शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस सम्बन्ध मे भानु जी ने अपना मत व्यक्त किया है।¹ कोलाहलाचार्य श्री भानुजी के मत से सहमत हैं। इन सबका यही अर्थ है कि यद्यपि कथा कल्पना प्रसूत होती है फिर भी उसमे यत्किंचित् अंश सत्य का भी समाहित रहता है।²
“इस तरह आगे चलकर तीर की गति से निरन्तर कुछ दूर तक चलकर समाप्त हो जाने वाली सीधी-सादी कथा की अवतारणा के कारण व्यापकता तथा विस्तार ने आगे चलकर घनत्व का स्थान ले लिया और जटिलता की तुलना में सरलता का आदर बढ चला पर यह अनिवार्य नहीं कि कथा का स्वरूप सीधा-सादा ही हो।
(5) संस्कृत साहित्य में प्राप्त कथाओं के विविध रूप :
संस्कृत-साहित्य में कथा-विधा में प्रकृति के अनुसार अनेकरूपता मिलती है। प्राचीनतम् साहित्य में इसका कलेवर प्रायः पद्यात्मक ही मिलता है। संभवतः इसके पीछे तत्कालीन सूत् या कथाविद् प्रचलित गाथाओं का गायन किया करते हैं। यही रहस्य संभावित है जिनमें संगीतात्मकता था तथा जिनमे संगीत का पुट अवश्य ही पाया जाता था। नीति-कथाओं में प्रायः गद्यात्मक शैली का निवेश पाया जाता है। उपदेश या शिक्षा के लिए पद्य का प्रयोग ज्यादा होता आया है। इसके पीछे भी बड़ी वैज्ञानिकता है जो अलग चिन्तन का एक विषय है।
“बृहत्कथामञ्जरी”³ अथवा “कथासरित्सागर” जो अत्यन्त प्राचीन कथासाहित्य के उदाहरण स्वरूप पद्यात्मक ही हैं। प्रारम्भ में परिस्थितिवश एवं वर्णनीय विषय की आवश्यकता के अनुसार प्रायः कथायें लघु आकार की हुआ करती थीं जिनमें मुख्यतः कथा का तत्व एवं इतिवृत्त प्रमुख हुआ करता था। कालान्तर में वर्णनशैली के प्रभाव से इसमें बहुत बदलाव आया है। उपर्युक्त शैली के कारण कथाओं के आकार एवं तथ्यों पर भी सुविस्तृत प्रभाव पड़ा है ऐसी कहानियाँ प्रायः पराक्रम, समुद्रयात्रा अथवा विभिन्न
- एकज्ञात सत्यार्थ भूतायाः कथायाः। प्रबन्धस्य कल्पना रचना स्तोक सत्या यथा कादम्बर्यादिः।। बी०राघवन, 'भोजराज श्रृंगार-प्रकाश', पृष्ठ 615 पर उद्धत।
- “प्रबन्ध कल्पनायां प्राक् सत्यां सुज्ञा कथां विदुः।" - बी० राघवन, "भोजराज श्रृंगार प्रकाश" पृष्ठ 615 पर उद्धत।
- गुणादय
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