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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

(5) कथा का शास्त्रीय रूप :

"चितिपूजिकार्यकुम्बि चर्चिश्चेति" सूत्र से कथ–आङ्–टाप् प्रत्यय से कथा शब्द का निर्माण हुआ है।

कथा अभिव्यञ्जना की वह विधा है जिसके स्वरूप में अगणित विविधतायें समय-समय पर जुडती रहती हैं, यही कारण है कि कथा की कोई ऐसी परिभाषा जिसके माध्यम से कथा के सम्पूर्ण स्वरूप को समझा परखा जा सके, निर्मित नहीं हो सकी है। अधिकांश परिभाषा कथा के बाह्य स्वरूप को ध्यान में रखकर प्रस्तुत की गई है।

(6) कथा और आख्यायिका :

दण्डी, सुबन्धु और बाण से भी बहुत पहले कथा और आख्यायिका के नाम से गद्य–काव्य का भेद किया जाने लगा था और उनके विशिष्ट लक्षण निर्धारित हो चुके थे और कथाकारो द्वारा इनके पालन करने की अपेक्षा भी की जाती थी। सर्वप्रथम "अभिनवगुप्त" कथा और आख्यायिका का लक्षण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि—आख्यायिका उच्छ्वास, वक्त्र और अपरवक्त्र आदि छन्दो से युक्त होती है और जिनमें यह नही रहता वह कथा होती है।¹

"विद्यानाथ" भी अभिनवगुप्त का अनुसरण करते है, वे "हर्षचरित" को आख्यायिका के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं।²

कुमारस्वामी ने "प्रतापरुद्रयशोभूषण" की रत्नापण नामक टीका में कथा और आख्यायिका के स्वरूप का कथन तो किया है, किन्तु कोई नवीन बात न कहकर अभिनवगुप्त के ही मत का समर्थन किया है, साथ ही वे दण्डी के मत का अनुसरण करते हुए यह तर्क देते हैं कि कथा और आख्यायिका में केवल नाम मात्र का ही भेद है उनकी जाति में कोई अन्तर नहीं है, दोनों की जाति एक है। साहित्यदर्पणकार


1 "आख्यायिकोच्छ्वासदिना वक्त्रापरवक्त्रादिना च युक्ता। कथा तद् विरहिता।"
—'ध्वन्यालोक', तृतीय उद्योत, लोचन पृ० 324.
2 'वक्त्र चापरवक्त्र च सोच्छ्वासत्व भेदकम्।
वर्ण्यते यत्र काव्यज्ञैरसावाख्यायिका मता।।'
'यत्र वक्त्रापरवक्त्र नामानौ वृत्तविशेषौ वर्ण्येये
सोच्छ्वास परिच्छिन्नाख्यायिका हर्षचरितादि।'
—'प्रतापरूद्यशोभूषण' पृ० 96.

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विश्वनाथ ने विस्तारपूर्वक दोनो के स्वरूप का विवेचन किया। उनके अनुसार आख्यायिका कथा की भाँति ही गद्य का एक प्रकार है, जिसमें कवि के वंश का तो वर्णन रहता ही है साथ ही कहीं-कही अन्य कवियो का भी वर्णन होता है। यत्र-तत्र पद्य भी प्रयुक्त होते हैं और कथाशों का विभाजन आश्वासों में किया जाता है, आर्या, वक्त्र और अपरवक्त्र छन्दो मे से किसी एक छन्द द्वारा आश्वास के प्रारम्भ में किसी अन्य विषय के व्याज से वर्णनीय विषय की सूचना दी जाती है, उन्होंने आख्यायिका का उदाहरण "हर्षचरित" को रखा है।¹

कथा और आख्यायिका में भेद सिद्ध करते हुये आचार्य विश्वनाथ पुनः कहते हैं कि कथा में सरस इतिवृत्त होता है और उसमें आर्या, वक्त्र और अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग होता है। प्रारम्भ मे पद्यों द्वारा मङ्गलाचरण की योजना करने के पश्चात् खल-निन्दा, प्रशंसा आदि का भी उपन्यास किया जा सकता है।² आचार्य विश्वनाथ के अनुसार आर्या, वक्त्र और अपरवक्त्र छन्दों का व्यवहार, दोनों का प्रयोग कथा और आख्यायिका दोनों में हो सकता है, किन्तु आख्यायिका में इन छन्दों का प्रयोग आश्वास के प्रारम्भ मे कथावस्तु की सूचना देने के निमित्त किया जाता है जबकि कथा में इनका प्रयोग मङ्गलाचरण, निन्दा, खल-प्रशंसा आदि के विधान में किया जाता है।

काव्यालंकार मे भामह ने आख्यायिका का लक्षण प्रस्तुत किया है उनके अनुसार जिसके शब्द, अर्थ, तथा समास, अक्लिष्ट तथा श्रव्य हों, जिसका विषय उदात्त हो और जो उच्छ्वासों से युक्त हो, ऐसी गद्यमयी संस्कृत रचना आख्यायिका होती है। इसमें नायक अपने चरित्र का वर्णन स्वयं करता है तथा समय-समय पर घटित घटनाओं के


1

"आख्यायिका कथावत् स्यात् कवेर्वंशानुकीर्तनम्।
अस्यामन्यकवीनांच वृत्तं पद्यं क्वचित्-क्वचित्।।
कथांशानां व्यवच्छेद आश्वास इति बध्यते।
आर्यावक्त्रापरवक्त्राणां छन्दसा येन केनचित्।।
अन्यापदेशेनाश्वासमुखे भाव्यर्थ सूचनम्।"
—"साहित्यदर्पण", 6/334-336

2 "साहित्य-दर्पण" परिच्छेद 6, पृ० 226.

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सूचक वक्त्र और अपरवक्त्र छन्द प्रयुक्त होते हैं। यह कवि के अभिप्राय विशिष्ट कथनों से युक्त और कन्याहरण, सग्राम, वियोग तथा उदय आदि से युक्त होती हैं।¹

विश्वनाथ द्वारा दिया गया आख्यायिका का लक्षण भामह के लक्षण से यत्किञ्चित मेल खाता है।

आचार्य रुद्रट ने कादम्बरी और हर्षचरित को लक्ष्य में रखकर कथा और आख्यायिका के भेद का निरूपण किया है। इनके द्वारा दिये गये आख्यायिका का लक्षण आचार्य विश्वनाथ और भामह द्वारा प्रतिपादित लक्षण का मिश्रित रूप कहा जा सकता है।²

आचार्य आनन्दवर्धन ने भी कथा और आख्यायिका मे भेद को स्वीकार करते हुए संघटना विवेचन के प्रङ्ग में इनका उल्लेख किया है। इनके द्वारा दिया गया आख्यायिका का लक्षण अन्य आचार्यों से पृथक है। आचार्य आनन्दवर्धन के अनुसार आख्यायिका में प्रचुरता से मध्यम समास युक्त या दीर्घसमास युक्त संघटना होती है, क्योंकि गद्य में काव्य–सौन्दर्य विकट वन्ध से आता है, कथा में विकट वन्ध का प्राचुर्य होने पर भी रस–वन्ध में कहे हुए औचित्य का अनुसरण करना चाहिए।³


  1. '‘संस्कृतानुकूल श्रव्य शब्दार्थ पद वृत्तिना।
    गद्येन युक्तोदात्तार्था सोच्छ्वासाख्यायिका मता।
    वृत्तमाख्यायते तस्यां नायकेन स्वचेष्टितम्।
    वक्त्राचापरवक्त्र च काले भाव्यर्थशाम्सि च।।
    कवेरभिप्राय कृतै. कथनै. कैश्र्चिदकिता।
    कन्याहरण संग्राम विप्रलम्भोदयान्विता।।'’
    —भामह, 'काव्यालकार', 1/25–27

  2. '‘पूर्वदेव नमस्कृत्य देवगुरूनौत्सिहेत् स्थितेष्वेपु।
    काव्य कर्त्तुमिति कवी शसदाख्यायिकायां तु।।
    तदनु नृपे वा भक्ति परगुणे सकीर्तनंऽथवा व्यसनम्।
    अन्यद्वा तत्करणे कारणमाविल्ष्टमभिदध्यात्।।
    अथ तेन कथैव यथा रचनीयाख्यायिकापि गद्येन।
    निजवंशं स्वं चास्याभिदध्याल त्वगद्येन।।
    कुर्यादितोच्छ्वासान् सर्वदवेषा मुखेष्वनाद्यानाम्।
    द्वे द्वे चार्थे श्लिष्टे सामान्यार्थे तदर्थाय।।'’
    ........रुद्रट, काव्यालंकार, सत्यदेव चौधरी द्वारा सम्पादित, 16/24–27

  3. 'पर्यायबन्ध परिकथा खण्डकथा सकल कथे सर्ग बन्धोऽभिनेयार्थमाख्यायिका कथे इत्येवमादय ।'
    ... .... 'ध्वन्यालोक', तृ० 30, पृ० 323

    तथा
    "आख्यायिकाया तु भूम्ना मध्यम समास दीर्घ समासे एव संघटने।
    गद्यस्य विकट बन्धाश्रयेण छायावत्वात्। तत्र च तस्य प्रकृष्ट माणत्वात्।
    कथायां तु विकटवन्ध प्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोक्तमौचित्यमनु सर्तव्यम्।”


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वामन कथा और आख्यायिका के भेद सम्बन्धी विचार को अधिक महत्व नहीं देते। उनके अनुसार काव्य के अन्य भेदों के सम्बन्ध में अन्य ग्रन्थों से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

आचार्य दण्डी कथा और आख्यायिका को पृथक भेद न मानकर दोनों को एक ही गद्यकाव्य का भेद स्वीकार करते हैं।¹

यद्यपि दण्डी के समय तक कथा और आख्यायिका ये दोनों विधायें पृथक रूप में प्रतिष्ठित हो चुकल थल किन्तु दण्डी इसके विरूद्ध थे। अतः उन्होंने दोनों में नाम-मात्र का अन्तर बताकर उन्हें एक सिद्ध करने का प्रयत्न किया। उनके द्वारा दिये गये विचार इस प्रकार हैं-

  1. आख्यायिका का वर्णन सिर्फ नायक करता है, किन्तु कथा का वर्णन नायक के अलावा अपर व्यक्ति भी कर सकता है। नायक द्वारा अपने गुणों का वर्णन करना दोषपूर्ण नहीं, क्योंकि वह भूतार्थ शंसी (व्यतीत घटनाओं का वर्णनकर्ता मात्र) होता है। अतः आख्यायिका का वक्ता नायक ही हो यह अनिवार्य नहीं। अन्य व्यक्ति भी उसका वक्ता हो सकता है। इसलिए वक्ता का भेद दोनों को पृथक करने में समर्थ नहीं हो सकता।²

  2. दण्डी के काल में यह धारणा थी कि आख्यायिका में ही कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ आदि विपत्तियों का वर्णन रहता है-कथा में नहीं।


.... "ध्वन्यालोक", तृ 30 पृ० 326-27.

1 ,, "तत्कथाख्यायिकेत्येका जातिः संज्ञा द्वयांकिता।
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति शेषाश्चाख्यान जातयः।। "काव्यादर्श" 1/28

2 ' 'इति तस्य प्रभेदौ द्वौ तयोराख्यायिका किल।।
नायकेनैव वाच्यान्या नायकेनेतरेण वा।
स्वगुणाविष्क्रिया दोषो नात्र भूतार्थशंसिन ।।
अपि त्वनियमो दृष्टस्तत्रान्यन्यैरूदीरणीत्
अन्यो वक्ता स्वयंचेति की दृग्वा भेदकारणम्।।'
"काव्यादर्श", 1/23-27.

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परन्तु ये विशेषतायें सर्गबद्ध महाकाव्य, खण्ड काव्यादि की हैं। सिर्फ आख्यायिका की ही विशेषतायें नहीं। यदि इनका प्रयोग कवि आख्यायिका मे कर सकता है तो कथा में भी स्वतन्त्र रुप में इनका प्रयोग कर सकता है।¹

  1. आख्यायिका वक्त्र, अपरवक्त्र छन्दो से युक्त रहती है और कथा इससे रहित होती है। परन्तु दण्डी के अनुसार-जिस प्रकार कथा में आर्या आदि छन्दों का प्रयोग होता है, उसी प्रकार स्वरूप में कोई परिवर्तन किये बिना वक्त्र तथा अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग भी स्वतन्त्र रूप से किया जा सकता है। यदि पूर्वपक्षी यह प्रश्न उठाये कि आख्यायिका में उच्छ्वास होते हैं और कथा में लम्ब, लुम्बकादि तो दण्डी का उत्तर है कि कथांशो के विभाग को परिच्छेद, उच्छ्वास, अध्याय आदि नाम देने से कोई अन्तर नहीं पडता क्योकि यह तो सिर्फ नाम मात्र का भेद है, स्वरुपगत कोई भेद नहीं।²

  2. दण्डी के समय तक में आख्यायिका केवल संस्कृत में लिखी जाती थी और कथा पालि, अपभ्रंश, संस्कृत में लिखी जाती थी।³ आख्यायिका राजवंशानुकीर्तन से सम्बद्ध होने के कारण संस्कृत में लिखी जाती थी किन्तु कथा लोक काव्य भी लोकप्रिय थी, जबकि राज्याश्रित कवि आख्यायिका को ही अपनाते थे। दण्डी ने कथा को विशेष महत्व दिया, कथा के प्रति अपना आग्रह दिखाकर लोक-काव्य को प्रोत्साहन एवं


1 '’कन्या हरण संग्राम विप्रलम्भोदयादयाः।
सर्गबन्ध समा एव नैते वैशेषिका गुणः।।'’
'काव्यादर्श', 1-24.

2 '’वक्त्र चापरवक्त्रं चा सोच्छ्वासत्व च भेदकम्
चिह्नममाख्यायिकायाश्च प्रसंगेन कथास्वपि।।
आर्यादिवत् प्रवेशः कि न वक्त्रापर वक्त्रयो।
भेदश्च दृष्टो लम्भादिरुच्छ्वासो वास्तु कि ततः।।'’ - 'काव्यादर्श', 1/26-27

3 '’कथा हि सर्वभाषाभिः संस्कृतेन च बध्यते।'’ - 'काव्यादर्श', 1-38

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संवर्धन प्रदान किया, इसलिए उन्होंने अपने निष्कर्ष में कथा को प्रथम स्थान दिया।¹ इसके विपरीत भामह ने आख्यायिका को ऊँचा ले जाने का प्रयास किया।

  1. दण्डी के समय तक यह धारणा भी प्रचलित थी कि कवि अपने अभिप्राय विशिष्ट कथनो का प्रयोग कथा में ही करता था, आख्यायिका में नहीं। किन्तु इस वैशिष्ट्य से कथा और आख्यायिका में भेद स्थापित नहीं किये जा सके। इस प्रकार के अभिप्राय गर्भित चिन्हों का प्रयोग अनेक प्रबन्धों में हुआ है। जैसे-भारवि ने सर्ग की समाप्ति वाले छन्द में "लक्ष्मी" शब्द का प्रयोग किया है और माघ ने "श्री" शब्द को।² अतः इस भेद को उचित नहीं माना जा सकता है।³

(ख) शुकसप्तति-परिचय :

(1) कर्ता : शुकसप्तति एक रोचक और लोकप्रिय कथा-संग्रह है। विश्वसनीय एवं समापेक्षित सामग्रियों के अभाव ग्रस्तता के कारण शुकसप्तति के लेखक के सम्बन्ध में कुछ भी सुनिश्चित कह पाना संभव नहीं है। शुकसप्तति के प्राप्त संस्करणों में भी इसके कर्ता का नामोल्लेख नहीं मिलता। संस्कृत साहित्य के इतिहासकार भी सर्वथा मौन साधे हुए हैं ऐसी परिस्थिति में इसका कर्ता कौन था यह कह पाना कठिन है। सिर्फ इतना ही पता चलता है कि हेमचन्द्र ने (1088–1172 ई०) में इसका वर्णन किया है।⁴

(2) काल : शुकसप्तति के कर्ता के समान इसका काल भी अनिश्चित है। ए०बी० कीथ के अनुसार-इसका अस्तित्व हेमचन्द्र द्वारा 12 वीं शताब्दी में प्रमाणित


1 'तत्कथाख्यायिकेत्येका जातिः संज्ञा द्वयांकिता।'
2 S.K. De, "Some Problems of Sanskrit poetics". P. 67. Foot Note
3 "कविभावकृतं चिह्नमन्यत्रापि न दुष्यति।
मुखमिष्टार्थ संसिद्धौ किं हि न स्यात् कृतात्मनाम्।।"
4 Hemachandra (1088-1172 A D.) was aware of its existence. The work must have been composed before 1000 A D
A History of the Sanskrit Literature by V Varadacari, Page 125, शुकसप्ततिः, पेज संख्या 17, व्याख्याकार-रमाकान्त त्रिपाठी।

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होता है। जब वे एक घटना को उद्धत करते हैं जो यद्यपि हमारी पुस्तकों के पाठ में नही है किन्तु जिसके अंतर्गत एक तोता एक बिल्ली के द्वारा पकड़ लिया जाता है। इससे संभवतः यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि शुकसप्तति के बहुत अनेक पाठ पहले से ही वर्तमान थे।¹ अतएव यह कहा जा सकता है कि 1000 ई० से 1400 ई० के मध्य इसकी रचना हुई होगी।

(3) अनुवाद : 14 वीं शताब्दी में इसका फारसी में अनुवाद हुआ है। सिन्दबाद जहाजी की कहानियों का आधार यही है, जैसा कि 'किनाथुल सिन्दबाद' के लेखक मसूदी (956 ई०) ने लिखा है कि यह कथा राजा कुरूष के समय भारत में लिखी गई थी और इसका आधार भारतीय ही है। इसका भारतीय नाम 'सिद्धपति की कथा' है जो कि अब अप्राप्त है। यद्यपि इसका यूनानी अनुवाद सिंत्तिपास तथा 'हिब्रू-संदवार' आदि प्राप्य हैं। 'नख्शबी' ने 22,29,30 ईसवी में साहित्यिक फारसी में इसका तूतिनामह नाम से अनुवाद प्रस्तुत किया, जिसका बाद में तुर्की में भी अनुवाद हुआ।

(4) वर्ण्य विषय : शुकसप्तति का स्वरूप अत्यन्त मनोहारी, सहज, आकर्षक एवं लोक-कल्याणकारी है। यह 70 कहानियों का सर्वोत्कृष्ट संग्रह है।

हरिदत्त नामक सेठ के मदनविनोद नाम का एक पुत्र था। जो विषयासक्त कुपुत्र था। जो पिता के समक्ष भी कृतघ्न था, जिसके आचरण एवं अनुशासनहीनता को देखकर सेठ को सपरिवार ही अत्यंत त्रासदी की अनुभूति करनी पड़ी।

त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण जो कि हरिदत्त सेठ का मित्र था, उसने सेठ के कष्ट निवारणात् अपने घर से नीति-निपुण शुक और सारिका लेकर उसके घर जाकर कहा—मित्र! इस सपत्नीक शुक का पालन-पोषण पुत्रवत् करो, इसके आचरण मात्र से तुम्हारे सारे कष्टों का निवारण हो जायेगा।


1 ए०बी० कीथ संस्कृत साहित्य का इतिहास।

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हरिदत्त ने शुक को प्राप्त कर पालन-पोषण का प्रभार पुत्र मदन-विनोद को प्रदान कर दिया। मदन विनोद पालन-पोषण में निर्देशानुसार रत हो जाता है। संयोगवश शुक के उपदेश से वह कुमार्गगामी सेठ का पुत्र परवर्तित होता हुआ विनयशील बन गया। व्यापार के सम्बन्ध मे इसे परदेश जाना पड़ता है। उस समय मदन विनोद दोनो पक्षियों को अपनी पत्नी के सुपुर्द करता है।

तत्पश्चात् मदन विनोद की पत्नी शोकयुक्त कतिपय समय निर्वाह करती है और कालक्रम के साथ व्यभिचारिणी सखियों द्वारा समझायी गयी पर-पुरूष की संगति मे अभिलाषावती वह सखियो के निर्देशानुसार परपुरुष के साथ रमण करने के लिए ज्यों ही चली, त्यों ही "मैना" ने ''मत जा'' इत्यादि वचनों से फटकारा। इस पर उसने मैना को मरोडकर मार डालना चाहा, किन्तु वह उड़ कर दूर चली गयी।

शुक चतुर है, वह उसके आचरण का अनुमोदन करता है। "तुम पर-पुरूष की संगति के आनन्द का अनुभव करो, यह ठीक ही है, किन्तु यदि प्रतिकूल तथा संकट का अवसर पड़ने पर उससे बचने की तुम्हें बुद्धि हो, तभी जाओ, क्योंकि विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखते हैं जैसे-एक मास भर की भूखी पूर्णा दूती, बनिये के लड़के के केश पकड़कर उसकी पत्नी खींचने लगी तो, वह तमाशा ही देखती रही।" इस बात के सुनने पर मदनविनोद की पत्नी में कहानी सुनने की उत्सुकता उत्पन्न हो जाती है और प्रत्येक दिन कहानी सुनने की इच्छा प्रकट करती है और तदानुसार एक कथा प्रत्येक दिन सुनती हैं और बीच-बीच मे शुक यह शिक्षा देता रहता है कि ऐसी विपत्ति पर कैसा आचरण करना चाहिए। इस तरह 70 कहानियाँ सुनाकर उसके शील की रक्षा करता है और अन्त में मदनविनोद आ जाता है और अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक समय व्यतीत करने लगता है।

अन्ततः यह कहना अनुचित न होगा कि इन 70 कहानियों को लेखक ने इतने अच्छे ढंग से ग्रथित किया है कि वह शुक प्रतिदिन उस युवती के सामने एक नयी

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समस्या प्रस्तुत करता है तथा उसकी विरहजन्य पीड़ा को दूर करने का प्रयत्न करते हुए व्यभिचार से मोडता है। इतनी कठिन साधना अत्यन्त सरलता और मनोञ्जन के साथ पक्षी के द्वारा करने का प्रयास कवि की विलक्षण प्रतिभा नही तो और क्या?

(5) ग्रन्थ का आधार: मानव-जाति का यह क्रम युगारम्भ से अविरल गति से भविष्य की ओर से संचालित होता आ रहा है। प्रत्येक युग की उनकी कुछ विशिष्ट विशेषतायें होती हैं। हर-युग तत्कालीन परिस्थितियों एवं लोक-भावनाओं का समादर करता हुआ अग्रसर है। अन्य कहानी संग्रहों की तुलना में शुकसप्तति अपने युग की सर्वाधिक प्रसिद्ध रोचक एव कल्याणकारी रचनाओं में से एक है। स्पष्ट रूप से यह नही कहा जा सकता है कि शुकसप्तति की कथायें मूलरुप से किसी कथाग्रंथ का अंश है अथवा स्वतंत्र रुप से इन 70 कहानियों की रचना की गई है।

भारत में वैदिक युग के भारतीयों के जीवन के प्रारम्भिक काल से ही अनेक प्रकार की कहानियाँ लोगों में प्रचलित हैं। साधारण सी कहानी को एक निश्चित उद्देश्य के लिए उपयोग में लाया जाना उपदेशात्मक कथा का जीवनोपयोगी ज्ञान समझाने के लिए एक निश्चित मार्ग बन जाना कहानियों के इतिहास में एक स्पष्ट तथा महत्वपूर्ण कदम था। ऋग्वेद ¹ के एक प्रसिद्ध सूक्त का जिसमें यज्ञ के अवसर पर मन्त्रगान करते हुए ब्राह्मणों की तुलना टर्र-टर्र करने वाले मेढकों से की गयी है। इससे स्पष्ट है कि मनुष्यो तथा प्राणियों के बीच एक प्रकार का सम्बन्ध स्थापित कर लिया गया है।² उपनिषदों में यह तथ्य और स्पष्ट रूप से प्रकट होता है जहाँ पक्षियों और पशुओं को उपदेश का माध्यम बनाया गया। आगे चलकर हमें महाभारत में अनेक पशुओं से सम्बन्धित कथायें प्राप्त होती हैं। वास्तव में "महाभारत" में हमें वह बीजभूत आधार प्राप्त होता है जो "पञ्चतन्त्र" के विकास के हेतुभूत सामग्री की ओर दृढ़तापूर्वक संकेत करता है। बौद्ध एवं जैन साहित्य में भी पशुओं से सम्बन्धित


1 ऋग्वेद 7.103 2 छान्दोग्य उपनिषद 1.12, (iv) 1, 5, 7 f.

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कथाओ का उपयोग मनुष्यों को उपदेश देने के लिए किया गया है। बौद्ध लोग पिछले जन्मो मे बुद्ध और उनके समकालीन पुरुषों की महत्ता एवं उनके कार्यों का उदाहरण देने के लिए पशुओं की कथाओं का आधार लिया करते थे। इस "महाभारत"¹ से तथा पतञ्जलि द्वारा लोकन्यायों के उल्लेख से यह माना जा सकता है कि इस प्रकार की पशु-कथा प्रचलित थी किन्तु उक्त कथाओ ने उस समय तक किसी प्रकार का साहित्यिक रूप धारण किया था, यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते।

लोक-कथाओं का प्राचीनतम संग्रह गुणाढय की "वृहत्कथा" है। 'वृहत्कथा' को कालान्तर में इतनी अधिक प्रसिद्धि मिली जिसका परिणाम यह हुआ कि प्राचीन समय की रचनाओं में तद् अपेक्षया भिन्न कहानियाँ बहुत कम सुरक्षित हैं। प्राचीनतम कथा-ग्रन्थ "पञ्चतन्त्र" के साथ-साथ पशु-पक्षियों की कहानियों की परम्परा नष्ट-प्राय हो गयी। बाद में वृहत्कथा के तीन संस्करण बने-वृहत्कथामञ्जरी, कथासरित्सागर और वृहत्कथाश्लोकसंग्रह। इन संस्करणों में प्राचीन कथाओं को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया। यद्यपि इस विषय में विद्वानों में मतभेद है कि इन संस्करणो में प्राप्त कथायें "वृहत्कथा" में प्राप्त कथाओं के ही मूलरुप हैं। ये कथायें गद्य-पद्यात्मक हैं। वृहत्कथा की कथायें उपदेशात्मक मनोरञ्जन प्रधान एवं विशिष्ट उद्देश्य के कथन से समन्वित हैं।

ऐसे ही कथाग्रंथों की विकास की परम्परा में "शुकसप्तति" की 70 कहानियों का विकास हुआ। जो अत्यन्त रोचक हैं। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि इन 70 कहानियो का मूलाधार "वृहत्कथा" थी अथवा कोई अन्य लोक-कथासंग्रह। ऐसा प्रतीत होता है कि शुकसप्तति एक स्वतंत्र लोक-कथा ग्रन्थ है जिसका उद्देश्य पत्नी को कुमार्ग पर जाने से बचाना है। यद्यपि इस मूल तथ्य को भी नकारा नहीं जा सकता कि इसका रचयिता पूर्व में प्राप्त कथा ग्रन्थों से प्रभावित नहीं था।


1 Mahabharata, (iv) 88 FF.

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(6) ग्रन्थ का महत्व : शुकसप्तति के इन 70 कहानियों में स्त्रियों के व्यभिचार सम्बन्धी कामशास्त्र द्वारा प्रथित उन तमाम चातुर्य का विश्लेषण कवि ने जिस चातुरी से प्रस्तुत किया है, संभवत. उतनी सरलता से अन्यत्र उपलब्ध नहीं है। ये सम्पूर्ण कहानियाँ उपदेशपरक, रोचक, सरल गान में कहीं-कहीं पद्य में हैं। कुछ प्राकृत में भी पद्य समुपलब्ध हैं।

वस्तुतः इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में गम्भीरतापूर्वक समावलोकन करने पर जिज्ञासु कोपबुद्धिजीवी अनुसंधान की पराकाष्ठा पर पहुंचने पर इस तथ्य को दावे के साथ प्रस्तुत करने के लिए पूर्णरुपेण परिपक्वास्था में प्राप्त होने पर एक निष्कर्ष पर अवश्य ही पहुंचता है, जो सारगर्भित एवं किसी देशकाल एवं परिस्थिति का जीता जागता वास्तविक चित्रण प्रस्तुत करने मे समर्थ ही नहीं अपितु सिद्ध हो जाता है। प्राचीनकाल से आज तक विभिन्न काल-खण्डों, स्थान विशेष व विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार अनेक लोक-कल्याणकारी एव सचालक प्रकृति के समक्ष सहज ही दर्शित होते हैं। इन्ही काल-क्रमादि के परिप्रेक्ष्य में "शुकसप्तति" कथा का जन्म घटनाचक्र, वृहत कथाङ्ग शुक एवं सारिका के विशिष्ट ज्ञान-विज्ञान की पारदर्शिता की उपयोगिता, उसकी आवश्यकता, हरिदत्त नामक सेठ की परिवारिक प्रतिकूलता, असहयोग जटिलता की समस्याओ से ग्रसित संकटकालीन परिस्थितियो के रुप में अपने अस्तित्व को लाना तथा उसका प्रचार-प्रसार एवं संज्ञान उपयुक्त ज्ञानियों, विज्ञानियों, कवियों तथा मीमासकों का ध्यान आकर्षित होना और समग्ररुप में लिपिबद्ध करके साहित्य में लाने की प्रबल आकांक्षा जिसका संचरण तत्कालीन इसका मूलाधार है। मुख्यतया अशिष्टता, अश्लीलता, साथ ही साथ नैतिकता का संयोग सदैव विद्यमान होकर इस ग्रन्थ को गुणाढ्य कृत वृहतकथा जो कि लोककथाओं का प्राचीनतम ग्रन्थ है उससे भी अग्रसर होता हुआ अद्यावतु हम सभी अपने लोक जीवन व्यवहार एवं परस्पर सम्बन्धों की श्रृंखला पर प्रदर्शित कर रहे हैं। कुल मिलाकर उपर्युक्त यह रचना संस्कृत साहित्य के कथा-साहित्य में अत्यन्त लोकप्रिय है।

[ 41 ]

(7) प्रचार एवं प्रसार : शुक सप्तति यद्यपि मनोरञ्जक है किन्तु इसे उतनी प्रसिद्धि एवं ख्याति नही मिल पायी जितनी अन्य कथाग्रन्थों को मिली। संभवतः इसका एक प्रमुख कारण यह रहा होगा कि समाज मे बहुत समय तक वृहत्कथा, हितोपदेश एव पञ्चतन्त्र की कहानियो का प्रचार था, सम्भवतः लोग उन्हीं ग्रन्थों को प्रधानरूप से पढते थे। धीरे-धीरे कालान्तर मे ऐसा लगता है कि समाज एवं मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में कुछ परिवर्तन आया और हल्के-फुल्के कहानियो के माध्यम से मनोरञ्जन करने की प्रवृत्ति का समाज में जन्म हुआ। यद्यपि शुकसप्तति की कथायें आदर्शात्मक हैं तथापि शुकसप्तति की कथाओं का समाज में प्रसार अपेक्षाकृत कम हुआ।

(8) <u>शुकसप्तति कथा अथवा आख्यायिका :</u>

कथा के उपर्युक्त विभाजनों मे से यदि मात्र दो मुख्य भेदों कथा और आख्यायिका को ही माना जाय तो इसका तात्पर्य है कि समग्र कथा सहित्य के ग्रन्थों का भी, विभाजन हो जायेगा जिसमें कुछ "कथा" के अन्तर्गत आयेंगे और कुछ "आख्यायिका" के। अब प्रश्न यह उठता है कि प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के अध्येय ग्रन्थ 'शुक-सप्तति' को किस वर्ग मे रखा जाय। आख्यायिका का पूर्वपक्षी विद्वान इसमें आख्यायिका के लक्षणो की उपस्थिति बताकर उसे आख्यायिका सिद्ध करने का प्रयास करेगा तो दूसरी ओर कथा के उत्तरपक्षी भी इसमें कथा के लक्षणों का प्रवेश बताकर उसे कथा ही सिद्ध करने का अटूट प्रयास करेंगे।

आख्यायिका के सामान्य लक्षण हैं-उच्छ्वासों से युक्त होना, वक्त्र, अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग होना, ऐतिहासिक व्यक्ति का वर्णन होना, संस्कृत में रचना होना, कवि के अभिप्राय विशिष्ट कथनों से युक्त होना तथा कन्याहरण, संग्राम आदि विपत्तियों से युक्त होना।

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आख्यायिका के इन लक्षणों में से कतिपय 'शुकसप्तति' में प्राप्त होते हैं। यथा—सस्कृत मे इसकी रचना है तथा कहानियो में वियोग आदि विपत्तियों का वर्णन है।

इसी प्रकार कथा की सामान्य विशेषतायें हैं ... कथा में सरस इतिवृत्त होता है, कहीं-कहीं आर्या, वक्त्र तथा अपरवक्त्र छन्दो का प्रयोग हो, लम्ब, लुम्बकों में विभाजन हो, संस्कृत, प्राकृत अथवा अपभ्रश में रचना हो, कुलीन व्यक्ति स्वगुण कथन नहीं कर सकता अतएव कथा मे नायक स्वयं अपना चरित्र वर्णन न करे, कथा के प्रारम्भ में पद्यों द्वारा देवस्तुति, सज्जन प्रशंसा, दुर्जन निन्दा इत्यादि का विधान होता है।

आख्यायिका की ही भाँति कथा की भी कतिपय विशेषताये 'शुक सप्तति'' में प्राप्त होती है इस ग्रन्थ का इतिवृत्त अतिसरस और रोचक है जो पाठक के मन में ग्रन्थ के प्रति रुचि बनाए रहता है, यह ग्रन्थ संस्कृत में रचित है, नायक द्वारा स्वयं अपने चरित्र का वर्णन नही किया गया है, तथा कथा के प्रारम्भ में पद्यों द्वारा माता शारदा की स्तुति की गई है तथा चिन्तामणि भट्ट और श्वेताम्बर जैन मुनि के संस्करणों में गद्य के मध्य पद्य भी प्राप्त है।

इस प्रकार कथा और आख्यायिका दोनों विधाओं की कुछ-कुछ विशेषतायें "शुकसप्तति" ग्रन्थ में प्राप्त होती हैं। किन्तु इनका विभाजन आधार रहित और अधिक स्थिर नहीं माना जाता है और अन्ततः एकमात्र कथा को ही महत्व दिया जाता है। आख्यायिका को कथा के समक्ष नहीं माना जाता है तथा 'कथा सरित्सागर' में कहानियों को कथा कहे जाने के कारण, कथा का प्रयोग कहानी के अर्थ में होने के कारण 'शुकसप्तति' के समस्त संस्करणों में इन कथाओं का अभिधान कथा रुप में ही होने के कारण यथा 'यशोदेवी की कथा', 'बालपण्डिता' की कथा 'मंडक की कथा' आदि चिन्तामणि भट्ट ओर श्वेताम्बर जैनके संस्करणों में मङ्गलाचरण के पश्चात् कथा का ही अभिधान होने से तथा स्वयं शुक द्वरा प्रत्येक कथा के सुनाने पर यदि विपत्ति में पडने

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पर ऐसी बुद्धि रखती हो तो जाओ-इस प्रकार "कथा" का ही सर्वत्र प्रचुरता से प्रयोग होने के कारण यदि इन कथाओं को "कथा" ही कह दिया जाय तो अनुचित नहीं होगा।

(ग) शुकसप्तति पर अन्य ग्रन्थों का प्रभाव :

शुकसप्तति का रचयिता अन्य नैतिक आदर्शों का उपदेशक है। शुकसप्तति की प्रत्येक कथा समाज को नैतिक मूल्यों, नैतिक आदर्शों का उपदेश देने के निमित्त उपनिबद्ध की गई है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ग्रन्थकार ने इन कथाओं की रचना तो की है साथ ही अन्य ग्रन्थों से भी सहायता ली है। शुकसप्तति के अध्ययन के पश्चात् यह स्पष्ट होता है कि कवि पर अन्य ग्रन्थों का प्रभूत प्रभाव पड़ा जिसके अन्तर्गत लोक-कथाये, रामायण, महाभारत, किरातार्जुनीयम्, रत्नावली, कालिदास आदि प्रमुख हैं।

पुराणो का भी यथेष्ट प्रभाव शुक सप्तति पर देखा जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रचनाकार अपने आदर्शों को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए एवं उसे और प्रभावशाली बनाने के निमित्त इन ग्रंथों के आदर्शस्थापक श्लोकों को उद्धृत किया है।

राज नियम का ज्ञान कराने हेतु ग्रन्थकार प्रभावती को शुक द्वारा उपदेश देने के माध्यम से हर पाठक को यह संदेश देताहै कि राजा का शरीर इन्द्र से ऐश्वर्य, अग्नि से तेज, यम से क्रोध, कुबेर से वित्त, राम एवं कृष्ण से बल एवं दृढ़ता लेकर रचा जाता है।¹ राजा के देवत्व स्वरूप का वर्णन "भुयोभूयः" वैदिक वाङ्गमय में दिखाई पड़ता है। राजा देवताओ का अंश होता है इसीलिए उसके लिए देव सम्बोधन का प्रयोग परवर्ती साहित्य में किया गया है। स्पष्ट है कि ग्रन्थकार पर वैदिक वाङ्गमय का प्रभाव था।


¹ इन्द्रात्प्रभुत्वं ज्वलनात्प्रतापं क्रोधं यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम्।
सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञः क्रियते शरीरम्।।
शुकसप्ततिः, श्लोक स० 49, पृ० सं० 39

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महाभारत का प्रभाव :

ग्रन्थकार महाभारत से खूब प्रभावित था। भिन्न-भिन्न प्रङ्गों में महाभारत के कई श्लोक उसी रुप मे शुकसप्तति मे उद्धृत कर दिये गये हैं। प्रजापालक राजा के सम्बन्ध में महाभारत का निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया गया है। जो कि भीम के सम्बन्ध में है हूबहू इस ग्रंथ मे उद्धृत किया गया है।

मा वृकोदर पादेन एकादशचमूपतिम्।।
पञ्चानामपि यो भर्ता नासाप्रकृतिमानवी।।¹

हे भीम! दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेना का मालिक है, पैर से इसका मर्दन मत करो-अपमानित मत करो। पाँच आदमियों का भी जो पोषण करता है वह मानवी प्रकृति नहीं है।

मनुष्य का मित्र धन होता है जिसके पास धन है वही संसार में पण्डित समझा जाता है इस कथन के समर्थन रूप में शुकसप्तति में महाभारत के श्लोक को पुनः उद्धृत किया गया है।

जीवन्तोऽपि मृताः पञ्च श्रूयन्ते किल भारत।
दरिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवकः।।²

हे भारत! दरिद्र, रोगी, मूर्ख, विदेशस्थ और नित्यसेवक—ये पाँच जीते हुए भी मृत समझे जाते हैं।

महाभारत के उद्धृत श्लोकों से स्पष्ट है कि ग्रन्थकार महाभारत से प्रभावित था।

रामायण का प्रभाव :

भारत को नैतिक शिक्षा का उपदेश देने वाले रामायण से भी ग्रन्थकार प्रभावित था। शुकसप्तति में यत्र-तत्र पात्र रामायण के श्लोकों से यह तथ्य स्वतः स्पष्ट है कि—स्वर्णनिर्मित लङ्का के प्रति विरक्ति एवं अयोध्या के प्रति आसक्ति को व्यक्त करने


1 शुकसप्तति., श्लोक सं० 50, पृष्ठ सं० 40
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 57, पृष्ठ सं० 44.

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वाले राम के द्वारा भरत के प्रति कहा गया यह श्लोक-लोभ नही करना चाहिए। इस आदर्श को व्यक्त करने के संदर्भ में उद्धृत किया गया है।

सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
पितृक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।¹

श्रीरामचन्द्र जी कह रहे हैं। हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्णनिर्मित लङ्का मुझे पसन्द नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन-रहित भी मुझे सुखकर है।

कालिदास का प्रभाव :

शुकसप्तति के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि कालिदास का प्रभूत प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा है। यही कारण है कि नैतिक आदर्शों का कथन करने वाले कालिदास के कतिपय श्लोक शुकसप्तति में यत्र-तत्र उद्धृत किये गये हैं। मित्रता का आदर्श प्रस्तुत करने वाला कुमारसम्भव का निम्नलिखित श्लोक बिना किसी परिवर्तन के इस ग्रन्थ मे उद्धृत हुआ है।

"यतः सता सन्नतगात्रिसङ्गतं मनीषिभिः साप्तपदीनमुच्यते।।"²

कुमारसम्भव महाकाव्य में ब्रह्मचारी वेश धारण किए शिव ने पार्वती से कहा है- हे (स्तनों के भार से)! झुके शरीर वाली, मनीषियों ने कहा है कि सज्जनों के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।

हर्षदेव का प्रभाव : '

महाराज हर्षदेव की रचनाओं का यथेष्ट प्रभाव ग्रन्थकार पर पड़ा। महाराज श्री हर्षदेव का समय छठीं शताब्दी के आस-पास माना जाता है। हर्षकृत रत्नावली के निष्कम्पक के अन्तर्गत वर्णित निम्नलिखित श्लोक को हू-ब-हू रूप में इस ग्रन्थ में


1 शुकसप्तति श्लोक सं० 314, पृष्ठ स० 263.
2 शुकसप्तति पृष्ठ सं०-265 (कुमारसंभव पञ्चम अंक)

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तृतीय अध्याय : शुकसप्तति - कथा परिचय

उद्धृत किया गया है। जिसमें कर्म की अपेक्षा भाग्यवादित की अवश्य सम्भाविता को सिद्ध किया गया है।

द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्। आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः॥¹

अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात् शीघ्र लाकर मिला देता है।

भारवि का प्रभाव :

किरातार्जुनीय जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ का भी पर्याप्त प्रभाव कवि पर पड़ा। किरातार्जुनीय का अत्यन्त प्रसिद्ध श्लोक जो राजनीतिक आदर्श के संदर्भ में है, शुकसप्तति में प्राप्त होता है। “शठेशाठ्यं समाचरेत्” के आदर्श को उपस्थित करने वाला यह श्लोक शुकसप्तति के 21 वीं (कथा) के अन्तर्गत उद्धृत किया गया है।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः। प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषवः ॥²

जो लोग कपटीजनों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नहीं करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीर वालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।

इन उद्धरणों के अतिरिक्त – इस ग्रन्थ में यत्र-तत्र उपमान के रुप में कवि ने अनेक ग्रन्थों के पात्रों का वर्णन किया है। जैसे-महाभारत के पात्र -भीम, दुर्योधन का।³ द्यूत क्रीडा में युधिष्ठिर द्वारा द्रौपदी को दाँव में लगाने का वर्णन हुआ। शिव पुराण एवं नीतिशास्त्र के प्रसङ्गों का भी यत्र-तत्र उल्लेख मिलता है।⁴


1 शुकसप्तति-श्लोक सं० 61, पृष्ठ सं० 47
2 शुक सप्तति -श्लोक सं० 123, पृष्ठ सं० 106.
3 शुकसप्ततिः-श्लोक स० 336, पृष्ठ सं० 279.
4 शुक सप्ततिः-श्लोक स० 96, 97, 135 पृष्ठ संख्या- 76, 77, 115

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इसके अतिरिक्त नारद द्वारा मदन नामक गंधर्व की पुत्री मदनमञ्जरी को शाप देने की कथा का वर्णन भी इसमें प्राप्त होता है।¹

इस प्रकार कहा जा सकता है कि शुकसप्ततिः का रचनाकार वैदिक वाङ्मय, अनेक पौराणिक ग्रन्थो एवं लौकिक काव्यों एवं नीतिशास्त्र का ज्ञाता था।



¹ अथान्यदा नारद समायातः। सोऽप्यस्या रूपमवलोक्य मूर्च्छित सकामोऽभूत्। पश्चाल्लब्धसंज्ञेन ऋषिणा सा शप्ता। शुकसप्तति, पृष्ठ स0 279-280 (चौखम्बा प्रकाशित, सम्वत् 2023)।

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तृतीय अध्याय

शुकसप्तति कथा परिचय

"शुकसप्तति "कथा-परिचय"

(1) ग्रन्थ का मूल स्वरूप :

शुकसप्तति के प्राप्त प्रधान दो संस्करणों साधारण और परिष्कृत के विवेचन के पश्चात् यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि इस ग्रन्थ का मूल स्वरूप क्या था। यह ग्रन्थ मूलतः गद्यात्मक था या पद्यात्मक या गद्य-पद्य मिश्रित था, यह भी निश्चित रूप से नहीं कह सकते। प्रसिद्ध इतिहासकार मङ्गलदेव शास्त्री का विचार है¹ कि इसका मूलरूप सम्भवतः सरल गद्य में रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्त्यात्मक पद्य और कथाओं के आदि और अन्त में उनके विषय वर्णन परक पद्य रहे होंगे।

शुकसप्तति के साधारण संस्करण के आधार पर कुछ विचारकों ने ऐसा विचार प्रकट किया है कि यह कथाग्रन्थ अपने मूलरूप में चाहे जिस भी रूप में रहा हो किन्तु बाद में अन्ततोतात्वा इसने एक पद्यात्मक रूप ग्रहण कर लिया था। इस कथा ग्रन्थ मे प्राकृत पद्यों की विद्यमानता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्भवतः यह सग्रह अपने मूलरूप में प्राकृतभाषा में रहा होगा किन्तु इस प्रश्न का कोई निश्चित समाधान प्रस्तुत नही किया जा सकता। ग्रन्थ का कलेवर मनोरञ्जक है। लोकभाषा के साहित्य पर अपने प्रभाव को छोड़कर इस ग्रन्थ का कोई विशेष आकर्षण नहीं है।

किसी ठोस सामग्री के अभाव में अनुमानतः यह कहा जा सकता है कि इसका मूलरूप गद्यात्मक रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्तियों के कथन हेतु पद्यों का प्रयोग किया गया रहा होगा। यद्यपि शुकसप्तति से पूर्व प्राप्त कथाग्रन्थ जैसे वृहत्कथा आदि जो प्राप्त नहीं हैं किन्तु उसका संस्करण विशेष रूप से कश्मीरी संस्करण पद्यात्मक है। इस प्रकार पञ्चतन्त्र भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक है हितोपदेश भी भी पद्यात्मक है। इसी क्रम में शुकसप्तति के विषय में भी ऐसी अवधारणा प्रस्तुत की जा


¹ संस्कृत साहित्य का इतिहास, मगलदेव शास्त्री