भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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नीति एव धर्म के ही परिप्रेक्ष्य मे उपदेश देने वाली कथाओं का उपयोग जैन मुनियों ने भी किया। (नानाधम्मकहायो) तथा (उत्तराञ्झयण सुत्त) आदि आगम ग्रन्थों मे लोकानुरञ्जन के बहाने वैराग्य का उपदेश दिया गया है। इसी प्रकार अर्द्धमागधी, महाराष्ट्री, प्राकृत मे जैनियो का कथा-साहित्य भण्डार है। संस्कृत में भी जैन मुनियों का कथा-साहित्य के सेवा में बहुत अच्छा कार्य है। इस परिप्रेक्ष्य में "हरिषेणाचार्य" द्वारा रचित "वृहत्कथाकोष" दिगम्बर सम्प्रदाय का प्रतिनिधि ग्रन्थ है। इसी परम्परा में जैन मुनियों के अनेक अवदान हैं। यथा-श्रीचन्द्र का "कथा-कोश", नेमिदत्त का "कथा कोश", जिनेश्वर "कथाकोश प्रकरण", जयसिंह सूरी "धर्मोपदेशमाला" (प्राकृत), हेमचन्द्र "परिशिष्ट पर्वन" आदि प्रमुख ग्रन्थ है।

इस प्रकार साहित्य समाज का दर्पण होता है। इस कहावत को पूर्णतया चरितार्थ करती हुई कथा-शिल्प की धारा विपुल संस्कृत-साहित्य का सर्वस्व कही जा सकती है। थोड़े में उपर्युक्त ढंग से सम्प्राप्त कथाओं के विविध स्वरूप का विवेचन स्पष्ट करते हुये मुझे यह कहने मे कि साहित्य में कथा प्राणात्मिका होती है, तनिक भी हिचक नही है। विवेचन के अनुसार यह भी अनुभूति होती है कि आधुनिक साहित्य एवं कालान्तर में भी कालचक्र के अनुसार कथा-साहित्य किसी न किसी रूप में प्रवाहित होता ही रहेगा।

(6) कथा का विकास :

संस्कृत के कथा-साहित्य का विकास वैदिक, संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश आदि कई स्थितियों एवं युगों से होकर गुजरता है। इन सभी युगों में कथा-साहित्य का अपना एक विशिष्ट दृष्टिकोण या एक ही जैसा शिल्प-सौन्दर्य एवं मान्यतायें नहीं रही हैं। वैदिक संहिताओं में कथाओं की जगह कथा के तत्व प्रचुर रूप में फैले हुए हैं। मन्त्र-संहिताओं के संवाद सूक्तों में भारतीय साहित्य के विभिन्न पहलुओं को रूप-रंग और वाणी देने वाले संजीवन तत्व मिलते हैं। मंत्र-संहिताओं की

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