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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

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जो आचार्य रस को विषयिगत मानते है, वे रस को वस्तु में नहीं अपितु व्यक्ति की चेतना मे स्थापित करते हुए नाट्य.सौन्दर्य या काव्य सौन्दर्य जनित आनन्दानुभूति को ही रस की सज्ञा देते है। आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, मम्मट, विश्वनाथ तथा पंडित राजजगन्नाथ आदि आचार्यों को रस का यही स्वरूप मान्य है इस प्रकार आनन्दवर्धन से लेकर अद्यतन यही परिभाषा रस विश्वजनीन-सी हो गयी है। इनके अनुसार रस स्थायीभाव का आनन्दमय आस्वाद्य रूप है।

रस के अंङ्ग :

रस के प्रमुख तीन अंङ्ग हैं-विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारीभाव इन सबके सामान्य गुण-योग से ही रस-निष्पत्ति सम्भव बताई गयी है।¹

1- विभाव : लोक मे प्रचलित हेतु, कारण अथवा निमित्त शब्दों के लिए रस शास्त्र में पृथक रूप से 'विभाव' शब्द को ग्रहण किया जाता है। शास्त्र में वाचिक, आङ्गिक एव सात्विक अभिनय के सहारे चित्तवृत्तियों का विशेष रूप से विभावन अथवा ज्ञापन कराने वाले हेतु, कारण अथवा निमित्त को विभाव कहते हैं। 'विभावन' का अर्थ केवल ज्ञापन नहीं अपितु उसका अर्थ आस्वाद योग्यता तक पहुँचाना भी है। अतएव हम कह सकते हैं कि विभाव वासना-रूप में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से अवस्थित रति आदि स्थायी भावों को आस्वाद योग्य बनाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-आलम्बन, उद्दीपन। चित्तवृत्ति-विशेष के विषयभूत विभाव को आलम्बन कहते हैं और उस निमित्त रूप सामग्री को जिससे जागृत भाव अधिकाधिक उद्दीप्त होता है-उद्दीपन विभाव कहते हैं।² आलम्बन के दो भेद होते हैं-विषय तथा आश्रय, इत्यादि भावों के जागृत होने के कारण-स्वरूप विभाव ही विषय कहलाते हैं तथा जिस व्यक्ति में स्थायीभाव जागरित होते हैं, वह उनका आश्रय होने से आश्रय कहलाता है।³


1 नाट्यशास्त्र, पृष्ठ-80
2 रसगङ्गाधर, पृ० 33
3 सा० कौ०, पृ० 29

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