शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंधैर्यपूर्वक वियोग के दिन व्यतीत करती है और अन्त मे उसका पति के साथ समागम होता है और इस प्रकार वह अपने सच्चरित्रता की कसौटी पर खरी उतरती है। इस प्रकार प्रभावती एक सुचरित्र, विवेकपूर्ण, धैर्ययुक्ता, पतिव्रता, दृढसकल्पों वाली नारी है।
(ग) शुक :
यदि शुकसप्तति की कथाओं का प्राणाधार शुक को मान लिया जाय तो शायद गलत नहीं होगा क्योंकि शुक ही कथानक का ऐसा अपरिहार्य अङ्ग है जिसके बिना किसी भी कथा की कल्पना असम्भव है। शुक एक प्रकार से ग्रन्थ के प्रमुख पात्र के रूप मे वर्णित है।
शुक एक पक्षी होते हुए भी मनुष्य की भाँति ज्ञानावान, वाक्पटु, नीतिनिपुण, नीतिवक्ता, दूरदर्शिता, सामाजिक मर्यादा आदि गुणो से युक्त है। यही समस्त कथाओ का वाचक एवं उपदेशक है। काव्य में इसकी भूमिका प्रमुख है। शुक मदनविनोद की पत्नी को कुमार्ग पर जाने से रोकने मे सफल होता है। अपनी वाक्पटुता एवं बुद्धिमत्ता से ही वह 70 दिनों में 70 तरह की कहानियाँ सुनाकर प्रभावती के चरित्र की रक्षा करता है। इस तरह सम्पूर्ण कथाग्रन्थ मे शुक छाया हुआ है।
सारिका भी प्रारम्भ मे मदन विनोद की पत्नी को व्यभिचरण करने से रोकती है। किन्तु क्रुद्ध पत्नी उसका वध करना चाहती है, लेकिन सारिका उड़ जाती है और वही पर उसकी भूमिका समाप्त हो जाती है।
(2) अन्य पात्रों की सामान्य संगणना :
“शुकसप्तति” की आमुख कथा में इन तीन पात्रों का वर्णन प्राप्त होता है। साथ ही शुक द्वारा प्रभावती के प्रति कही गई अन्य सत्तर कथाओं में भी अनेक प्रकार के पात्र दृष्टिगत होते हैं। इन कथाओ में हमें समाज के सभी वर्गों के पात्रों का आचरण देखने का सुअवसर प्राप्त होता है। राजवर्गीय, प्रजा वर्गीय और आर्षवर्गीय पात्र भी
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