शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोता है। जब वे एक घटना को उद्धत करते हैं जो यद्यपि हमारी पुस्तकों के पाठ में नही है किन्तु जिसके अंतर्गत एक तोता एक बिल्ली के द्वारा पकड़ लिया जाता है। इससे संभवतः यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि शुकसप्तति के बहुत अनेक पाठ पहले से ही वर्तमान थे।¹ अतएव यह कहा जा सकता है कि 1000 ई० से 1400 ई० के मध्य इसकी रचना हुई होगी।
(3) अनुवाद : 14 वीं शताब्दी में इसका फारसी में अनुवाद हुआ है। सिन्दबाद जहाजी की कहानियों का आधार यही है, जैसा कि 'किनाथुल सिन्दबाद' के लेखक मसूदी (956 ई०) ने लिखा है कि यह कथा राजा कुरूष के समय भारत में लिखी गई थी और इसका आधार भारतीय ही है। इसका भारतीय नाम 'सिद्धपति की कथा' है जो कि अब अप्राप्त है। यद्यपि इसका यूनानी अनुवाद सिंत्तिपास तथा 'हिब्रू-संदवार' आदि प्राप्य हैं। 'नख्शबी' ने 22,29,30 ईसवी में साहित्यिक फारसी में इसका तूतिनामह नाम से अनुवाद प्रस्तुत किया, जिसका बाद में तुर्की में भी अनुवाद हुआ।
(4) वर्ण्य विषय : शुकसप्तति का स्वरूप अत्यन्त मनोहारी, सहज, आकर्षक एवं लोक-कल्याणकारी है। यह 70 कहानियों का सर्वोत्कृष्ट संग्रह है।
हरिदत्त नामक सेठ के मदनविनोद नाम का एक पुत्र था। जो विषयासक्त कुपुत्र था। जो पिता के समक्ष भी कृतघ्न था, जिसके आचरण एवं अनुशासनहीनता को देखकर सेठ को सपरिवार ही अत्यंत त्रासदी की अनुभूति करनी पड़ी।
त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण जो कि हरिदत्त सेठ का मित्र था, उसने सेठ के कष्ट निवारणात् अपने घर से नीति-निपुण शुक और सारिका लेकर उसके घर जाकर कहा—मित्र! इस सपत्नीक शुक का पालन-पोषण पुत्रवत् करो, इसके आचरण मात्र से तुम्हारे सारे कष्टों का निवारण हो जायेगा।
1 ए०बी० कीथ संस्कृत साहित्य का इतिहास।
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