शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूचक वक्त्र और अपरवक्त्र छन्द प्रयुक्त होते हैं। यह कवि के अभिप्राय विशिष्ट कथनों से युक्त और कन्याहरण, सग्राम, वियोग तथा उदय आदि से युक्त होती हैं।¹
विश्वनाथ द्वारा दिया गया आख्यायिका का लक्षण भामह के लक्षण से यत्किञ्चित मेल खाता है।
आचार्य रुद्रट ने कादम्बरी और हर्षचरित को लक्ष्य में रखकर कथा और आख्यायिका के भेद का निरूपण किया है। इनके द्वारा दिये गये आख्यायिका का लक्षण आचार्य विश्वनाथ और भामह द्वारा प्रतिपादित लक्षण का मिश्रित रूप कहा जा सकता है।²
आचार्य आनन्दवर्धन ने भी कथा और आख्यायिका मे भेद को स्वीकार करते हुए संघटना विवेचन के प्रङ्ग में इनका उल्लेख किया है। इनके द्वारा दिया गया आख्यायिका का लक्षण अन्य आचार्यों से पृथक है। आचार्य आनन्दवर्धन के अनुसार आख्यायिका में प्रचुरता से मध्यम समास युक्त या दीर्घसमास युक्त संघटना होती है, क्योंकि गद्य में काव्य–सौन्दर्य विकट वन्ध से आता है, कथा में विकट वन्ध का प्राचुर्य होने पर भी रस–वन्ध में कहे हुए औचित्य का अनुसरण करना चाहिए।³
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'‘संस्कृतानुकूल श्रव्य शब्दार्थ पद वृत्तिना।
गद्येन युक्तोदात्तार्था सोच्छ्वासाख्यायिका मता।
वृत्तमाख्यायते तस्यां नायकेन स्वचेष्टितम्।
वक्त्राचापरवक्त्र च काले भाव्यर्थशाम्सि च।।
कवेरभिप्राय कृतै. कथनै. कैश्र्चिदकिता।
कन्याहरण संग्राम विप्रलम्भोदयान्विता।।'’
—भामह, 'काव्यालकार', 1/25–27 -
'‘पूर्वदेव नमस्कृत्य देवगुरूनौत्सिहेत् स्थितेष्वेपु।
काव्य कर्त्तुमिति कवी शसदाख्यायिकायां तु।।
तदनु नृपे वा भक्ति परगुणे सकीर्तनंऽथवा व्यसनम्।
अन्यद्वा तत्करणे कारणमाविल्ष्टमभिदध्यात्।।
अथ तेन कथैव यथा रचनीयाख्यायिकापि गद्येन।
निजवंशं स्वं चास्याभिदध्याल त्वगद्येन।।
कुर्यादितोच्छ्वासान् सर्वदवेषा मुखेष्वनाद्यानाम्।
द्वे द्वे चार्थे श्लिष्टे सामान्यार्थे तदर्थाय।।'’
........रुद्रट, काव्यालंकार, सत्यदेव चौधरी द्वारा सम्पादित, 16/24–27 -
'पर्यायबन्ध परिकथा खण्डकथा सकल कथे सर्ग बन्धोऽभिनेयार्थमाख्यायिका कथे इत्येवमादय ।'
... .... 'ध्वन्यालोक', तृ० 30, पृ० 323तथा
"आख्यायिकाया तु भूम्ना मध्यम समास दीर्घ समासे एव संघटने।
गद्यस्य विकट बन्धाश्रयेण छायावत्वात्। तत्र च तस्य प्रकृष्ट माणत्वात्।
कथायां तु विकटवन्ध प्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोक्तमौचित्यमनु सर्तव्यम्।”
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