशु एवं पक्षी श्रेणी के पात्र, (4) भूत, पिशाच आदि। यद्यपि कथाओं में प्रधानता स्त्री और पुरुष पात्रों की है।
(क) इतिवृत्त के आधार पर :
कथावस्तु किसी भी रचना का मूलाधार है। कथावस्तु के स्वरूप के अनुसार ही उसके अन्तर्गत आने वाले समस्त पात्रों का स्वरूप निर्धारित होता है। कथावस्तु भी कई प्रकार की होती है दिव्य, अदिव्य अर्थात् मर्त्य और दिव्यादिव्य। दिव्य कथावस्तु के पात्र दिव्ययोनि के, अदिव्य में पृथ्वी लोक के तथा दिव्यादिव्य के अन्तर्गत पृथ्वीलोक से सम्बन्धित ऋषि, मुनि इत्यादि पात्र आते हैं।
शुकसप्तति के अधिकांश पात्र मर्त्य अर्थात् अदिव्य श्रेणी के हैं। कुछ पात्र जैस-गन्धर्व आदि दिव्य कोटि के है। जिनका परिचय आगे दिया जायेगा।
(ख) घटनाओं के आधार पर :
कथावस्तु की आवश्यकता एवं रसपरिपोषण की दृष्टि से अनेक प्रकार की घटनाओं की संरचना कवि करता है। जैसी घटनायें होती हैं उसी के अनुसार पात्रों का भी सृजन किया जाता है। कुछ घटनाओं का विषय राजवर्गीय होता है। कुछ प्रजावर्गीय अर्थात लोक या समाज से सम्बन्धित होती हैं। कुछ आर्षवर्गीय पात्रों को लेकर के उपदेशात्मक होती हैं। इस प्रकार घटनाओं के आधार पर पात्रों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- (1) राजवर्गीय, (2) प्रजावर्गीय (लोक एवं समाज), (3) आर्षवर्गीय।
[ 114 ]
राजा, मन्त्री, महारानियाँ, राजपुरूष इत्यादि राजवर्गीय पात्रो के अंतर्गत आते है जिनका पर्याप्त वर्णन शुकसप्तति मे हुआ है। जैसे- पुष्पहास और रानी, राजा सुदर्शन, राजा शत्रुमर्दन एव पुत्री मदनरेखा आदि की कथायें।
प्रजावर्गीय पात्रो मे साधारण कोटिक स्त्रियाँ, ब्राह्मण, वणिक्, कृषक, चोर, धूर्त, सेवक, (मास विक्रेता) अधिकांश कथाओं के पात्र इसी श्रेणी के हैं।
अनेक कथाओ मे शुकसप्तति में इस प्रकार के पात्रों का वर्णन है।
आर्षवर्गीय पात्रो मे ऋषि, मुनि, सन्यासी इत्यादि पात्र आते है। जिनका वर्णन भी शुकसप्तति मे यत्र-तत्र प्राप्त होता है। ये समस्त पात्र कथानक के मुख्य पात्र (नायक-नायिका) से व्यतिरिक्त सहायक पात्र रूप मे प्रयुक्त होते है।
(ग) नाट्यशास्त्रीय लक्षणों के आधार पर :
कथावस्तु के अन्तर्गत गौण पात्रो से व्यतिरिक्त मुख्यपात्र जिन्हें हम नायक-नायिका कह सकते हैं, का वर्णन होता है। नाट्यशास्त्र के अनुसार नायक मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं-
(1) धीरोद्धत, (2) धीरललित, (3) धीरोदात्त, (4) धीरप्रशान्त¹
नाट्यशास्त्रीय अन्य ग्रन्थों में भी नायक भेद देखे जा सकते है।²
सभी प्रकार के नायकों में धीर शब्द जुडा हुआ है। धीर का वस्तुतः अर्थ है - धैर्ययुक्त अर्थात् महान संकट मे भी कातर न होने वाला।³
दशरूपक के अनुसार नायक चार प्रकार के बतलाये गये हैं-
1 नाट्यशास्त्र- 24.16-17
2 नाट्यदर्पण- चतुर्थ विवेक सा०द० तृतीय परिच्छेद।
3 नाट्य दर्पण- 16
[ 115 ]
(1) धीर ललित :
चिन्तरहित गीत आदि कलाओं का प्रेमी, सुखी और कोमल स्वभाव तथा आचार वाला नायक धीरललित कहलाता है।¹ जिस नरेश का भोग अर्थात् अप्राप्त वस्तु की प्राप्त (अप्राप्तस्य प्राप्तिर्योगः) तथा क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा- प्राप्तस्य परिरक्षण क्षेमः) की सिद्धि अमात्य इत्यादि के द्वारा कर दी जाती है। चिन्तरहित होने के कारण वह गीत आदि कलाओं मे संलग्न रहता है, और भोगों में आसक्त रहता है। श्रृंगार भाव की प्रधानता होने के कारण वह कोमल स्वभाव (सत्व = चित्त) तथा व्यवहार वाला होता है। इसी से इसे "मृदु" कहा गया है। यही ललित नायक है। यथा (कथा नं० 15) मे गुणाकर, (कथा नं० 19) में धनपाल, (कथा नं० 20) मे सूर नामक कृषक आदि भी धीरललित श्रेणी के नायक हैं।
(2) धीर प्रशान्त :
सामान्य गुणों से युक्त द्विज आदि नायक धीर प्रशान्त कहलाता है।² विनय इत्यादि जो नायक के सामान्य गुण³ कहे गये हैं उनसे युक्त द्विज, ब्राह्मण, वणिक्, मंत्री आदि धीरप्रशान्त नायक कहलाते हैं। निश्चिन्तता आदि गुणो से युक्त होने पर भी विप्र इत्यादि में शान्तता ही होती है, लालित्य प्रधान नही होता। यदि किसी विप्र मे धीरललित नायक के गुण विद्यमान हो तो वह भी धीर-प्रशान्त ही माना जायेगा। किन्तु यह नियम सर्वत्र चरितार्थ नहीं होता है, अन्य क्षत्रिय आदि भी धीर प्रशान्त हो सकते हैं जैसे बुद्ध धीर प्रशान्त नायक ही हैं। यथा - केशव (कथा न० 7) धीर प्रशान्त कोटि का पात्र है। ये कथा का प्रधान नायक नहीं है।
1 > निश्चिन्तो धीरललित कलासक्त सुखीमृदुः।
दशरूपक, द्वितीय प्रकाश,3 कारिका
2 > सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिकः ।
दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 4 कारिका
3 > नेता विनीतो मधुरस्त्यागी दक्ष प्रियवदः।
रक्तलोकः शुचिर्वाग्मी रूढवंशः स्थिरो युवा।।
बुद्ध्युत्साहस्मृति प्रज्ञाकलामानसमन्वितः ।
शूरो दृढश्च तेजस्वी शास्त्रचक्षुश्च धार्मिकः।।
दशरूपक, द्वितीय प्रकाश,1 कारिका
[ 116 ]
(3) धीरोदात्त :
उत्कृष्ट अन्त.करण वाला, अत्यन्त गम्भीर, क्षमाशील, आत्मश्लाघा न करने वाला, स्थिर अहभाव को दबाकर रखने वाला, दृढ़व्रती नायक धीरोदात्त कहलाता है। अर्थात् जिसका अन्त.करण शोक, क्रोध आदि से अभिभूत नही होता, अपनी प्रशंसा स्वय न करने वाला, उसका गर्व नम्रता से छिपा रहता है, जो स्वीकृत बात का निर्वाह करता है इस प्रकार का नायक धीरोदात्त नायक होता है। यथा - राजाविक्रमादित्य (कथा नं० 9) धीरोदात्त कोटि का नायक है।
(4) धीरोद्धत्त :
जिसमे घमण्ड और डाह अधिक होता है, जो माया और कपट में तत्पर होता है, अहंकारी, चंचल, क्रोधी तथा आत्मश्लाघा करने वाला है, वह धीरोद्धत्त नायक है। दर्प, शूरता इत्यादि का घमण्ड मात्सर्य (दूसरों की समृद्धि को) न सहना, मन्त्र की शक्ति से अविद्यमान वस्तु को प्रकट कर देना माया कहलाती है और किसी को छलना मात्र ही छद्म है, चल का अर्थ है- अस्थिर (चञ्चल), चण्ड- क्रोधयुक्त, विकत्थन अपने गुणों की प्रशंसा करने वाला, ऐसा धीरोद्धत नायक होता है। यथा- रावण, परशुराम आदि धीरोद्धत कोटि के नायक है।
इसी प्रकार शुकसप्तति ग्रन्थ मे विष्णु नामक पात्र (कथा न० 44) में धीरोद्धत कोटि का नायक है।
शृंगार रस सम्बन्धी अवस्थाओ के आधार पर नायक के चार भेद किये जा सकते है। (1) अनुकूल, (2) दक्षिण, (3) धृष्ट, (4) शठ¹ जिस नायक की एक ही नायिका होती है वह अनुकूल नायक है।² जैसे- शुकसप्तति का प्रमुख पात्र मदन विनोद, माधव सेठ (कथा नं० 32), महाधन वणिक् (कथा नं० 29), आर्य नामक वणिक्
1 सा०द० 3/35
2 “डनुकूलस्त्वेकनायिक.” । दशरूपक द्वितीय प्रकाश 11 वीं कारिका
[ 117 ]
(कथा नं० 27), सुदर्शन नामक राजा आदि (कथा नं० 23) अनुकूल नायक हैं। जो नायक अन्य नायिका के द्वारा अपहृत चित्त होकर भी पूर्व नायिका के प्रति सहृदय रहता है वह दक्षिण नायक है।¹ यथा— शम्भु नामक विप्र (कथा न० 38), शम्बक नामक तिल-विक्रेता (कथा न० 35), प्रियवद नामक विप्र (कथा नं० 38) आदि दक्षिण नायक है। जिस नायक के अङ्गों मे अन्य नायिका के साथ किये गये रमण आदि चिन्ह विकार रूप मे स्पष्ट व्यक्त होते हैं वे धृष्ट नायक हैं।² पूर्वनायिका के प्रति गुप्त रूप से अप्रिय करने वाला शठ नायक होता है।³ इस प्रकार नायक के 48 भेद हैं। धीरललित इत्यादि चारो प्रकार के नायकों में ये चारों भेद देखे जाते हैं। 4 × 4 = 16 ये समस्त नायक ज्येष्ठ, मध्यम और अधम के भेद से 48 प्रकार के होते हैं।
अनेक प्रकार के नायकों के अतिरिक्त प्रधान नायक की सहायता करने वाले, कथानक के विकास में सहायक तथा प्रासंगिक इतिवृत्त के नायक के रूप में अनेक पात्र होते हैं, ये मुख्यतः नायक के सहायक के रूप में जाने जाते हैं। जैसे पताका नायक⁴ विदूषक⁵ आदि। शुकसप्तति में सहायक श्रेणी के पात्र अल्प हैं। प्रधान नायक के सहायक पात्रो के वर्णन का इसमे अभाव है क्योंकि अधिकांश कथायें नायिका प्रधान है।
कथावस्तु मे नायिका का एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण स्थान होता है। लक्षणकारो ने कथानक, चरित्र तथा शरीर की अवस्थाओ इत्यादि के आधार नायिकाओं के भी अनेक भेद किये हैं। "धनिक" के अनुसार सामान्यगुणों से युक्त नायिका होती है, वह तीन प्रकार की होती है। (1) स्वकीया (स्वस्त्री) (2) परकीया (परस्त्री) (3) साधारण
1 "दक्षिणोऽस्या सहृदयः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 8 वीं कारिका
2 व्यक्ताङ्गवैकृतो धृष्टो। दशरूपक द्वितीय प्रकाश 10 वीं कारिका
3 "गूढविप्रियकृच्छठः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 9 वीं कारिका
4 "पताकानायकस्त्वन्य पीठमर्दो विचक्षणः।
तस्यैवानुचरो भक्ताः किञ्चिदूनश्च तदगुणैः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 12 वीं कारिका
5 "एकविद्यो विटश्चान्यो हास्यकृच्च विदूषकः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 13 वीं कारिका
[ 118 ]
स्त्री (गणिकाआदि)¹ शारीरिक अवस्था और कामचेष्टा की निपुणता के आधार पर नायिकाओ के तीन भेद होते है- (1) मुग्धा, (2) मध्या, (3) प्रौढा। नाट्य दर्पण में कुलजा, दिव्या, क्षत्रिया और पण्यस्त्री ये चार प्रकार की नायिकायें कही गयी हैं।²
स्वकीया नायिका शील, सरलता आदि गुणों से युक्त होती है। जैसे शुकसप्तति की प्रमुख पात्र प्रभावती स्वकीया नायिका है। स्वकीया नायिका तीन प्रकार की होती है- (1) मुग्धा, (2) मध्या, (3) प्रगल्भा।³ जिसकी अवस्था नवीन होती है जो रतिक्रीड़ा में झिझकने वाली और क्रोध करने मे कोमल होती है वह मुग्धा नायिका है।⁴ जिसमें यौवन और काम का उदय हो रहा हो, जो बेसुधी पर्यन्त रति में समर्थ है, वह मध्या नायिका है।⁵ जैसे धनश्री (कथा न० 14), सज्जनी (कथा नं० 24), मोहिनी (कथा नं० 27) देविका पुश्चली (कथा नं० 28) आदि मध्या नायिका की श्रेणी में आती हैं। जो यौवन में अन्धी सी, काम से उन्मत्त सी, आनन्द के कारण प्रियतम के अंङ्गो में प्रविष्ट होती हुई सी सुरत के आरम्भ में भी चेतना रहित हो जाती है। वह प्रगल्भा नायिका हैं⁶ जैसे- शशिप्रभा (कथा नं० 2), विषकन्या (कथा नं० 4), सुभगा (कथा न० 10), रम्भिका (कथा न० 11), राजिका (कथा नं० 13), जयिका (कथा नं० 15), स्वच्छन्दा (कथा नं० 19), केलिका (कथा न० 20), मन्दोदरी (कथा न० 21), मादुका (कथा नं० 22), सुन्दरी (कथा न० 29), रत्ना देवी (कथा न० 26) राजिनी (कथा नं० 32), सुभगा (कथा नं० 37), रुक्मिणी (कथा न० 59), तेजुका (कथा नं० 61), मण्डुका (कथा नं० 64) आदि प्रगल्भा नायिकाओं की श्रेणी में आती हैं।
1 साहित्यदर्पण 3/56, भाव प्रकाश 94, पक्ति, काव्यानु० 7/26
2 नाट्य दर्पण 4/255
3 मुग्धा मध्या प्रगल्भेति स्वीया शीलार्जवादियुक्।
4 मुग्धा नववय कामा रतौ वामा मृदु क्रुधि। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 26 वीं कारिका।
5 मध्योद्भूतौवनानङ्गा मोहान्तसुरतक्षमा। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 27 वीं कारिका।
6 यौवनान्धा स्मरोत्मत्ता प्रगल्भा ययिताङ्गके।
विलीयमानेवानन्दाद्गतारम्भेऽप्चेतना।। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 29 वीं कारिका।
[ 119 ]
परकीया नायिका दो प्रकार की होती है - कन्या तथा विवाहिता। विवाहिता स्त्री को कभी भी प्रधान रस की नायिका नहीं बनाना चाहिए, जबकि कन्या को कवि मुख्य या अमुख्य रस का आधार बना सकता है।¹
साधारण स्त्री तो गणिका होती है जो कला, प्रगल्भता और धूर्तता से युक्त होती है।² वह छिपकर प्रेम करने वाले, सुखपूर्वक धन प्राप्त करने वाले, अज्ञानी, स्वच्छन्द, अहङ्कारी और पण्डक (नपुंसक) आदि को, यदि धनवान हो तो अनुरक्ता के समान प्रसन्न करती है और धनरहित होने पर इनको (नि.स्वान) माता के द्वारा निकलवा देती है।³ जैसे- कलावती नामक वेश्या (कथा नं० 23), कुटनी (कथा नं० 17) साधरण स्त्री की श्रेणी में आती है। भाव-प्रकाश तथा साहित्य दर्पण में भी सामान्य नायिका का विस्तृत वर्णन किया गया है।⁴
उपर्युक्त वर्णित नायक नायिकाओं के लक्षण एवं स्वरूप का अवलोकन करने के पश्चात् यही कहना उचित प्रतीत होता है कि शुकसप्तति की प्रत्येक कथा में धीरललित या धीरप्रशान्त या धीरोदात्त या धीरोद्धत एवं अनुकूल तथा दक्षिण नायक पाये जाते हैं किन्तु अधिकता दक्षिण नायक की है, ठीक इसी प्रकार शुकसप्तति की प्रत्येक कथा नायिका प्रधान है और प्रत्येक कथा में नायिका का स्वरूप शृङ्गारी है किन्तु कुछ ही कथाये ऐसी है जिनकी नायिकायें मध्या श्रेणी की हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह कहा जाय कि अधिकतर कथाओं की नायिकायें प्रगल्भा श्रेणी की नायिका के अन्तर्गत आती है तो शायद यह गलत नहीं होगा।
1 अन्यस्त्री कन्यकोढा च नान्योढाऽङ्गिरसे क्वचित्।
कन्यानुरागमिच्छात कुर्यादङ्गाङ्गिरसश्रयम्। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 32 वीं कारिका
2 साधरणस्त्री गणिका कलाप्रागल्भ्यधौर्त्ययुक्। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 33 वीं कारिका
3 छन्नकामसुखार्थाज्ञस्वतन्त्राह्युपण्डकान्
रक्तेव रञ्जयेदाढ्यान्निःस्वान्मात्र विवासयेत। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 34 वीं कारिका
4 भाव-प्रकाश (95 4), सा० द० (3.67-71),
[ 120 ]
(ब) शुकसप्तति के प्रमुख पात्रें का परिचय :
(1) मुख्य पात्र :
(क) मदन विनोद :
मदनविनोद धीरोदात्त श्रेणी का नायक है। यद्यपि इस ग्रथ के अन्तर्गत मदन विनोद का प्रारंभिक जीवन विषयासक्त कुपुत्र का है किन्तु बाद मे सन्मार्ग का अवलम्ब कर देशान्तर जाना एवं अर्थ सचय इत्यादि करके लौटना आदि कार्य उसे धीरोदात्त नायक की श्रेणी मे स्थापित करते है। शुकसप्तति का यह प्रमुख पात्र है, यद्यपि कवि ने इसका अत्यल्प शब्दो में वर्णन किया है एव अन्य कथाओं के विकास मे इसका योगदान भी नगण्य है तथापि अन्य कथाओ को जन्म देने मे इस पात्र की अभावमूलक भूमिका अवश्य है।
मदनविनोद हरिदत्त नामक सेठ का पुत्र है जो विषयासक्त किन्तु पिता के प्रयास से एव शुक के उपदेश से कुमार्गगामी वह पुत्र माता-पिता के प्रति विनयशील बन जाता है। तदन्तर माता-पिता को प्रणाम कर, अनुज्ञा लेकर और पत्नी से पूछकर देशान्तर को चला जाता है।
मदनविनोद एक बुद्धिमान एवं चतुर पति है। वह एक पत्नीव्रती है। उसे इस बात की आशङ्का रहती है कि उसकी अनुपस्थिति में उसकी शोक-ग्रस्त पत्नी वियोग के दिन किस प्रकार काट पायेगी। उसके कुमार्गगामी होने का भय भी उसे है अतः वह शुक एवं सारिका जो कि एक कुशल, उपदेशक के रूप मे काव्य में वर्णित हैं उन पर अपनी पत्नी की रक्षा का भार उसे सौंप जाता है।
मदनविनोद की ऐतिहासिकता संदिग्ध है क्योंकि इस पात्र का इतिहास में कहीं कोई वर्णन नही मिलता। यह कवि द्वारा एक कल्पित पात्र है। जो अपरोक्ष रूप में प्रमुख पात्र के रूप मे ग्रंथ मे वर्णित है।
[ 121 ]
(ख) प्रभावती :
यदि यह कहा जाय कि शुकसप्तति ग्रन्थ की कथाओ के जन्म का मूलाधार प्रभावती है तो यह कथन त्रुटिपूर्ण न होगा। शुकसप्तति की समस्त कथायें प्रभावती को शीलभङ्गरुप महापराध से बचाने के निमित्त अस्तित्व में आती हैं जिसे कवि ने दृढ़तापूर्वक और स्पष्ट रुप में ग्रन्थ के मंङ्गलाचरण मे स्वीकार किया है। “वच्मि चेतो”।
प्रभावती पतिव्रता, सुचरित्रा एव मुग्धा श्रेणी की नायिका है। पति के देशान्तर चले जाने के बाद प्रभावती शोकयुक्त हो जाती है, वियोगावस्था के दिन कुछ समय तो काट लेती है किन्तु कुछ काल पश्चात् सखियों के बहकावें में आकर परपुरूष की सङ्गति में अभिलाषवत् होती है। स्पष्ट है कि प्रभावती पतिव्रता तो है किन्तु अस्थिर बुद्धि की होने के कारण सङ्कट के समय अधीर हो उठती है। धीरा नायिका की कोटि में होती हुई भी वह अधीर हो उठती है अतः प्रभावती “धीराधीरा” नायिका की श्रेणी में आती है।
प्रभावती एक कुशल गृहिणी, धैर्यशील एवं संयमी नारी है। यद्यपि सखियों के द्वारा समझाये जाने पर कुमार्ग पर जाने के लिए उद्यत तो होती है किन्तु शुक के द्वारा उपदेश दिये जाने पर उसका सयमी स्वरुप जाग उठता है और वह शुक की कथा को सुनने का प्रस्ताव मान लेती है। इससे स्पष्ट है कि वह बुद्धिमती एवं साहसी नारी है। साथ ही साथ सदुपदेश के महत्व को गहराई से समझने की शक्ति भी उसमे विद्यमान है। तभी तो वह प्रतिदिन शुक की कथा को धैर्यपूर्वक श्रवण करती है। यद्यपि प्रत्येक कथा के अन्त में शुक उसके सामने प्रश्न रखता है कि ऐसी स्थितियों मे यदि तुम रमण के लिए जाना चाहती हो तो जाओ।
प्रभावती धैर्यशीला होने पर भी विचारशीला नारी है। यही कारण है कि शुक द्वारा “यदि तुम रमण के लिए जाना चाहती हो तो जा सकती हो” का अनिरोधात्मक प्रस्ताव रखे जाने पर भी वह गम्भीरतापूर्वक विचार करती है। इस प्रकार प्रभावती
[ 122 ]
धैर्यपूर्वक वियोग के दिन व्यतीत करती है और अन्त मे उसका पति के साथ समागम होता है और इस प्रकार वह अपने सच्चरित्रता की कसौटी पर खरी उतरती है। इस प्रकार प्रभावती एक सुचरित्र, विवेकपूर्ण, धैर्ययुक्ता, पतिव्रता, दृढसकल्पों वाली नारी है।
(ग) शुक :
यदि शुकसप्तति की कथाओं का प्राणाधार शुक को मान लिया जाय तो शायद गलत नहीं होगा क्योंकि शुक ही कथानक का ऐसा अपरिहार्य अङ्ग है जिसके बिना किसी भी कथा की कल्पना असम्भव है। शुक एक प्रकार से ग्रन्थ के प्रमुख पात्र के रूप मे वर्णित है।
शुक एक पक्षी होते हुए भी मनुष्य की भाँति ज्ञानावान, वाक्पटु, नीतिनिपुण, नीतिवक्ता, दूरदर्शिता, सामाजिक मर्यादा आदि गुणो से युक्त है। यही समस्त कथाओ का वाचक एवं उपदेशक है। काव्य में इसकी भूमिका प्रमुख है। शुक मदनविनोद की पत्नी को कुमार्ग पर जाने से रोकने मे सफल होता है। अपनी वाक्पटुता एवं बुद्धिमत्ता से ही वह 70 दिनों में 70 तरह की कहानियाँ सुनाकर प्रभावती के चरित्र की रक्षा करता है। इस तरह सम्पूर्ण कथाग्रन्थ मे शुक छाया हुआ है।
सारिका भी प्रारम्भ मे मदन विनोद की पत्नी को व्यभिचरण करने से रोकती है। किन्तु क्रुद्ध पत्नी उसका वध करना चाहती है, लेकिन सारिका उड़ जाती है और वही पर उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है।
(2) अन्य पात्रों की सामान्य संगणना :
“शुकसप्तति” की आमुख कथा में इन तीन पात्रों का वर्णन प्राप्त होता है। साथ ही शुक द्वारा प्रभावती के प्रति कही गई अन्य सत्तर कथाओं में भी अनेक प्रकार के पात्र दृष्टिगत होते हैं। इन कथाओ में हमें समाज के सभी वर्गों के पात्रों का आचरण देखने का सुअवसर प्राप्त होता है। राजवर्गीय, प्रजा वर्गीय और आर्षवर्गीय पात्र भी
$$\text{ }$$
[ 123 ]
दृष्टिगत होते है। विभिन्न रग-रूप, वेशभूषा, आकृति और आचरणों वाले पात्रों का समावेश इस कथा चक्र को और भी रोचक बना देता है। समाज के सभी वर्ग इन कथाओं में आते हैं। अन्य पात्रों की एक सामान्य संगणना निम्न प्रकार है—
(पहली कथा)
- राजा : विक्रमसेन
- सेठ : हरिदत्त
- मित्र : त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण
- हरिदत्त की पत्नी का नाम : शृङ्गार सुन्दरी
- हरिदत्त के पुत्र का नाम : मदन विनोद
- मदनविनोद की पत्नी का नाम : प्रभावती
- प्रभावती के पिता का नाम : सोमदत्त नामक सेठ
- नीतिनिपुण : शुक, सारिका
- ब्राह्मण : सत्यशर्मा
- सत्यशर्मा की पत्नी का नाम : धर्मशीला
- सत्यशर्मा के पुत्र का नाम : देवशर्मा
- नारायण नामक ब्राह्मण 13 धर्मव्याध नामक मास विक्रेता
- धर्मव्याध के माता पिता
- गुणचन्द्र नामक परपुरुष :
- राजा : भीम
- सेठ : मोहन
- सेठ का पुत्र : सुधन
- नगर निवासी : हरिदत्त
[ 124 ]
-
हरिदत्त की पत्नी : लक्ष्मी
-
दूती : पूर्णा
(दूसरी कथा)
-
राजा : नन्दन
-
राजा का पुत्र : राजशेखर
-
रानी : शशिप्रभा
4 धनसेन का पुत्र : वीर
-
धनसेन की पत्नी : यशोदेवी
-
परपुरुष : निःशङ्क, सशङ्क
(तीसरी कथा)
-
राजा : सुदर्शन
-
बनिया : विमल
-
विमल की पत्नी : 1- रुक्मिणी
2- सुन्दरी -
धूर्त : कुटिल
5 मुख्यमंत्री, नगरपाल, बनियो का समुदाय भृत्यवर्ग आदि।
(चौथी कथा)
-
सोम शर्मा नामक एक विद्वान धार्मिक ब्राह्मण
-
सोम शर्मा की पुत्री : विषकन्या
-
मूर्ख निर्धन ब्राह्मण : गोविन्द
-
विष्णु नामक ब्राह्मण :
-
ग्रामाधिप :
-
मन्त्री :
[ 125 ]
(पाँचवी कथा)
- राजा : विक्रमादित्य
- राजा की पत्नी : कामलीला
- पुरोहित :
- ब्राह्मण की पुत्री : बालपण्डिता
(छठीं कथा)
- वणिक् पुत्र : सुमति
- उसकी पत्नी : पद्मिनी
- सखी : मन्दोदरी
(सातवीं कथा)
- राजा : वीर
- ब्राह्मण : केशव
- योगीन्द्र :
- वेश्या : स्थगिका
(आठवीं कथा)
1 राजा : त्रिविक्रम 2. वणिक् : सुन्दर 3. उसकी पत्नी का नाम : सुभगा 4. वणिक् पुरूष :
(नवीं कथा)
- मन्त्री : पुष्पहास
- बालपण्डिता :
- मन्त्री की पत्नी :
- रानी :
[ 126 ]
(दसवीं कथा)
- गृहस्थ : देवसाख्य
- देवसाख्य की पत्नियाँ : शृङ्गारवती और सुभगा
- उपपति :
(ग्यारहवीं कथा)
- मुखिया : विलोचन
- विलोचन की पत्नी : रम्भिका
- पथिक : ब्राह्मण
(बारहवीं कथा)
- धनी कुम्भार : 2 कुम्भार की पत्नी : शोभिका
- उपपति :
(तेरहवीं कथा)
1 वणिक् : 2. वणिक् पत्नी, : राजिका 3. उपपति :
(चौदहवीं कथा)
- वणिक् : धनपाल
- वणिक् पत्नी का नाम : धनश्री
- उपपति :
[ 127 ]
(पन्द्रहवीं कथा)
- वणिक् : शालिग
- वणिक् पत्नी : जयिका
- वणिक् पुत्र : गुणाकार
- गुणाकर की पत्नी : श्रिया देवी 5 द्वितीया वणिक् : सुबुद्धि
(सोलहवीं कथा)
- वणिक् : जनवल्लभ
- वणिक् पत्नी, : मुग्धिका
- उपपति :
(सत्रवीं कथा)
- ब्राह्मण : यायजूक
- उसकी पत्नी : पाहिनी
- ब्राह्मण पुत्र : गुणाढ्य
- मदना वेश्या
- कुटनी
(अट्ठारहवीं कथा)
- वणिक् (बनिया) : दरिद्र
- चोर :
- राजा :
(उन्नीसवीं कथा)
- राजा : गुणप्रिय
- सेठ : सोढाक
[ 128 ]
- सेठ की पत्नी : सन्त्तिका
- दूसरे बनिया की पत्नी : स्वच्छन्दा 5 मनोरथ नामक यक्ष
(बीसवीं कथा)
- धनी किसान : सूर
- किसान की पत्नी : केलिका
- सिद्धपुर में रहने वाला ब्राह्मण :
- दूती
(इक्कीसवीं कथा)
- राजा : हेमप्रभ
- मन्त्री : श्रुतशील
- सेठ : यशोधर
- सेठ की पत्नी : मोहिनी
- सेठ की पुत्री : मन्दोदरी
- वणिक् : श्रीवत्स
- कुटनी
- राजपुत्र
(बाईसवीं कथा)
- किसान : सोढाक
- किसान की पत्नी : मादुका
- उपपति : सुरपाल
- धूर्त : मूलदेव
[ 129 ]
(तेईसवीं कथा)
- राजा : सुदर्शन
- रानी : शृङ्गार सुन्दरी
- वणिक् : चन्द्र
- पत्नी : प्रभावती
- पुत्र : राम
(चौबीसवीं कथा)
- बढ़ई : सूरपाल (धनिक)
- बढ़ई की पत्नी : सज्जनी
- उपपति : देवक
(पच्चीसवीं कथा)
- बौद्ध संन्यासी : सिद्धसेन
- जैन साधु :
- बौद्ध भिक्षुक :
- वेश्या :
(छब्बीसवीं कथा)
- राजपुत्र : क्षेमराज
- क्षेमराज की पत्नी : रत्ना देवी
- ग्रामाध्यक्ष : देवसाख्य
- देवसाख्य का पुत्र : धवल
- राजपुत्र
(सत्ताईसवीं कथा)
- वणिक् : आर्य
- वणिक् पत्नी : मोहिनी
- धूर्त : कुमुख
[ 130 ]