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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 208 में से

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अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार का लक्षण·

अप्रस्तुतप्रशंसा या सा सैव प्रस्तुतताश्रया।¹

प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति कराने वाली (प्रस्तुताश्रया) जो अप्रस्तुत (अर्थ) की प्रशंसा (वर्णन) है वह ही अप्रस्तुतप्रशंसा अलङ्कार है। जैसे—

द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात्।
आनीय झटिति घटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूतः।।²

अनुकूल दैव दूसरे द्वीप से, समुद्र के मध्य से, दिगन्त से अभीष्ट अथवा प्रिय को अकस्मात शीघ्र लाकर मिला देता है।

(य) “छन्द” :

संस्कृत साहित्य में काव्य की मुख्यतया दो विधायें मानी गई हैं— (1) पद्य काव्य (2) गद्य काव्य और इन्हीं दोनों काव्यों के मिश्रण से चम्पूकाव्य की रचना हुई है।

काव्य के अपेक्षित उपादान—सगुण, दोष–रहित तथा अलङ्कृत शब्दार्थ माने गये हैं, परन्तु पद्य काव्य के लिये जिस उपादान की आवश्यकता पड़ती है वह है 'छन्द' अर्थात् पद्यकाव्य मे गुणो के अतिरिक्त मात्रा, वर्ण, संख्या, यति, विराम, लय आदि की भी आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति छन्दोनियम द्वारा होती है। पद्य का ही दूसरा नाम छन्द है।

छन्द दो प्रकार के माने गये गये हैं—

(1) वैदिक छन्द (2) लौकिक छन्द।

लौकिक छन्दों की उत्पत्ति वैदिक छन्दों से हुई है तथापि लौकिक छन्द वैदिक छन्दो से अधिक भिन्न होते हैं। वैदिक छन्दों में पादों की रचना अक्षर संख्या पर निर्भर है, उनमे लघु, गुरू, वर्ण तथा गण आदि का विचार नहीं किया जाता है। इसके विपरीत लौकिक छन्दों में ये सभी नियम अनिवार्य हैं, साथ ही प्रत्येक लौकिक छन्द में


1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 150, पृष्ठ सं० 476
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 61, पृष्ठ स० 47

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