शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकथा- 63
"शकटाल और चाणक्य की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि- जिस प्रकार शकटाल ने अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए उत्पन्न दुःख को चाणक्य के द्वारा नन्दकुल को उच्छिन्न कर दुःख का शमन किया उसी प्रकार यदि तुम भी करना जानती हो तो जाओ। अन्यथा तुम्हारा दूसरे के घर जाना युक्त नहीं है।
कहा गया है- जिसका परिवार तारागण है, जो औषधियों का स्वामी है, शरीर जिसका अमृतमय, जो कान्ति से युक्त है- ऐसा चन्द्रमा भी सूर्यमण्डल में जाकर कान्तिरहित हो जाता है। अतः यह सत्य है कि दूसरे के घर जाकर सभी लघुता को प्राप्त होते हैं।¹
कथा- 64
"मण्डुका और उसकी सखी देविका की कथा"
शुक ने प्रभावती से कहा कि-कूटपुर नामक गाँव में सोमराज नामक राजपूत था। जिसकी पत्नी मण्डुका बड़ी सुन्दर तथा परपुरुषों में आसक्त रहती थी। उसका उपभोग, संकेतित एक मनुष्य, घण्टा लिए, रात मे घर के आँगन में किया करता। एक दिन उसके पति ने घण्टे का शब्द सुनकर बैल के आने का सन्देह कर हाथ में लाठी लेकर दौड़ा।
मण्डुका के पति को घण्टा के शब्द का अनुसरण कर आता देखकर देविका नामक सखी ने उसे भगाकर घण्टा हाथ में ले लिया और कहा-
1 उडुगणपरिवारो नायकोऽप्योषधीना-
ममृृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः।
भवति विकलमूर्तिमण्डलं प्राप्य भानोः
परसदननिविष्टः को न धत्ते लघुत्वम् ।।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 307, पेज सं० 257
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