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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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समस्या प्रस्तुत करता है तथा उसकी विरहजन्य पीड़ा को दूर करने का प्रयत्न करते हुए व्यभिचार से मोडता है। इतनी कठिन साधना अत्यन्त सरलता और मनोञ्जन के साथ पक्षी के द्वारा करने का प्रयास कवि की विलक्षण प्रतिभा नही तो और क्या?

(5) ग्रन्थ का आधार: मानव-जाति का यह क्रम युगारम्भ से अविरल गति से भविष्य की ओर से संचालित होता आ रहा है। प्रत्येक युग की उनकी कुछ विशिष्ट विशेषतायें होती हैं। हर-युग तत्कालीन परिस्थितियों एवं लोक-भावनाओं का समादर करता हुआ अग्रसर है। अन्य कहानी संग्रहों की तुलना में शुकसप्तति अपने युग की सर्वाधिक प्रसिद्ध रोचक एव कल्याणकारी रचनाओं में से एक है। स्पष्ट रूप से यह नही कहा जा सकता है कि शुकसप्तति की कथायें मूलरुप से किसी कथाग्रंथ का अंश है अथवा स्वतंत्र रुप से इन 70 कहानियों की रचना की गई है।

भारत में वैदिक युग के भारतीयों के जीवन के प्रारम्भिक काल से ही अनेक प्रकार की कहानियाँ लोगों में प्रचलित हैं। साधारण सी कहानी को एक निश्चित उद्देश्य के लिए उपयोग में लाया जाना उपदेशात्मक कथा का जीवनोपयोगी ज्ञान समझाने के लिए एक निश्चित मार्ग बन जाना कहानियों के इतिहास में एक स्पष्ट तथा महत्वपूर्ण कदम था। ऋग्वेद ¹ के एक प्रसिद्ध सूक्त का जिसमें यज्ञ के अवसर पर मन्त्रगान करते हुए ब्राह्मणों की तुलना टर्र-टर्र करने वाले मेढकों से की गयी है। इससे स्पष्ट है कि मनुष्यो तथा प्राणियों के बीच एक प्रकार का सम्बन्ध स्थापित कर लिया गया है।² उपनिषदों में यह तथ्य और स्पष्ट रूप से प्रकट होता है जहाँ पक्षियों और पशुओं को उपदेश का माध्यम बनाया गया। आगे चलकर हमें महाभारत में अनेक पशुओं से सम्बन्धित कथायें प्राप्त होती हैं। वास्तव में "महाभारत" में हमें वह बीजभूत आधार प्राप्त होता है जो "पञ्चतन्त्र" के विकास के हेतुभूत सामग्री की ओर दृढ़तापूर्वक संकेत करता है। बौद्ध एवं जैन साहित्य में भी पशुओं से सम्बन्धित


1 ऋग्वेद 7.103 2 छान्दोग्य उपनिषद 1.12, (iv) 1, 5, 7 f.

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