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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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संस्कृत की लघु कथाओ के विकास का युग 19 वीं शताब्दी का अन्तिम दशक व 20 वीं शती का प्रारम्भिक काल कहा जा सकता है। सहस्त्राधिक लघु कथायें 1898 ई० से 1910 ई० के मध्य लिखी गई हैं जिनका स्वतन्त्र संग्रहों के रूप में प्रकाशन हुआ है। संस्कृत की लघु कथाओं से सम्बन्धित नौ संग्रह भी इसी समय में निकले हैं तथा दो संग्रह 1898 ई० मे प्रकाश में आये।¹ अम्बिका दत्त व्यास के "रत्नाष्टक" में हास्य व उपदेश प्रधान आठ कहानियों का सग्रह है तथा वेंकट रामशास्त्री के "कथा शतकम्" में देशी-भाषाओं की सौ लघु कथायें सन्निहित हैं। व्यास जी द्वारा कृत "कथा कुसुमम्" में भावपूर्ण कहानियो का समावेश है। 1900 ई० संस्कृत कथाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण वर्ष है, क्यों कि इस वर्ष तीन कथा संग्रह प्रकाश में आये।

  1. कथा संग्रह – केरल वर्मवलिय कोइतम्बुरान।

  2. कथा कल्पद्रुम – "अरेवियन नाइट्स" का अनुवाद – अप्पाशास्त्री राशिवडेकर।

  3. शेक्सपियर नाटक कथावली– मेरी लम्ब के "टेल्स फ्राम शेक्सपियर" का अनुवाद– मेडिपल्ली वेंकट रमणाचार्य।

इन सग्रहों में से प्रथम तो सामाजिक व मनोवैज्ञानिक लघु कथाओं का संग्रह है तथा अन्तिम दो अनूदित कृतियाँ हैं।

व० अनंताचार्य कोडम्बकम् ने 1901 ई० में "कथामञ्जरी" तथा "नाटक कथा" ये दो कथा सग्रह प्रकाश मे लाये। मन्दिकल राम शास्त्री की रचना "कथासप्तति" 1904 ई० में प्रकाश में आई तथा के० तिरुनारायण अयंगर की "गद्यकथा" संग्रह 1910 ई० मे प्रकाश में आयी। ये दो कहानी संग्रह इस युग के सर्वोत्कृष्ट संग्रह कहे जा सकते हैं।


¹ उद्धत 'आधुनिक संस्कृत साहित्य', डॉ० हीरालाल शुक्ल, रचना प्रकाशन 45ए, खुल्दाबाद, इलाहाबाद। प्रथम संस्करण 1971, पृष्ठ– 136-39

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