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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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1 वस्तु, 2 श्रोता, 3 रस।¹

अरस्तू ने भी-कथावस्तु को "ट्रेजडी" की आत्मा माना है। एक अतिलघु कथा का सूत्र कथातत्व से संयुक्त होने पर विशालग्रन्थ का आकार ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार कथातत्व काव्य का प्राण तत्व है।²

(3) कथातत्व एवं कथावस्तु में भेद :

संस्कृत आचार्यों ने कथातत्व को विभिन्न नामों से अभिहित किया है—"कथातत्व, वस्तु, कथानक, इतिवृत्त, कथावस्तु आदि" किन्तु सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इनमें कुछ मौलिक भेद अवश्य है। "भरत ने कथावस्तु को इतिवृत्त कहा" ।³

"दशरूपककार धनञ्जय ने इसे वस्तु कहा"⁴

"साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ ने भी इसे वस्तु कहा"⁵ अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि कथातत्व, वस्तु और इतिवृत्त का प्रयोग समान अर्थ में हुआ है और कथावस्तु या कथानक का प्रयोग दूसरे अर्थ में। वस्तुतः कथातत्व वह सूत्र है जिसके आधार पर किसी भी काव्य की रूपरेखा तैयार की जाती है। इसी सूत्र को एक नाटककार—उसे नाटकीय लक्षणों से युक्त करके जब रचना करता है तो वह विधा नाटक कहलाती है। इसी प्रकार एक "महाकाव्यकार" उसे महाकाव्य के लक्षणों से


1 इत्याद्यशेषमिह वस्तुविभेदजात रामायणादि च विभाव्य वृहत्कथा च।
आसूत्रयेत्तदनु नेतृरसानुगुण्याच्चित्रा कथामुचितचारूवच प्रपञ्चैः।
"दशरूपक" प्रथमप्रकाश, कारिका 129, पृ0 106
2 "The plot contains the kernel of that action which is the busibess of tragedy to represent."
Poetry and Fine Art : Butcher Page 337.
उद्धत - "नाटक के तत्व-सिद्धान्त और समीक्षा", विष्णु कुमार त्रिपाठी, पृ0 661
3 "इतिवृत्त तु काव्यस्य शरीर परिकीर्तितम्।
पञ्चिभि सन्धिभिस्तस्य विभागाः परिकीर्तिताः ।। "
"इतिवृत्त द्विधा चैव ..... . .. ... .. .।"
भरत, "नाट्यशास्त्र", एकविंश अध्याय, श्लोक 1-2
4 वस्तुनेता रसस्तेषा भेदक' ।"
"वस्तु च द्विधा।" "दशरूपक", प्रथम प्रकाश, कारिका 16-17, पृ0 12
5 कथायां सरस वस्तु गद्यैरेव विनिर्मितम्- ।, साहित्य दर्पण' 6/332

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