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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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आचार्य मम्मट ने विप्रलम्भशृङ्गार को अभिलाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास, तथा, शाप, पाँच, प्रकार का माना है।$^1$ जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि मुख्य कथा शुकसप्तति के अन्तर्गत प्रवास विप्रलम्भ का दिग्दर्शन हुआ है। मदनविनोद और प्रभावती की इस कथा मे आश्रय प्रभावती ओर आलम्बन मदनविनोद है, पत्नी को विदेश छोडकर जाना उद्दीपन विभाव है, प्रभावती का उदास रहना, चिन्ता करना, कुमार्ग पर जाने के लिए उद्यत होना आदि अनुभाव हैं, चिन्ता, दैन्य, चपलता मोह आदि व्यभिचारी भाव हैं।

शुकसप्तति के अधिकांश कथाओं में मुख्य रूप से संयोग शृङ्गार का वर्णन कवि ने किया है। पति के कार्यवश विदेश चले जाने पर अथवा कार्यवश घर से बाहर जाने पर उनकी पत्नियों काम सन्तप्ता होकर व्यभिचार मार्ग का अवलम्ब लेती हैं। इसीलिये अधिकांश कथायें शृङ्गारिक अनुभावों से भरी पडी हैं। इन कथाओं में कही-कहीं आश्रय, नायिका हैं और आलम्बन उपपति है तो कहीं पर पुरूष आश्रय और परकीया नायिका आलम्बन है। जैसे-

द्वितीय कथा: में वीर नामक यशोदेवी का पुत्र आश्रय है और आलम्बन शशिप्रभा है। आश्रय वीर द्वारा भोजन आदि न करना अपनी हृदय पीड़ा को माता से निवेदन करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्याभिचारीभाव है।

तृतीय कथा : में कुटिल नामक धूर्त विमल का रूप धारण करने वाला आश्रय है और आलम्बन विमल की दोनों पत्नियाँ हैं जिसे देखकर कुटिल धूर्त के हृदय में कामभावना जागृत होती है। धूर्त विमल का दोनों पत्नियों के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चतुर्थ कथा : में शूर विष्णु नामक ब्राह्मण आश्रय है और गोविन्द नामक मूर्ख की पत्नी विषकन्या आलम्बन है, जिसे देखकर विष्णु के हृदय में काम भावना जागृत


1 अभिलाषविरहेर्ष्याप्रवासशापहेतुक इति पञ्चविधः।
काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, पृ० 123 ।

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