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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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परन्तु ये विशेषतायें सर्गबद्ध महाकाव्य, खण्ड काव्यादि की हैं। सिर्फ आख्यायिका की ही विशेषतायें नहीं। यदि इनका प्रयोग कवि आख्यायिका मे कर सकता है तो कथा में भी स्वतन्त्र रुप में इनका प्रयोग कर सकता है।¹

  1. आख्यायिका वक्त्र, अपरवक्त्र छन्दो से युक्त रहती है और कथा इससे रहित होती है। परन्तु दण्डी के अनुसार-जिस प्रकार कथा में आर्या आदि छन्दों का प्रयोग होता है, उसी प्रकार स्वरूप में कोई परिवर्तन किये बिना वक्त्र तथा अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग भी स्वतन्त्र रूप से किया जा सकता है। यदि पूर्वपक्षी यह प्रश्न उठाये कि आख्यायिका में उच्छ्वास होते हैं और कथा में लम्ब, लुम्बकादि तो दण्डी का उत्तर है कि कथांशो के विभाग को परिच्छेद, उच्छ्वास, अध्याय आदि नाम देने से कोई अन्तर नहीं पडता क्योकि यह तो सिर्फ नाम मात्र का भेद है, स्वरुपगत कोई भेद नहीं।²

  2. दण्डी के समय तक में आख्यायिका केवल संस्कृत में लिखी जाती थी और कथा पालि, अपभ्रंश, संस्कृत में लिखी जाती थी।³ आख्यायिका राजवंशानुकीर्तन से सम्बद्ध होने के कारण संस्कृत में लिखी जाती थी किन्तु कथा लोक काव्य भी लोकप्रिय थी, जबकि राज्याश्रित कवि आख्यायिका को ही अपनाते थे। दण्डी ने कथा को विशेष महत्व दिया, कथा के प्रति अपना आग्रह दिखाकर लोक-काव्य को प्रोत्साहन एवं


1 '’कन्या हरण संग्राम विप्रलम्भोदयादयाः।
सर्गबन्ध समा एव नैते वैशेषिका गुणः।।'’
'काव्यादर्श', 1-24.

2 '’वक्त्र चापरवक्त्रं चा सोच्छ्वासत्व च भेदकम्
चिह्नममाख्यायिकायाश्च प्रसंगेन कथास्वपि।।
आर्यादिवत् प्रवेशः कि न वक्त्रापर वक्त्रयो।
भेदश्च दृष्टो लम्भादिरुच्छ्वासो वास्तु कि ततः।।'’ - 'काव्यादर्श', 1/26-27

3 '’कथा हि सर्वभाषाभिः संस्कृतेन च बध्यते।'’ - 'काव्यादर्श', 1-38

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