शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(7) प्रचार एवं प्रसार : शुक सप्तति यद्यपि मनोरञ्जक है किन्तु इसे उतनी प्रसिद्धि एवं ख्याति नही मिल पायी जितनी अन्य कथाग्रन्थों को मिली। संभवतः इसका एक प्रमुख कारण यह रहा होगा कि समाज मे बहुत समय तक वृहत्कथा, हितोपदेश एव पञ्चतन्त्र की कहानियो का प्रचार था, सम्भवतः लोग उन्हीं ग्रन्थों को प्रधानरूप से पढते थे। धीरे-धीरे कालान्तर मे ऐसा लगता है कि समाज एवं मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में कुछ परिवर्तन आया और हल्के-फुल्के कहानियो के माध्यम से मनोरञ्जन करने की प्रवृत्ति का समाज में जन्म हुआ। यद्यपि शुकसप्तति की कथायें आदर्शात्मक हैं तथापि शुकसप्तति की कथाओं का समाज में प्रसार अपेक्षाकृत कम हुआ।
(8) <u>शुकसप्तति कथा अथवा आख्यायिका :</u>
कथा के उपर्युक्त विभाजनों मे से यदि मात्र दो मुख्य भेदों कथा और आख्यायिका को ही माना जाय तो इसका तात्पर्य है कि समग्र कथा सहित्य के ग्रन्थों का भी, विभाजन हो जायेगा जिसमें कुछ "कथा" के अन्तर्गत आयेंगे और कुछ "आख्यायिका" के। अब प्रश्न यह उठता है कि प्रस्तुत शोध-प्रबन्ध के अध्येय ग्रन्थ 'शुक-सप्तति' को किस वर्ग मे रखा जाय। आख्यायिका का पूर्वपक्षी विद्वान इसमें आख्यायिका के लक्षणो की उपस्थिति बताकर उसे आख्यायिका सिद्ध करने का प्रयास करेगा तो दूसरी ओर कथा के उत्तरपक्षी भी इसमें कथा के लक्षणों का प्रवेश बताकर उसे कथा ही सिद्ध करने का अटूट प्रयास करेंगे।
आख्यायिका के सामान्य लक्षण हैं-उच्छ्वासों से युक्त होना, वक्त्र, अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग होना, ऐतिहासिक व्यक्ति का वर्णन होना, संस्कृत में रचना होना, कवि के अभिप्राय विशिष्ट कथनों से युक्त होना तथा कन्याहरण, संग्राम आदि विपत्तियों से युक्त होना।
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