शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ें(कथा नं० 27), सुदर्शन नामक राजा आदि (कथा नं० 23) अनुकूल नायक हैं। जो नायक अन्य नायिका के द्वारा अपहृत चित्त होकर भी पूर्व नायिका के प्रति सहृदय रहता है वह दक्षिण नायक है।¹ यथा— शम्भु नामक विप्र (कथा न० 38), शम्बक नामक तिल-विक्रेता (कथा न० 35), प्रियवद नामक विप्र (कथा नं० 38) आदि दक्षिण नायक है। जिस नायक के अङ्गों मे अन्य नायिका के साथ किये गये रमण आदि चिन्ह विकार रूप मे स्पष्ट व्यक्त होते हैं वे धृष्ट नायक हैं।² पूर्वनायिका के प्रति गुप्त रूप से अप्रिय करने वाला शठ नायक होता है।³ इस प्रकार नायक के 48 भेद हैं। धीरललित इत्यादि चारो प्रकार के नायकों में ये चारों भेद देखे जाते हैं। 4 × 4 = 16 ये समस्त नायक ज्येष्ठ, मध्यम और अधम के भेद से 48 प्रकार के होते हैं।
अनेक प्रकार के नायकों के अतिरिक्त प्रधान नायक की सहायता करने वाले, कथानक के विकास में सहायक तथा प्रासंगिक इतिवृत्त के नायक के रूप में अनेक पात्र होते हैं, ये मुख्यतः नायक के सहायक के रूप में जाने जाते हैं। जैसे पताका नायक⁴ विदूषक⁵ आदि। शुकसप्तति में सहायक श्रेणी के पात्र अल्प हैं। प्रधान नायक के सहायक पात्रो के वर्णन का इसमे अभाव है क्योंकि अधिकांश कथायें नायिका प्रधान है।
कथावस्तु मे नायिका का एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण स्थान होता है। लक्षणकारो ने कथानक, चरित्र तथा शरीर की अवस्थाओ इत्यादि के आधार नायिकाओं के भी अनेक भेद किये हैं। "धनिक" के अनुसार सामान्यगुणों से युक्त नायिका होती है, वह तीन प्रकार की होती है। (1) स्वकीया (स्वस्त्री) (2) परकीया (परस्त्री) (3) साधारण
1 "दक्षिणोऽस्या सहृदयः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 8 वीं कारिका
2 व्यक्ताङ्गवैकृतो धृष्टो। दशरूपक द्वितीय प्रकाश 10 वीं कारिका
3 "गूढविप्रियकृच्छठः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 9 वीं कारिका
4 "पताकानायकस्त्वन्य पीठमर्दो विचक्षणः।
तस्यैवानुचरो भक्ताः किञ्चिदूनश्च तदगुणैः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 12 वीं कारिका
5 "एकविद्यो विटश्चान्यो हास्यकृच्च विदूषकः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 13 वीं कारिका
[ 118 ]