शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिजान्वयप्रणीतं यः सम्यग्धर्मं निषेवते।
उत्तमाधममध्येषु विकारेषु पराङ्मुखः।¹
स गृही स मुनिः साधु स च योगी स धार्मिक ः।
पितृशुश्रूषको नित्यं जन्तुः साधारणश्च यः।²
अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह आदर्श दर्शाया गया है कि सभी प्रकार के विकारो से रहित होकर जो मनुष्य अपने कुल का धर्मपूर्वक पालन करता है वही सच्चा गृहस्थ है, साधु है।
व्याघेन बोधितस्तेन स ययौ गृहमात्मसमः
अभवत्कीर्तिमॉल्लोके परतः कीर्तिभाजनम् ।³
अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह बताया गया है कि पूज्य का सम्मान न करने से मनुष्य को सम्मान की प्राप्ति नहीं होती।
तावत्पिता तथा बन्धुर्यावज्जीवति मानवः।
मृतो मृत इति ज्ञात्वा क्षणात्स्नेहो निवर्तते ।।⁴
इस छन्द के द्वारा प्रस्तुत श्लोक मे समझाया गया है कि जीवित रहने पर ही अपनो का स्नेह रहता है, मरने पर नहीं।
कौतुकान्वेषिणो नित्यं दुर्जना व्यसनागमे।
मासोपवासिनी यद्वद्वणिक्पुत्रकचग्रहे ।।⁵
उपरोक्त अनुष्टुप छन्द के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि विपत्ति आ पड़ने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं, कोई सहायता नहीं करता है।
प्रपच्छ सा तदा सार्धं पुश्चलीभिः कृतादरा।
ससम्भ्रमा जगादेदं किमिदं भाषितं शुकः।⁶
1 शुकसप्तति., श्लोक सं० 3, पृष्ठ सं० 5
2 शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 4, पृष्ठ सं० 5
3 शुकसप्तति, श्लोक सं० 6, पृष्ठ सं० 6
4 शुकसप्तति, श्लोक सं० 7, पृष्ठ स० 7
5 शुकसप्तति, श्लोक सं० 8, पृष्ठ सं० 9
6 शुकसप्तति., श्लोक सं० 9, पृष्ठ सं० 9
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