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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 208 में से

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कथाओं का निर्माण हुआ। इन पौराणिक लोक प्रचलित कथाओं का प्रभाव उस प्रकाश मे बौद्ध जातकों पर स्पष्ट रूप से पड़ा। भगवान तथागत से सम्बद्ध लगभग 'पांच सौ कथाये' इन जातको मे संकलित है। ये जातक कथायें व्यापक और मानवीय समक्ष के बहुत समीप हैं। इनमें यथार्थ कल्पना और व्याख्या के तत्वों का एक सत्य तादात्म्य होने के कारण कथा के क्षेत्र मे इन जातक कथाओं को प्रथम कलात्मक देन कहा जा सकता है। इन कथाओ में समाज की विभिन्न श्रेणियों के लोग, मनुष्य और पशु-पक्षी, नदी, पर्वत, पेड-पौधे की कहानियाँ बडी ही रोचक हैं।

इन कथाओं की ऐसी सवाभिभूत भावना का एक मात्र कारण उनके सुन्दर कथाशिल्प एवं उनको मनोवैज्ञानिक ढंग से सजाने की निपुणता में है। ये कथा कहानियाँ कुछ तो तत्कालीन जीवन के पराक्रमों पर आधारित हैं, कुछ समुद्री यात्राओं से सम्बद्ध, कुछ आश्चर्यपूर्ण घटनाओं से युक्त, कुछ आकाश लोक एवं गन्धर्व लोक का चित्रण करने वाली, कुछ धर्म प्रेरणा से पूरित, कुछ नीतिपूरक और अधिकांश शिक्षात्मक तथा उपदेशात्मक ही हैं।

(7) कथा का महत्व :

भारतीय संस्कृति में संस्कृत साहित्य का योगदान पूरे भू-मण्डल पर छिपा नहीं है। उसका मूलभूत कथा-शिल्प भारतीय शिल्पकारों द्वारा अत्यन्त बारीकी एवं मनोवैज्ञानिक रीति से प्रस्तुत किए जाने के कारण संसार में कथा रसिकों के सम्प्रदाय में अत्यन्त सम्मानित एवं सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करता हुआ प्रशंसित होता चला आया है। वैदिक काल से लेकर आज तक संस्कृत कथा साहित्य एक लम्बे अरसे से विभिन्न युगों में विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल क्रमशः विकसित होता चला आ रहा है एव देश-विदेशों में भारतीय कथायें अनुवाद के रूप में भी सर्वत्र प्रसारित हुई हैं।

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