शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वभाव की यात्राओ, घटनाओं आदि पर निर्भर करती हैं। बहुत सारी कथाओं में कल्पना द्वारा अनेक प्रकार से उतार-चढ़ाव विस्तार एवं भौतिक घटनाओं से रहित जैसे-आकाशीय, पर्वतीय, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, राक्षस आदि प्राणियो से संबंधित इतिवृत्त पायी जाती हैं। इसमे धर्म-प्राण भारतीयों की धार्मिक भावना ही मूल कारण है।
अद्भूत-कथा, लोक-कथा, कल्पित-कथा, पशु एवं विभिन्न जीव-जन्तु कथाओं के आधार पर कथा-साहित्य का स्वरूप अनेक रूप धारण किये हुए साहित्य मे अपना प्रभाव डालता है। जिनके द्वारा नीति-शास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र एवं जनजीवन की झोंकी लिए भौतिक मूल्यो का विवेचन होता है।
लोककथाओं में प्रयोजन एवं पात्रों की दृष्टि से नीतिकथा एवं दन्तकथा का अनेक प्रकार से विभाग किया जा सकता है। साधारणतः मनोरञ्जक तत्व कथाओं में सर्वत्र उपलब्ध होता है किन्तु उसका परम उददेश्य नीति का उपदेश एवं शिक्षा ही मानी जा सकती है। जन्तुकथा में पात्र पशु-पक्षी हुआ करते हैं जिनके द्वारा किसी खास शिक्षा का बोध कराया जाता है। साथ ही साथ विभिन्न पशु-पक्षियों के स्वभाव आदि की जानकारी से अत्यन्त आनन्द का विषय बनता है। मानवीय कथाओं के द्वारा लोक-व्यवहार नीति, सदाचार का उपदेश लोक प्रसिद्धि मनुष्यों के सम्बन्ध में किवदन्तियों के द्वारा इतिवृत्त बडे ही रोचक ढंग से ग्रथित होता है।
अतिमानवीय कथाओं में यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, अप्सरायें, उत्तलिकायें, भूत, पिशाच, बेतालों, आदि के द्वारा आश्चर्यचकित कर देने वाली घटनाओं के वर्णन से सृष्टि के रहस्यात्मक पक्ष को अत्यन्त रोचक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इसके साथ-साथ मानव के उदात्त-चरित्र को भी कहीं-कहीं पर उजागर किया जाता रहा है।
सस्कृत-साहित्य में कथा-साहित्य के बीज अपने विविध रूप धारण किये हुए वेद साहित्य से ही प्रारम्भ होते हैं। इसमें कोई आश्चर्य एवं जिज्ञासा का विशेष तात्पर्य नहीं है। ऋग्वेद में दार्शनिक सूक्तों का तत्वतः उपनिषदों के विवेचनों से सम्बद्ध है
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