शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंअन्ततोगत्वा हम यही कह सकते है कि शुकसप्तति में वर्णित 70 कहानियों में प्राय अधिकांश कहानियाँ श्रृंगार रस, विशेष रूप से संयोग श्रृंगार से परिपूर्ण हैं। सिर्फ कुछ ही कथाओं में भय,वीर आदि रसों के अल्प रस का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं। जिनमे स्पष्ट रूप से रस का चित्रण नहीं है इसलिए उन कहानियो का वर्णन नही किया गया है।
(द) अलंकार :
'अलंङ्कारोति इति अलङ्कार.' अथवा 'अलंङ्क्रियते अनेन इति अलंकारः' अर्थात् अलङ्कार वह है, जो किसी वस्तु की शोभा बढ़ाये अथवा जिसके द्वारा किसी वस्तु की शोबाबढाई जाये।
जिस प्रकार लोक व्यवहार में कटक, कुण्डल आदि आभूषण पुरूष या रमणी के शारीरिक शोभा को बढाकर उसके भीतरी सौन्दर्य को भी निखार देते हैं, उसी प्रकार काव्य में वर्णित अलंकार कविता-कामिनी के शरीर स्थानी शब्द और अर्थ की शोभा बढाकर उसके माध्यम से काव्यात्मा रस के भी उपस्कारक होते हैं।
वस्तुत. काव्य में वर्णित अलङ्कार सम्पूर्ण काव्य के शोभावर्धक न होकर, काव्य में वर्णित, काव्य मे निहित किसी तत्व विशेष की शोभा बढ़ाते हैं। अतः आचार्य मम्मट अलङ्कार को परिभाषित करते हुए कहते हैं-
उपकुर्वन्ति त सन्त येऽङ्द्वारेण जातुचित्।
हारादिवदलङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः।¹
शुकसप्तति में काव्यात्मा रस के उपस्कारक रूप में अलंङ्कारों का वर्णन हुआ है। कहीं भी अलङ्कारों के अत्यधिक प्रयोग के कारण बोझिल कविता दृष्टिगोचर नहीं होती। सरल प्रवृत्ति के अलङ्कारों का प्रयोग कर कवि ने भाषा को सहज गति प्रदान
1 काव्य प्रकाश, अष्टम उल्लास, सूत्र स० 87, पृष्ठ सं०, 381
[ 154 ]