भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

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(ब) कथा-ज्ञान का माध्यम :

वस्तुत. कथाये सुनने के बाद मनुष्य का ज्ञानार्जन होता रहा होगा। जैसे-रामायण में राम-सीतादि की कथा सुनने के बाद सामान्य जन को उनका अनुकरण करने की सीख मिलती थी। "हितोपदेश" आदि की कथायें भी इसी श्रेणी में आती हैं।

(स) कथा मनोरञ्जन का माध्यम :

जबसे मानव का जन्म हुआ होगा, तबसे लेकर आज तक प्रायः लोग खाली समय व्यतीत करने के लिये कहानियों के माध्यम से अपना मनोरञ्जन करते आये हैं। ज्यादातर किसी बात को समझाने के लिये भी कहानियों का उदाहरण देकर ही लोग अपनी बात को मनोरञ्जन ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

(3) कथा के भेद :

वैदिक काल से लेकर सम्पूर्ण वाङ्गमय मे प्राप्त कथाओं को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है- (i) अद्भुत कथा, Fairy Tales (ii) लोककथा Marchen, (iii) कल्पित कथा Myths, (iv) पशुकथा Fables । सूक्ष्म विवेचन के आधार पर सम्पूर्ण कथा-साहित्य को दो भागो मे बांटा जा सकता है -

(i) नीतिकथा--जिसके अन्तर्गत उपदेशात्मक पशु कथायें भी आ सकती हैं।

(ii) लोककथा- जिसके अंतर्गत समस्त प्रकार की अद्भुत, कल्पित एवं काल्पनिक आदि कथाओं को संगृहीत किया जा सकता है।

कथा का विभाजन भारतीय दृष्टि से "नीतिशास्त्र" और "अर्थशास्त्र" के रूप में भी किया जा सकता है। "अर्थशास्त्र" के अन्तर्गत राजनीतिक, दैनिक जनजीवन की झाँकी तथा जीवन के भौतिक मूल्यों का विवेचन रहता है। नीतिशास्त्रों तथा धर्मशास्त्रों में प्रतिपादित जीवन के उदात्त दृष्टिकोणों के संकलन एवं उद्देश्य का वर्णन रहता है।

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