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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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"शुकसप्तति "कथा-परिचय"

(1) ग्रन्थ का मूल स्वरूप :

शुकसप्तति के प्राप्त प्रधान दो संस्करणों साधारण और परिष्कृत के विवेचन के पश्चात् यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि इस ग्रन्थ का मूल स्वरूप क्या था। यह ग्रन्थ मूलतः गद्यात्मक था या पद्यात्मक या गद्य-पद्य मिश्रित था, यह भी निश्चित रूप से नहीं कह सकते। प्रसिद्ध इतिहासकार मङ्गलदेव शास्त्री का विचार है¹ कि इसका मूलरूप सम्भवतः सरल गद्य में रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्त्यात्मक पद्य और कथाओं के आदि और अन्त में उनके विषय वर्णन परक पद्य रहे होंगे।

शुकसप्तति के साधारण संस्करण के आधार पर कुछ विचारकों ने ऐसा विचार प्रकट किया है कि यह कथाग्रन्थ अपने मूलरूप में चाहे जिस भी रूप में रहा हो किन्तु बाद में अन्ततोतात्वा इसने एक पद्यात्मक रूप ग्रहण कर लिया था। इस कथा ग्रन्थ मे प्राकृत पद्यों की विद्यमानता के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सम्भवतः यह सग्रह अपने मूलरूप में प्राकृतभाषा में रहा होगा किन्तु इस प्रश्न का कोई निश्चित समाधान प्रस्तुत नही किया जा सकता। ग्रन्थ का कलेवर मनोरञ्जक है। लोकभाषा के साहित्य पर अपने प्रभाव को छोड़कर इस ग्रन्थ का कोई विशेष आकर्षण नहीं है।

किसी ठोस सामग्री के अभाव में अनुमानतः यह कहा जा सकता है कि इसका मूलरूप गद्यात्मक रहा होगा जिसके बीच-बीच में सूक्तियों के कथन हेतु पद्यों का प्रयोग किया गया रहा होगा। यद्यपि शुकसप्तति से पूर्व प्राप्त कथाग्रन्थ जैसे वृहत्कथा आदि जो प्राप्त नहीं हैं किन्तु उसका संस्करण विशेष रूप से कश्मीरी संस्करण पद्यात्मक है। इस प्रकार पञ्चतन्त्र भी गद्यात्मक एवं पद्यात्मक है हितोपदेश भी भी पद्यात्मक है। इसी क्रम में शुकसप्तति के विषय में भी ऐसी अवधारणा प्रस्तुत की जा


¹ संस्कृत साहित्य का इतिहास, मगलदेव शास्त्री