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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

हे मदनावतार!, तुम्हारी कीर्ति समुद्र के भयंङ्कर ग्राहों से व्याप्त जल को लाँघ जाती है, निराधार आकाश में स्थित होती है, दुर्गम पर्वतों के शिखर पर चढ़ जाती है, विषैले सर्पों से व्याप्त पाताल लोक को अकेले चली जाती है, अतः मैं समझता हूँ कि स्त्रियो का भय कृत्रिम होता है।

ऐसा सुनकर राजा ने रानी को उस पण्डित के हाथ पकड कर सौप दिया। अब पण्डित राजा की कृपा से उसके साथ सुख भोगने लगा।

कथा- 58

“दुःशीला पति और गणपति की कथा“

लोहपुरी नामक नगर मे राजड नाम का एक नीची जाति का व्यक्ति था। उसकी पत्नी दुःशीला पर पुरुषों में अत्यन्त आसक्ति रखती थी। वह पद्मावती पुरी सूत बेचने जाया करती थी। एक दिन उन सभी ने गणेश जी को मनौती मानी। उसने चुम्बन की मनौती मानी। गणेश जी ने सभी का लाभ कराया। तब सभी ने अपनी-अपनी मनौती गणेश जी को दिया। जब दुःशीला की बारी आयी तो विनोद प्रिय गणेश जी ने उसका अधर धर लिया। यह सारा कथा सखियों ने उसके पति को जाकर सुनाया। यह सुनकर उसने गणेश जी के सामने एक गधा के साथ रमण करना प्रारम्भ कर दिया। तब गणेश जी को हँसी आ गयी। उनके हँसने से दोनों होंठ शिथिल हो गये। इस प्रकार वह छूटकर गणेश जी को प्रणाम कर अपने पति के घर चली गयी।

इस प्रकार जो समयोचित कार्य करता है उसका यही फल होता है कि वह समय की परख रखने वाला व्यक्ति कदापि नष्ट नहीं होता।¹


1 समयोचितमारम्भं कुरुते यस्तु कृत्यवित्।
सर्वदा तु फलं तस्य समयज्ञो हि शिष्यते।
शुकसप्तति' श्लोक सं० 278, पृ०सं० 237

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