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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

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अमानवीय तत्वो की स्थिति अपने यहाँ बनाये रखते हुए भी मनुष्य की दिलचस्पी मनुष्य में बढ़ने लगी होगी और यह संस्कार उगने लगा होगा कि इनका अस्तित्व मानव में सोयी शिथिल भाव या क्रिया तरङ्गों को जगह देता है। उसी दिन कथा साहित्य के प्रथम सुप्रभात का आर्विभाव हुआ होगा, और उसी दिन कथा साहित्य ने प्रथम किरणें देखी होगी।¹

प्रारम्भ मे कथायें मौखिक रूप मे प्रचलित रही होगी जिनके विषय अधिकांशतः परी, प्रेत आदि रहे होंगे। वस्तुतः इस प्रकार की कहानियों के कथन द्वारा व्यक्ति आनन्द का अनुभव करता रहा होगा। यही कारण है कि सभ्य एवं असभ्य सभी जातियाँ कहानी कथन के द्वारा अपना, अपने परिवारजनों एवं मित्रों का मनोरञ्जन करती थी। यह प्रवृत्ति विश्व के अन्य भाषाओ के कथा-साहित्य के विकास के प्रसङ्ग में भी देखी जा सकती हैं।

वस्तुतः कथाओं का प्रारम्भ मनुष्य की कौतूहल या कौतुक प्रवृत्ति के फलस्वरूप ही हुआ। इस तथ्य का समर्थन "पंडित बलदेव उपाध्याय" ने भी किया है।² इस प्रकार संस्कृत साहित्य के अन्तर्गत एक नवीन काव्य विधा का जन्म हुआ। वस्तुतः कथा मनुष्य की स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति के प्रागट्य का एक साहित्यक माध्यम है।

(1) कथा का प्रारम्भिक स्वरूप :

अतीत में जाने पर यह बात स्पष्ट होती है कि आरम्भिक काल में कथायें कथन और श्रवण की परम्परा से व्यवहृत होती हुई व्यक्ति के जिज्ञासा, मनोरञ्जन और आत्मपरितोष का साधन थीं, जैसे-जैसे मानव सभ्यता एवं समाज का विकास होता गया वैसे-वैसे इन कथाओं का सम्बन्ध मानव जीवन की अनुभूतियों एवं वाह्य


1 श्री देवराज, "कथा साहित्य में मेरी मान्यतायें" पृ. 17-26
2 संस्कृत साहित्य का इतिहास- पं बलदेव उपाध्याय

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