शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
कथाओं का निर्माण हुआ। इन पौराणिक लोक प्रचलित कथाओं का प्रभाव उस प्रकाश मे बौद्ध जातकों पर स्पष्ट रूप से पड़ा। भगवान तथागत से सम्बद्ध लगभग 'पांच सौ कथाये' इन जातको मे संकलित है। ये जातक कथायें व्यापक और मानवीय समक्ष के बहुत समीप हैं। इनमें यथार्थ कल्पना और व्याख्या के तत्वों का एक सत्य तादात्म्य होने के कारण कथा के क्षेत्र मे इन जातक कथाओं को प्रथम कलात्मक देन कहा जा सकता है। इन कथाओ में समाज की विभिन्न श्रेणियों के लोग, मनुष्य और पशु-पक्षी, नदी, पर्वत, पेड-पौधे की कहानियाँ बडी ही रोचक हैं।
इन कथाओं की ऐसी सवाभिभूत भावना का एक मात्र कारण उनके सुन्दर कथाशिल्प एवं उनको मनोवैज्ञानिक ढंग से सजाने की निपुणता में है। ये कथा कहानियाँ कुछ तो तत्कालीन जीवन के पराक्रमों पर आधारित हैं, कुछ समुद्री यात्राओं से सम्बद्ध, कुछ आश्चर्यपूर्ण घटनाओं से युक्त, कुछ आकाश लोक एवं गन्धर्व लोक का चित्रण करने वाली, कुछ धर्म प्रेरणा से पूरित, कुछ नीतिपूरक और अधिकांश शिक्षात्मक तथा उपदेशात्मक ही हैं।
(7) कथा का महत्व :
भारतीय संस्कृति में संस्कृत साहित्य का योगदान पूरे भू-मण्डल पर छिपा नहीं है। उसका मूलभूत कथा-शिल्प भारतीय शिल्पकारों द्वारा अत्यन्त बारीकी एवं मनोवैज्ञानिक रीति से प्रस्तुत किए जाने के कारण संसार में कथा रसिकों के सम्प्रदाय में अत्यन्त सम्मानित एवं सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त करता हुआ प्रशंसित होता चला आया है। वैदिक काल से लेकर आज तक संस्कृत कथा साहित्य एक लम्बे अरसे से विभिन्न युगों में विभिन्न परिस्थितियों के अनुकूल क्रमशः विकसित होता चला आ रहा है एव देश-विदेशों में भारतीय कथायें अनुवाद के रूप में भी सर्वत्र प्रसारित हुई हैं।
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कथा साहित्य के अंकुरण से लेकर फल तक का विकास सुस्पष्ट है। संहिताओं में प्रक्षिप्त होकर धीरे-धीरे कालान्तर मे वही कथा के तत्व बीज रूप में ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यको के आख्यानों में पूर्णतया अंकुरित होकर रामायण, महाभारत, पुराणों के आख्यानो मे पल्लवित, वृहतकथा, जातक, पञ्चतन्त्र में आकर विकास के क्रम में पुष्पित होते हुए बेताल-पचविंशतिका, दशकुमार-चरित एवं हितोपदेश आदि कथा सग्रह के रूप में समाज के सच्चे मायने में पथ प्रदर्शक हैं।
कथा साहित्य प्राचीन काल से लेकर अब तक की अपनी पूरी यात्रा में सस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि अनेकशः भाषाओं का सहारा लेकर युगों से प्रवाहमान होता हुआ एक ही जैसा दृष्टिकोण या शिल्प सौन्दर्य तथा मान्यतायें नहीं रखा, बल्कि विकास के क्रम मे उच्चाउच्च मार्गों को लाँघते हुए भी भारतीय चिन्तन का निर्देशन एवं शिक्षा बदलते हुए भी परिस्थितियों एवं शिल्प में करता आ रहा है। अपनी संजीवनी शक्ति से भूमण्डल पर विभिन्न रूप से अविकसित कथा शिल्प में पूर्ण योगदान करता चला आ रहा है।
कथा साहित्य सबसे अधिक संबलित एवं विपुल संपदा से ओत प्रोत वैदिक काल के उपनिषद् ग्रंथो में विद्यमान है। उन्ही से अनुप्राणित होकर रामायण, महाभारत कालीन कथा-साहित्य सुविकसित होकर विश्व में अपना कोई शानी नहीं रखता। थोडे में हमने पीछे भी कथा साहित्य के विकास पर छिट-पुट विमर्श किया है। अब यहाँ भी इसके विकास पर अधिक न कहकर केवल आध्यात्मिक चेतना से भरपूर मनोरञ्जन की दृष्टि से भी पूर्ण उपयोगी भारतीय कथा कहानियाँ नीतिपरक एवं अधिकांशतः शिक्षाप्रद एवं उपदेशात्मक ही हैं, चाहे वह किसी रूप में बदलती-बिगड़ती कालक्रम में ढलती रही हैं।
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(8) भारतीय कथा-साहित्य की विशेषतायें :
कथा साहित्य की निम्नतः विशेषताये हैं :-
1 कथानको मे नाटकों और काव्यों की भांति पौराणिक या ऐतिहासिक, पात्रों का प्रयोग नहीं होता है बल्कि शुद्ध काल्पनिक जगत का चित्रण मिलता है। यह कथन प्रारम्भिक कथाओं मे तो सत्य प्रतीत होता है, कालान्तर में कुछ ऐतिहासिक कथायें भी लिखी गई।
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जीव-जन्तु और पशु-पक्षी भी मानव की बोली-बोलते हैं, अभिनय करते हैं, रोचक ढंग से मानवों को उपदेश देते हैं, उनके साथ सम्पर्क स्थापित करते हैं एवं उनकी सहायता करते हैं तथा स्वयं भी उनसे सहायता की अपेक्षा रखते हैं।
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निवेदन की मंजूषा विधि का प्रयोग ब्राह्मण-काल से विस्तार को प्राप्त कर पुराण काल तक पूर्ण परिपक्व अवस्था को प्राप्त होता है।
4 कथा साहित्य का एक विशेष प्रकार नीति कथायें भी हैं। "कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते" अर्थात ये बालोपयोगी हैं और कथाओं के माध्यम से इनमें नीति के रहस्यो की शिक्षा दी जाती है।
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इसमें मानव पात्र न होकर जीव-जन्तु या पशु-पक्षी पात्र होते हैं।
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ये मुख्यतया नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र से सम्बद्ध हैं।
7 इनमें जीवन का व्यवहारिक पक्ष वर्णित होता है। दैनिक जीवन, दैनिक व्यवहार, व्यक्ति और समाज का सम्पर्क कर्तव्याकर्तव्य का उपदेश आदि वर्णित होता है।
8 इनमें नीति एवं धर्म की शिक्षा दी जाती है, अतः धर्मशास्त्र से भी इनका सम्बन्ध है।
[ 20 ]
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इनमें जीवन का लक्ष्य आदर्शवादिता न बताकर लोक-व्यवहारज्ञता एवं नीति निपुणता बताया गया है।
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इनमें जीवन के भले और बुरे दोनों पक्षों का वर्णन है। जैसे-जीवन की पवित्रता, कर्तव्य पालन, मित्र की रक्षा, वचन-पालन आदि गुणों के वर्णन के साथ ही ब्राह्मणों का छल-प्रपञ्च और दम्भ, अन्तःपुर के कपट-व्यवहार, स्त्रियों की दुश्चरित्रता आदि दोषो का भी वर्णन है।
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नीति कथाओं के पात्र पशु-पक्षी आदि मनुष्यों के तुल्य मित्रता, प्रेम, विवाद, लोभ, छल, सन्धि, विश्वासघात, विग्रह आदि करते हैं। उनके राजा, मन्त्री, दूत आदि सभी कुछ हैं। वे अवसरोचित सभी कार्य करते हैं। ये मानवीय गुणों और स्वभाव से युक्त होते हैं।
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इनमे प्रमुखता के लिए आदेश या नीति का अंश पद्यों में दिया गया है और कथा गद्य मे दी गई है। एक भाव वाले विभिन्न श्लोक अनेक नीति ग्रन्थों से संग्रह करके वक्तव्य की पुष्टि के लिए दिए गये हैं। स्थान-स्थान पर प्रसङ्गानुसार सुभाषित भी नीतिग्रन्थों आदि से दिए गये हैं।
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इनका प्रतिपाद्य विषय सदाचार, राजनीति और व्यवहार ज्ञान है।
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इनमें जीवन की सफलता के लिए आवश्यक सभी गुणों का वर्णन है। जिन बातों को न जानने से मनुष्य जीवन में असफल हो जाता है, उनकी चेतावनी भी कथाओं द्वारा दी जाती है।
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ये नीति-कथायें, पशु-पक्षियों आदि से सम्बद्ध हैं, अतः मानव मात्र के लिए रोचक और उपादेय हैं।
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इनमे एक मुख्य कथा के अन्तर्गत अनेक उपकथाओं का समावेश होता है।
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इनकी शैली सरल और सुबोध है। इनमें पाण्डित्य प्रदर्शन का सर्वथा अभाव रहता है। कथा में प्रवाह और रोचकता है।
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इनमें कथा, नीति, सदाचार, व्यवहार ज्ञान, धर्म, दर्शन, उपदेश और काव्य-सौन्दर्य का सुन्दर समन्वय रहता है।
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नीति कथायें गद्य मे और उनसे प्राप्त होने वाली शिक्षा पद्य में वर्णित है। इनका उद्देश्य रोचक कथाओं द्वारा त्रिवर्ग की बातों का मार्मिक उपदेश देना है। इनमे चुभते हुए मुहावरे, अनूठी लोकोक्तियाँ तथा रोचक दृष्टान्तों का सर्वत्र प्राधान्य है।
20 कादम्बरी के अतिरिक्त समस्त सस्कृत-साहित्य प्रसादगुण वाली भाषा में लिखा गया है।
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जहाँ भी कथा के मध्य छन्द आये हैं, आर्या, अनुष्टुप आदि लघु छन्द ही प्रमुख हैं, किन्तु कालान्तर में रचित कथाओं के मध्य विशालकाय चतुःचरण वाले छन्द भी प्राप्त होते हैं।
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सामासिक शैली के प्रधान ग्रन्थों "दशकुमारचरित", "वासवदत्ता" एवं कादम्बरी के अतिरिक्त वर्णन विस्तार न्यून रूप से प्राप्त होता है।
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नीति कथायें जहाँ उपदेश प्रधान होती हैं, वहीं लोक कथायें कल्पना प्रधान। यदि नीति कथायें पशु-पक्षियों से सम्बन्ध रखती हैं तो लोककथायें मानव जीवन से अनुस्यूत ही नहीं अनुप्राणित भी हैं।
इस प्रकार भारतीय कथायें सामान्य रूप में भारतीय-संस्कृति के अनुसार चलने तथा लोक व्यवहार में निपुण होने का आदेश देती हैं। इनकी शैली सरल एवं रोचक हैं तथा इनमें पांडित्य-प्रदर्शन का सर्वथा अभाव हैं, कथा में प्रवाह और रोचकता सदैव बनी रहती है। "शुकसप्तति" भी इसी प्रकार की रचना है।
[ 22 ]
(9) संस्कृत साहित्य में रचित कथा ग्रंथ :
संस्कृत-साहित्य के अन्तर्गत अनेक कथा ग्रन्थों की रचना हुई, जिनमें प्रथम शुद्ध कथाग्रन्थ विष्णुशर्मा कृत "पञ्चतन्त्र" को माना जा सकता है। " पञ्चतन्त्र" में कल्पित कथाओं का बाहुल्य है तथा साहित्यिक एवं कलात्मक तत्वों का पर्याप्त अभाव है। तथापि " पञ्चतन्त्र" कल्पित-कथाओं का वृहत् संकलन है। तत्पश्चात वह गुणाढ्य कृत "वृहत्कथा" तथा उसके तीन सस्करण के रूप में नेपाल के बुद्धस्वामी कृत "वृहत्कथा संग्रह" (8 वी शताब्दी) क्षेमेन्द्र की "वृहत्कथा मंजरी" तथा सोमदेव भट्ट कृत "कथा सरित्सागर" (1063 से 1081 ई०) का स्थान आता है। इसके पश्चात् कथा-ग्रथो की दीर्घ परम्परा प्राप्त होती है, जिसमें जम्भलदत्त, शिवदास, वल्लभदास तथा सोमदेव के सस्करणो में प्राप्त वेताल कथा-चक, सिंहासनद्वात्रिंशका अथवा द्वात्रिंशत्पुत्तलिका अथवा विक्रम-चरित (1018-63 ई०) शुकसप्तति (लगभग 12 वी शताब्दी), मैथिल कवि विद्यापति कृत "पुरुषपरीक्षा" (15 वी शताब्दी), शिवदास कृत "कथार्णव" (15 वीं शताब्दी) बल्लाल सेन का "भोजप्रबन्ध" (16 वीं शताब्दी) जगन्नाथ मिश्र का "काव्यप्रकाश" (16 वीं शताब्दी) नारायण बालकृत "ईसन्नीति कथा" में ईसप् की कहानियो का "Aesop's Febles" अनुवाद है।
विक्रम चरित सम्बद्ध अनेक कथा-ग्रंथों की रचना की गई है, जैसे-अनन्त रचित "वीर चरित", शिवदास कृत "शालिवाहन कथा", अज्ञात लेखक कृत "विक्रमोदय", मेरूतुंग कृत "प्रबन्ध चिन्तामणि", राजशेखर कृत "प्रबन्ध कोश", हेमचन्द्र कृत "त्रिषष्टिश्लाका पुरूष चरित", सिद्धर्षि कृत "उपमति-भाव प्रपञ्च कथा", जगन्नाथ मिश्र रचित "कथा-प्रकाश", "कथा-कोष, प्रभाचन्द्र कृत "प्रभावान चरित", समय सुन्दर कृत "कालिकाचार्य कथा," सोमचन्द्र रचित "कथा महोदधि", कवि कुंजर कृत "राजशेखर चरित", अज्ञात लेखक कृत "मुक्त चरित", नारायण शास्त्री रचित "कथा लतामञ्जरी," कृष्णराव कृत "कथा पंचक" पाण्डुरंग कृत "विजयपुर कथा" रामास्वामी शास्त्री कृत "कथावली" रामास्वामी शास्त्री कृत "कथावली" तथा "कथाकुसुममञ्जरी आदि।
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संस्कृत की लघु कथाओ के विकास का युग 19 वीं शताब्दी का अन्तिम दशक व 20 वीं शती का प्रारम्भिक काल कहा जा सकता है। सहस्त्राधिक लघु कथायें 1898 ई० से 1910 ई० के मध्य लिखी गई हैं जिनका स्वतन्त्र संग्रहों के रूप में प्रकाशन हुआ है। संस्कृत की लघु कथाओं से सम्बन्धित नौ संग्रह भी इसी समय में निकले हैं तथा दो संग्रह 1898 ई० मे प्रकाश में आये।¹ अम्बिका दत्त व्यास के "रत्नाष्टक" में हास्य व उपदेश प्रधान आठ कहानियों का सग्रह है तथा वेंकट रामशास्त्री के "कथा शतकम्" में देशी-भाषाओं की सौ लघु कथायें सन्निहित हैं। व्यास जी द्वारा कृत "कथा कुसुमम्" में भावपूर्ण कहानियो का समावेश है। 1900 ई० संस्कृत कथाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण वर्ष है, क्यों कि इस वर्ष तीन कथा संग्रह प्रकाश में आये।
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कथा संग्रह – केरल वर्मवलिय कोइतम्बुरान।
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कथा कल्पद्रुम – "अरेवियन नाइट्स" का अनुवाद – अप्पाशास्त्री राशिवडेकर।
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शेक्सपियर नाटक कथावली– मेरी लम्ब के "टेल्स फ्राम शेक्सपियर" का अनुवाद– मेडिपल्ली वेंकट रमणाचार्य।
इन सग्रहों में से प्रथम तो सामाजिक व मनोवैज्ञानिक लघु कथाओं का संग्रह है तथा अन्तिम दो अनूदित कृतियाँ हैं।
व० अनंताचार्य कोडम्बकम् ने 1901 ई० में "कथामञ्जरी" तथा "नाटक कथा" ये दो कथा सग्रह प्रकाश मे लाये। मन्दिकल राम शास्त्री की रचना "कथासप्तति" 1904 ई० में प्रकाश में आई तथा के० तिरुनारायण अयंगर की "गद्यकथा" संग्रह 1910 ई० मे प्रकाश में आयी। ये दो कहानी संग्रह इस युग के सर्वोत्कृष्ट संग्रह कहे जा सकते हैं।
¹ उद्धत 'आधुनिक संस्कृत साहित्य', डॉ० हीरालाल शुक्ल, रचना प्रकाशन 45ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद। प्रथम संस्करण 1971, पृष्ठ– 136-39
[ 24 ]
इसके अतिरिक्त सैकडो कथायें समयानुसार प्रकाशित हुईं जो निम्न वर्गों में विषयानुसार विभाजित की जा सकती हैं।
पौराणिक कथायें :
"मणिकुण्डलापाख्यान" "दधीच्युपाख्यान" तथा "पौराणिकी काचिकथा" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर), "उषाहरणम्" (उपेन्द्रनाथसेन कृत), "शिवहास्यम्" (मनुजेन्द्रदत्त कृत), "सत्यदेव-कथा" (रामावतार शर्माकृत), "भद्रसोमा" चारूचन्द्रवन्द्योपाध्याय कृत।
उपदेश प्रधान :
"अदूरदर्शिता", "संशयात्मा विनश्यति" (द्वारका नाथ शर्मा), "शत्रुसंकीर्णे कथ वस्तव्यम्" (नन्दलाल शर्मा) कृत, "दशापरिणति:", "चित्रकार चातुर्यम्", "कुटिल मतिनिमि गोमायु:", "बकचापलम्", "भगवद् भक्त:", "किमर्थ सद्गुरु:" (अप्पाशास्त्री राशिडेकर) कृत, "व्याघ्री विवाहार्थी शृगाल:", "वशीकृत भूत:", "धर्मस्यासूक्ष्मागति:", "ईश्वरस्यधनदानक्रम:" "राक्षसप्रश्नम्", "बुद्धिमाहात्म्यम्" (नयचन्द्र सिद्धान्त भूषण भट्टाचार्य) कृत।
भावात्मक और मनोवैज्ञानिक :
"मदीय: स्वप्न:" (रामनाथ शास्त्री), "सत्यो बालचर:" "विषया समस्या", "बालक भृत्य:" (भट्ट-मथुरानाथ शास्त्री), "साधुमणि:" (के० श्रीनिवास), "रामोनास्तीह भूतले" (उपेन्द्र चन्द्र व्याकरणतीर्थ), "छापापथ:" (चन्द्रचूड़ शर्मा), "प्राधान्यवाद:", "विप्रलब्धा:" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर) कृत।
[ 25 ]
हास्य एवं व्यंग्यपरक :
"लालाव्यायोगः", "चषण्डुकः", "शिष्या", "फाल्गुनी गोष्ठी" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "कलिप्रादुर्भाव" (वाई० महालिंग शास्त्री), "दर्दुर विलापः" (चन्द्रचूड़ शर्मा), "वेषमाहात्म्यम्", "व्यसन विमोक्ष", "पुरोहितधौर्त्यम्" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर)।
सामाजिक :
"अपत्यविक्रमः", "क्षुत्कथा", "दीनकन्यका" (विधुशेखर भट्टाचार्य), "वासन्ती" (दिवेन्द्र ब्रह्मचारी), "एकवार दर्शनम्", "दमनीया", "अनावृता" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "ममगृह रहस्यम्" (विश्वेश्वर शर्मा), "पल्लिच्छविः" (उपेन्द्र नाथसेन), "श्रीमती विद्यासुन्दरी देवी" (अप्पाशास्त्री राशिवडेकर), "स्त्री चरितम्", "नैष्ठिक ब्रह्मचारी", (चारूचन्द्र वन्द्योपाध्याय)।
प्रणय सम्बन्धी :
"प्रेमणः प्रतिदानम्", "दीक्षा" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री) "यथार्थ प्रेमिका", "आदर्श पतिः" (चारूचन्द्र वन्द्योपाध्याय)।
ऐतिहासिक :
"क्षत्रिय-पराक्रम" (हरिप्रसाद नर्मदेश्वर), "अंगुलिमालः", "पुरूराजः पौरूषम्", "भारतध्वजः", "विजयिघण्टा", "अत्याचारिणः परिणामः", "पृथ्वीराज पौरुषम्" "आल्हा च ऊदलश्च", "सिंह दुर्गे सिंह वियोगः", "वीरवाणी", "कृत्रिम वूनदी", "चिर अमर हवे बलिदाने", "सामन्त संग्रामः", "अनुपताः" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "बहूपचिकीर्षा-पन्नाधाय" (द्वारका नाथ शर्मा), "क्षत्रकथा-गौतम बुद्ध" (विधुशेखर भट्टाचार्य), "सयोगिता स्वयंवर" (परशुराम शर्मा वैद्य)।
[ 26 ]
द्वितीय अध्याय : कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना
विविध :
"दानी दिनेश.", "करूणा कपोती च युवती च" (भट्ट मथुरानाथ शास्त्री), "परिहासाचार्य", (परशुराम शर्मा वैद्य)।
मौलिक लेखन व अनुवाद की पद्धति के अतिरिक्त सार प्रस्तुतीकरण की पद्धति को भी इस युग के लेखको ने स्वीकार किया जो इस प्रकार है–
1 "रघुवंश सार"- (1900) दत्तात्रय वासुदेव निगुडकर 2. "भास कथा सार"- वाई महालिंग शास्त्री (1897–1965) 3 "कादम्बरीकथासार"- (1900)- नन्द लाल शर्मा 4. "चन्द्रापीड चरितम्"- (1909)- व० अनन्ताचार्य 5. "कादम्बरी कथासार"- आर०वी० कृष्णमाचार्य- (1874–1944) 6. "कादम्बरी कथासार"-त्रयंबक शर्मा काले- (1916) 7. "संक्षिप्त कादम्बरी"- (1916)- काशी नाथ शर्मा 8. "हर्षचरित सार"- व० अनन्ताचार्य 9. "हर्षचरित सार"-आर०वी०कृष्णमाचार्य- (1874–1944) 10 "उदयन चरितम्"-18 अध्याय व० अनन्ताचार्य।
[ 27 ]
द्वितीय अध्याय
कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना
''कथा की काव्यशास्त्रीय संघटना''
(क) काव्य-विभाजन में कथा का स्वरूप एवं स्थान :
(1) काव्य का स्वरूप :
काव्य शब्द 'कु शब्दे धातु से ण्यत्' प्रत्यय लगकर निष्पन्न होता है। काव्य के दो पक्ष हैं-(1) अनुभूति और (2) अभिव्यक्ति। कवि अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति के माध्यम से श्रोता, दर्शक या पाठक तक सम्प्रेषित कर उसे आनन्द मग्न करता है। अभिव्यक्ति के अनेक स्वरूप हो सकते हैं। यही कारण है कि साहित्य के अन्तर्गत काव्य एव काव्यशैलियों के अनेक रुप प्राप्त होते हैं। अनुभूतियों का ग्रहण नेत्रोन्द्रिय, श्रवणेन्द्रिय द्वारा होता है। इन्द्रियग्राहिता के आधार पर काव्यशास्त्रियों ने काव्य के दो भेद किये हैं-दृश्य एवं श्रव्य।¹
भरत ने दृश्य काव्य के पुनश्च दो भेद किये हैं-(1) रुपक (2) उपरुपक।
शैली के आधार पर श्रव्य काव्य के भी तीन भेद किये जा सकते हैं-(1) गद्य काव्य, (2) पद्य काव्य, (3) चम्पूकाव्य²।
कथा की अभिव्यक्ति प्राय. गद्य के माध्यम से होती आयी है किन्तु कभी-कभी उनमें गद्य के साथ पद्य का भी प्रयोग बहुतायत रुप में हुआ है।
(2) कथातत्व :
काव्य का वह अपरिहार्य तत्व है जिसके बिना काव्य रचना सम्भव नहीं है। कथातत्व काव्य का मूलाधार है। भारतीय वाङ्गमय में ही नहीं अपितु विश्व वाङ्गमय के अन्तर्गत किसी भी विद्या के ज्ञान हेतु चाहे वह दार्शनिक हो, साहित्यिक हो, अथवा भौतिक या अधिभौतिक हो कथा तत्व का आश्रय लिया जाता है। इस प्रकार साहित्य की प्रत्येक विधा में कथा तत्व का होना अनिवार्य है। अतैव दशरूपक-कार रूपकों के प्रमुख तीन तत्व मानते हैं-
- "दृश्यश्रव्यत्व भेदेन पुनः काव्यंद्धिधा मतम्।
दृश्यं तत्राभिनेयं तद्रूपारोपात्तु रूपकम्।।" ''नाट्यशास्त्रा''-32/385 - गद्यं पद्य च मिश्रं च तत् त्रिधैव व्यवस्थितम्।"-'काव्यादर्श'1/11.
1 वस्तु, 2 श्रोता, 3 रस।¹
अरस्तू ने भी-कथावस्तु को "ट्रेजडी" की आत्मा माना है। एक अतिलघु कथा का सूत्र कथातत्व से संयुक्त होने पर विशालग्रन्थ का आकार ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार कथातत्व काव्य का प्राण तत्व है।²
(3) कथातत्व एवं कथावस्तु में भेद :
संस्कृत आचार्यों ने कथातत्व को विभिन्न नामों से अभिहित किया है—"कथातत्व, वस्तु, कथानक, इतिवृत्त, कथावस्तु आदि" किन्तु सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनमें कुछ मौलिक भेद अवश्य है। "भरत ने कथावस्तु को इतिवृत्त कहा" ।³
"दशरूपककार धनञ्जय ने इसे वस्तु कहा"⁴
"साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ ने भी इसे वस्तु कहा"⁵ अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कथातत्व, वस्तु और इतिवृत्त का प्रयोग समान अर्थ में हुआ है और कथावस्तु या कथानक का प्रयोग दूसरे अर्थ में। वस्तुतः कथातत्व वह सूत्र है जिसके आधार पर किसी भी काव्य की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसी सूत्र को एक नाटककार—उसे नाटकीय लक्षणों से युक्त करके जब रचना करता है तो वह विधा नाटक कहलाती है। इसी प्रकार एक "महाकाव्यकार" उसे महाकाव्य के लक्षणों से
1 इत्याद्यशेषमिह वस्तुविभेदजात रामायणादि च विभाव्य वृहत्कथा च।
आसूत्रयेत्तदनु नेतृरसानुगुण्याच्चित्रा कथामुचितचारूवच प्रपञ्चैः।
"दशरूपक" प्रथमप्रकाश, कारिका 129, पृ0 106
2 "The plot contains the kernel of that action which is the busibess of tragedy to represent."
Poetry and Fine Art : Butcher Page 337.
उद्धत - "नाटक के तत्व-सिद्धान्त और समीक्षा", विष्णु कुमार त्रिपाठी, पृ0 661
3 "इतिवृत्त तु काव्यस्य शरीर परिकीर्तितम्।
पञ्चिभि सन्धिभिस्तस्य विभागाः परिकीर्तिताः ।। "
"इतिवृत्त द्विधा चैव ..... . .. ... .. .।"
भरत, "नाट्यशास्त्र", एकविंश अध्याय, श्लोक 1-2
4 वस्तुनेता रसस्तेषा भेदक' ।"
"वस्तु च द्विधा।" "दशरूपक", प्रथम प्रकाश, कारिका 16-17, पृ0 12
5 कथायां सरस वस्तु गद्यैरेव विनिर्मितम्- ।, साहित्य दर्पण' 6/332
[ 29 ]
युक्त करके उसमे रसभाव आदि के अनुसार परिवर्तन, परिवर्धन करता है तो वह रचना महाकाव्य बन जाती है ठीक इसी प्रकार कथाकार जब उसे कथा के वैशिष्ट्य से युक्त कर देता है तो वह रचना कथा कहलाती है। इस प्रकार एक कथासूत्र ही कथावस्तु का रूप ग्रहण करती है। इसी प्रकार कहा जा सकता है कथातत्व इतिवृत्त या Plot साहित्यिक आवरण ओढने से पूर्वावस्था का नाम है तथा कथावस्तु या कथानक साहित्यिक ढाँचे का नाम है।
कथावस्तु का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। सम्पूर्ण चराचर जगत आतिदैविक, आतिभौतिक, परिस्थितियाँ भौतिक सुख-दुःख, जन्ममृत्यु, जय-पराजय, उत्थान, पतन इत्यादि परिस्थितियाँ कथावस्तु के विषय बनकर कवि को काव्य निर्माण हेतु प्रेरणा प्रदान करती हैं। भूत-भविष्य वर्तमान की समस्त घटनायें कथावस्तु के अन्तर्गत समाहित होती हैं। इस प्रकार जीवन का कोई भी रहस्य संसार का कोई भी विषय कथावस्तु से अछूता नही है।
(4) कथावस्तु का महत्व :
समस्त संस्कृत वाङ्गमय "शिवेतरक्षतये" तथा "सद्यः परनिर्वृतयै" आदि महान उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सर्जित है। अतः संस्कृत साहित्य की प्रत्येक विधा में यह उद्देश्य कूट-कूट कर भरा है। संस्कृत-साहित्य की कथावस्तु में मानव की समस्त शाश्वत प्रवृत्तियों का चित्रण हुआ है। कुछ काव्याचार्यों ने चर्तुवर्ग फल प्राप्ति को ही काव्य का उद्देश्य माना था किन्तु अन्त में बात "सद्यः परनिर्वृतयै" अर्थात् लोकोत्तर आनन्द की प्राप्ति पर ही टिकती है। काव्य का यह उद्देश्य वस्तु के माध्यम से ही संभव होता है। अतः कथावस्तु के महत्व को सभी आचार्यों ने एक स्वर से स्वीकारा है।¹
1 "Tragedy is essentially an imitation not of persons out of action and life, of happiness and misery.......and gainth most powerful elements of attraction in a tragedy the peripeties and discovering are part of the plot" —Aristotle "on the art of poetry" Translated by Ingram by water.
[ 30 ]
(5) कथा का शास्त्रीय रूप :
"चितिपूजिकार्यकुम्बि चर्चिश्चेति" सूत्र से कथ–आङ्–टाप् प्रत्यय से कथा शब्द का निर्माण हुआ है।
कथा अभिव्यञ्जना की वह विधा है जिसके स्वरूप में अगणित विविधतायें समय-समय पर जुडती रहती हैं, यही कारण है कि कथा की कोई ऐसी परिभाषा जिसके माध्यम से कथा के सम्पूर्ण स्वरूप को समझा परखा जा सके, निर्मित नहीं हो सकी है। अधिकांश परिभाषा कथा के बाह्य स्वरूप को ध्यान में रखकर प्रस्तुत की गई है।
(6) कथा और आख्यायिका :
दण्डी, सुबन्धु और बाण से भी बहुत पहले कथा और आख्यायिका के नाम से गद्य–काव्य का भेद किया जाने लगा था और उनके विशिष्ट लक्षण निर्धारित हो चुके थे और कथाकारो द्वारा इनके पालन करने की अपेक्षा भी की जाती थी। सर्वप्रथम "अभिनवगुप्त" कथा और आख्यायिका का लक्षण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि—आख्यायिका उच्छ्वास, वक्त्र और अपरवक्त्र आदि छन्दो से युक्त होती है और जिनमें यह नही रहता वह कथा होती है।¹
"विद्यानाथ" भी अभिनवगुप्त का अनुसरण करते है, वे "हर्षचरित" को आख्यायिका के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं।²
कुमारस्वामी ने "प्रतापरुद्रयशोभूषण" की रत्नापण नामक टीका में कथा और आख्यायिका के स्वरूप का कथन तो किया है, किन्तु कोई नवीन बात न कहकर अभिनवगुप्त के ही मत का समर्थन किया है, साथ ही वे दण्डी के मत का अनुसरण करते हुए यह तर्क देते हैं कि कथा और आख्यायिका में केवल नाम मात्र का ही भेद है उनकी जाति में कोई अन्तर नहीं है, दोनों की जाति एक है। साहित्यदर्पणकार
1 "आख्यायिकोच्छ्वासदिना वक्त्रापरवक्त्रादिना च युक्ता। कथा तद् विरहिता।"
—'ध्वन्यालोक', तृतीय उद्योत, लोचन पृ० 324.
2 'वक्त्र चापरवक्त्र च सोच्छ्वासत्व भेदकम्।
वर्ण्यते यत्र काव्यज्ञैरसावाख्यायिका मता।।'
'यत्र वक्त्रापरवक्त्र नामानौ वृत्तविशेषौ वर्ण्येये
सोच्छ्वास परिच्छिन्नाख्यायिका हर्षचरितादि।'
—'प्रतापरूद्यशोभूषण' पृ० 96.
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विश्वनाथ ने विस्तारपूर्वक दोनो के स्वरूप का विवेचन किया। उनके अनुसार आख्यायिका कथा की भाँति ही गद्य का एक प्रकार है, जिसमें कवि के वंश का तो वर्णन रहता ही है साथ ही कहीं-कही अन्य कवियो का भी वर्णन होता है। यत्र-तत्र पद्य भी प्रयुक्त होते हैं और कथाशों का विभाजन आश्वासों में किया जाता है, आर्या, वक्त्र और अपरवक्त्र छन्दो मे से किसी एक छन्द द्वारा आश्वास के प्रारम्भ में किसी अन्य विषय के व्याज से वर्णनीय विषय की सूचना दी जाती है, उन्होंने आख्यायिका का उदाहरण "हर्षचरित" को रखा है।¹
कथा और आख्यायिका में भेद सिद्ध करते हुये आचार्य विश्वनाथ पुनः कहते हैं कि कथा में सरस इतिवृत्त होता है और उसमें आर्या, वक्त्र और अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग होता है। प्रारम्भ मे पद्यों द्वारा मङ्गलाचरण की योजना करने के पश्चात् खल-निन्दा, प्रशंसा आदि का भी उपन्यास किया जा सकता है।² आचार्य विश्वनाथ के अनुसार आर्या, वक्त्र और अपरवक्त्र छन्दों का व्यवहार, दोनों का प्रयोग कथा और आख्यायिका दोनों में हो सकता है, किन्तु आख्यायिका में इन छन्दों का प्रयोग आश्वास के प्रारम्भ मे कथावस्तु की सूचना देने के निमित्त किया जाता है जबकि कथा में इनका प्रयोग मङ्गलाचरण, निन्दा, खल-प्रशंसा आदि के विधान में किया जाता है।
काव्यालंकार मे भामह ने आख्यायिका का लक्षण प्रस्तुत किया है उनके अनुसार जिसके शब्द, अर्थ, तथा समास, अक्लिष्ट तथा श्रव्य हों, जिसका विषय उदात्त हो और जो उच्छ्वासों से युक्त हो, ऐसी गद्यमयी संस्कृत रचना आख्यायिका होती है। इसमें नायक अपने चरित्र का वर्णन स्वयं करता है तथा समय-समय पर घटित घटनाओं के
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"आख्यायिका कथावत् स्यात् कवेर्वंशानुकीर्तनम्।
अस्यामन्यकवीनांच वृत्तं पद्यं क्वचित्-क्वचित्।।
कथांशानां व्यवच्छेद आश्वास इति बध्यते।
आर्यावक्त्रापरवक्त्राणां छन्दसा येन केनचित्।।
अन्यापदेशेनाश्वासमुखे भाव्यर्थ सूचनम्।"
—"साहित्यदर्पण", 6/334-336
2 "साहित्य-दर्पण" परिच्छेद 6, पृ० 226.
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सूचक वक्त्र और अपरवक्त्र छन्द प्रयुक्त होते हैं। यह कवि के अभिप्राय विशिष्ट कथनों से युक्त और कन्याहरण, सग्राम, वियोग तथा उदय आदि से युक्त होती हैं।¹
विश्वनाथ द्वारा दिया गया आख्यायिका का लक्षण भामह के लक्षण से यत्किञ्चित मेल खाता है।
आचार्य रुद्रट ने कादम्बरी और हर्षचरित को लक्ष्य में रखकर कथा और आख्यायिका के भेद का निरूपण किया है। इनके द्वारा दिये गये आख्यायिका का लक्षण आचार्य विश्वनाथ और भामह द्वारा प्रतिपादित लक्षण का मिश्रित रूप कहा जा सकता है।²
आचार्य आनन्दवर्धन ने भी कथा और आख्यायिका मे भेद को स्वीकार करते हुए संघटना विवेचन के प्रङ्ग में इनका उल्लेख किया है। इनके द्वारा दिया गया आख्यायिका का लक्षण अन्य आचार्यों से पृथक है। आचार्य आनन्दवर्धन के अनुसार आख्यायिका में प्रचुरता से मध्यम समास युक्त या दीर्घसमास युक्त संघटना होती है, क्योंकि गद्य में काव्य–सौन्दर्य विकट वन्ध से आता है, कथा में विकट वन्ध का प्राचुर्य होने पर भी रस–वन्ध में कहे हुए औचित्य का अनुसरण करना चाहिए।³
-
'‘संस्कृतानुकूल श्रव्य शब्दार्थ पद वृत्तिना।
गद्येन युक्तोदात्तार्था सोच्छ्वासाख्यायिका मता।
वृत्तमाख्यायते तस्यां नायकेन स्वचेष्टितम्।
वक्त्राचापरवक्त्र च काले भाव्यर्थशाम्सि च।।
कवेरभिप्राय कृतै. कथनै. कैश्र्चिदकिता।
कन्याहरण संग्राम विप्रलम्भोदयान्विता।।'’
—भामह, 'काव्यालकार', 1/25–27 -
'‘पूर्वदेव नमस्कृत्य देवगुरूनौत्सिहेत् स्थितेष्वेपु।
काव्य कर्त्तुमिति कवी शसदाख्यायिकायां तु।।
तदनु नृपे वा भक्ति परगुणे सकीर्तनंऽथवा व्यसनम्।
अन्यद्वा तत्करणे कारणमाविल्ष्टमभिदध्यात्।।
अथ तेन कथैव यथा रचनीयाख्यायिकापि गद्येन।
निजवंशं स्वं चास्याभिदध्याल त्वगद्येन।।
कुर्यादितोच्छ्वासान् सर्वदवेषा मुखेष्वनाद्यानाम्।
द्वे द्वे चार्थे श्लिष्टे सामान्यार्थे तदर्थाय।।'’
........रुद्रट, काव्यालंकार, सत्यदेव चौधरी द्वारा सम्पादित, 16/24–27 -
'पर्यायबन्ध परिकथा खण्डकथा सकल कथे सर्ग बन्धोऽभिनेयार्थमाख्यायिका कथे इत्येवमादय ।'
... .... 'ध्वन्यालोक', तृ० 30, पृ० 323तथा
"आख्यायिकाया तु भूम्ना मध्यम समास दीर्घ समासे एव संघटने।
गद्यस्य विकट बन्धाश्रयेण छायावत्वात्। तत्र च तस्य प्रकृष्ट माणत्वात्।
कथायां तु विकटवन्ध प्राचुर्येऽपि गद्यस्य रसबन्धोक्तमौचित्यमनु सर्तव्यम्।”
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वामन कथा और आख्यायिका के भेद सम्बन्धी विचार को अधिक महत्व नहीं देते। उनके अनुसार काव्य के अन्य भेदों के सम्बन्ध में अन्य ग्रन्थों से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
आचार्य दण्डी कथा और आख्यायिका को पृथक भेद न मानकर दोनों को एक ही गद्यकाव्य का भेद स्वीकार करते हैं।¹
यद्यपि दण्डी के समय तक कथा और आख्यायिका ये दोनों विधायें पृथक रूप में प्रतिष्ठित हो चुकल थल किन्तु दण्डी इसके विरूद्ध थे। अतः उन्होंने दोनों में नाम-मात्र का अन्तर बताकर उन्हें एक सिद्ध करने का प्रयत्न किया। उनके द्वारा दिये गये विचार इस प्रकार हैं-
-
आख्यायिका का वर्णन सिर्फ नायक करता है, किन्तु कथा का वर्णन नायक के अलावा अपर व्यक्ति भी कर सकता है। नायक द्वारा अपने गुणों का वर्णन करना दोषपूर्ण नहीं, क्योंकि वह भूतार्थ शंसी (व्यतीत घटनाओं का वर्णनकर्ता मात्र) होता है। अतः आख्यायिका का वक्ता नायक ही हो यह अनिवार्य नहीं। अन्य व्यक्ति भी उसका वक्ता हो सकता है। इसलिए वक्ता का भेद दोनों को पृथक करने में समर्थ नहीं हो सकता।²
-
दण्डी के काल में यह धारणा थी कि आख्यायिका में ही कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ आदि विपत्तियों का वर्णन रहता है-कथा में नहीं।
.... "ध्वन्यालोक", तृ 30 पृ० 326-27.
1 ,, "तत्कथाख्यायिकेत्येका जातिः संज्ञा द्वयांकिता।
अत्रैवान्तर्भविष्यन्ति शेषाश्चाख्यान जातयः।। "काव्यादर्श" 1/282 ' 'इति तस्य प्रभेदौ द्वौ तयोराख्यायिका किल।।
नायकेनैव वाच्यान्या नायकेनेतरेण वा।
स्वगुणाविष्क्रिया दोषो नात्र भूतार्थशंसिन ।।
अपि त्वनियमो दृष्टस्तत्रान्यन्यैरूदीरणीत्
अन्यो वक्ता स्वयंचेति की दृग्वा भेदकारणम्।।'
"काव्यादर्श", 1/23-27.
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परन्तु ये विशेषतायें सर्गबद्ध महाकाव्य, खण्ड काव्यादि की हैं। सिर्फ आख्यायिका की ही विशेषतायें नहीं। यदि इनका प्रयोग कवि आख्यायिका मे कर सकता है तो कथा में भी स्वतन्त्र रुप में इनका प्रयोग कर सकता है।¹
-
आख्यायिका वक्त्र, अपरवक्त्र छन्दो से युक्त रहती है और कथा इससे रहित होती है। परन्तु दण्डी के अनुसार-जिस प्रकार कथा में आर्या आदि छन्दों का प्रयोग होता है, उसी प्रकार स्वरूप में कोई परिवर्तन किये बिना वक्त्र तथा अपरवक्त्र छन्दों का प्रयोग भी स्वतन्त्र रूप से किया जा सकता है। यदि पूर्वपक्षी यह प्रश्न उठाये कि आख्यायिका में उच्छ्वास होते हैं और कथा में लम्ब, लुम्बकादि तो दण्डी का उत्तर है कि कथांशो के विभाग को परिच्छेद, उच्छ्वास, अध्याय आदि नाम देने से कोई अन्तर नहीं पडता क्योकि यह तो सिर्फ नाम मात्र का भेद है, स्वरुपगत कोई भेद नहीं।²
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दण्डी के समय तक में आख्यायिका केवल संस्कृत में लिखी जाती थी और कथा पालि, अपभ्रंश, संस्कृत में लिखी जाती थी।³ आख्यायिका राजवंशानुकीर्तन से सम्बद्ध होने के कारण संस्कृत में लिखी जाती थी किन्तु कथा लोक काव्य भी लोकप्रिय थी, जबकि राज्याश्रित कवि आख्यायिका को ही अपनाते थे। दण्डी ने कथा को विशेष महत्व दिया, कथा के प्रति अपना आग्रह दिखाकर लोक-काव्य को प्रोत्साहन एवं
1 '’कन्या हरण संग्राम विप्रलम्भोदयादयाः।
सर्गबन्ध समा एव नैते वैशेषिका गुणः।।'’
'काव्यादर्श', 1-24.
2 '’वक्त्र चापरवक्त्रं चा सोच्छ्वासत्व च भेदकम्
चिह्नममाख्यायिकायाश्च प्रसंगेन कथास्वपि।।
आर्यादिवत् प्रवेशः कि न वक्त्रापर वक्त्रयो।
भेदश्च दृष्टो लम्भादिरुच्छ्वासो वास्तु कि ततः।।'’ - 'काव्यादर्श', 1/26-27
3 '’कथा हि सर्वभाषाभिः संस्कृतेन च बध्यते।'’ - 'काव्यादर्श', 1-38
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संवर्धन प्रदान किया, इसलिए उन्होंने अपने निष्कर्ष में कथा को प्रथम स्थान दिया।¹ इसके विपरीत भामह ने आख्यायिका को ऊँचा ले जाने का प्रयास किया।
- दण्डी के समय तक यह धारणा भी प्रचलित थी कि कवि अपने अभिप्राय विशिष्ट कथनो का प्रयोग कथा में ही करता था, आख्यायिका में नहीं। किन्तु इस वैशिष्ट्य से कथा और आख्यायिका में भेद स्थापित नहीं किये जा सके। इस प्रकार के अभिप्राय गर्भित चिन्हों का प्रयोग अनेक प्रबन्धों में हुआ है। जैसे-भारवि ने सर्ग की समाप्ति वाले छन्द में "लक्ष्मी" शब्द का प्रयोग किया है और माघ ने "श्री" शब्द को।² अतः इस भेद को उचित नहीं माना जा सकता है।³
(ख) शुकसप्तति-परिचय :
(1) कर्ता : शुकसप्तति एक रोचक और लोकप्रिय कथा-संग्रह है। विश्वसनीय एवं समापेक्षित सामग्रियों के अभाव ग्रस्तता के कारण शुकसप्तति के लेखक के सम्बन्ध में कुछ भी सुनिश्चित कह पाना संभव नहीं है। शुकसप्तति के प्राप्त संस्करणों में भी इसके कर्ता का नामोल्लेख नहीं मिलता। संस्कृत साहित्य के इतिहासकार भी सर्वथा मौन साधे हुए हैं ऐसी परिस्थिति में इसका कर्ता कौन था यह कह पाना कठिन है। सिर्फ इतना ही पता चलता है कि हेमचन्द्र ने (1088–1172 ई०) में इसका वर्णन किया है।⁴
(2) काल : शुकसप्तति के कर्ता के समान इसका काल भी अनिश्चित है। ए०बी० कीथ के अनुसार-इसका अस्तित्व हेमचन्द्र द्वारा 12 वीं शताब्दी में प्रमाणित
1 'तत्कथाख्यायिकेत्येका जातिः संज्ञा द्वयांकिता।'
2 S.K. De, "Some Problems of Sanskrit poetics". P. 67. Foot Note
3 "कविभावकृतं चिह्नमन्यत्रापि न दुष्यति।
मुखमिष्टार्थ संसिद्धौ किं हि न स्यात् कृतात्मनाम्।।"
4 Hemachandra (1088-1172 A D.) was aware of its existence. The work must have been composed before 1000 A D
A History of the Sanskrit Literature by V Varadacari, Page 125, शुकसप्ततिः, पेज संख्या 17, व्याख्याकार-रमाकान्त त्रिपाठी।
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