शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्रग्धरा (प्रत्येक चरण में इक्कीस अक्षर)
म्रभ्नैर्यानां त्रायेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्।¹
जिसके चारो चरणो मे क्रमश मगण, रगण, भगण, नगण तथा तीन यगणों से युक्त और तीन बार मुनि अर्थात् (7) सख्यक अक्षरों पर यति हो ऐसी छन्द रचना को स्रग्धरा कहा जाता है। जैसे–
सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवित पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां । लज्जां तावद्विधत्ते विनयमपि समालम्बते तावदेव । भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपक्ष्माण एते यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति ।²
प्रस्तुत श्लोक में स्रग्धरा छन्द के माध्यम से पुरुषों की सीमाओं एवं उसके धैर्य का वर्णन किया गया है।
इन्द्रवज्रा (प्रत्येक चरण मे ग्यारह अक्षर)
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।³
जिस छन्द के प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण तथा दो गुरू वर्ण क्रमशः हों, उसे इन्द्रवज्रा छन्द कहते हैं। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होता है। जैसे–
इन्दात्प्रभुत्वं ज्वलनात्प्रतापं क्रोधं यमाद्वैश्रवणाच्च वित्तम् । सत्त्वस्थिरे रामजनार्दनाभ्यामादाय राज्ञः क्रियते शरीरम् ।।⁴
प्रस्तुत छन्द के माध्यम से राजा के शरीर की रचना कैसे होती है यह बताया गया है।
1 वृत्तरत्नाक, 3/104
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 118 पृष्ठ स० 99
3 वृत्तरत्नाक, 3/23
4 शुकसत्तति, श्लोक स० 49 पृष्ठ स० 39
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