भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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पृष्ठ 170

निदर्शना का लक्षण :

अभवन् वस्तुसम्बन्ध उपमापरिकल्पकः निदर्शना।¹

जहाँ वस्तुओ का परस्पर सम्बन्ध सम्भव (अबाधित) अथवा असम्भव (बाधित) होता हुआ उनके बिम्ब-प्रतिविम्बभाव का बोधन करे वहाँ निदर्शना अलङ्कार होता है।

जैसे-

विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता।
अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हन्तुं किं नाम पौरुषम्।।²

विश्वास करने वाले व्यक्ति को धोखा देना कौन सा पाण्डित्य है? अंक में स्थित सोये व्यक्ति को मारना कौन सी पौरुष की बात है?

रूपक का लक्षण :

तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।³

उपमान और उपमेय का (जिनका भेद प्रसिद्ध है उनका सादृश्यातिशयवश) जो अभेद (वर्णन) है वह रूपक अलंकार है। जैसे-

धूर्तोऽसौ मत्सुतालुब्धो धनहीनो भवत्यसौ।
मनोभवग्रहग्रस्तो असमञ्जसमीदृशम।⁴

यह धनहीन धूर्त कामदेव रूप ग्रह से ग्रस्त हो मेरी पुत्री पर लुब्ध होता है- उसके साथ रमण करना चाहता है। इस प्रकार यह युक्ति युक्त बात नहीं है (जो हमें चोरी लगा रहा है)।

सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां
लज्जां तावद्विधत्ते विनयमति समालम्बते तावदेव।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 148 पृष्ठ स० 474
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 71 पृष्ठ स० 55-56
3 काव्यप्रकाश, सूत्र स० 138 पृष्ठ स० 463
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 72 पृष्ठ स० 56

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