शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
पृष्ठ 191, कुल 208 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवि ने किया है। ग्रन्थकार ने सूक्तियों का प्रयोग पद्यात्मक एवं गद्यात्मक दोनों रूपों में किया है।
सज्जनो का व्यवहार किस तरह होता है इस तरह की भी सूक्तियाँ कुछ श्लोकों में दृष्टव्य हैं-
सज्जनों के प्रति :
सज्जन तीर्थरुप होते हैं, सज्जनों का दर्शन पवित्रकर होता है। सज्जन तीर्थों से भी बढकर होते है क्योकि तीर्थ तो कुछ समय मे फलदायी होते हैं परन्तु सज्जनों का समागम तत्काल फल देता है।¹
दुष्टो की सङ्गति से सज्जन भी विकार को प्राप्त हो जाते हैं। दुर्योधन का साथ करने से भीष्म गायों को हरने के लिये गये थे।²
इसी प्रकार मनुष्य को एक दूसरे के प्रति किस प्रकार का व्यवहार रखना चाहिये इसके लिये भी विभिन्न प्रकार की सूक्तियाँ शुकसप्तति ग्रन्थ में कही गयी हैं।
यथा-
(अ) व्यवहारिक सूक्तियाँ :
सत्कर्म के बल से गर्वयुक्त धीर सदा निर्दोष एवं भय रहित होते हैं और कुकर्म में संलग्न सत्रस्त पापी-जन सदा सर्वत्र शंका युक्त ही होते हैं।³
1 साधुना दर्शनं पुण्य तीर्थभूता हि साधवः।
तीर्थं फलति कालेन सद्य साधुसमागमः।
— शुकसप्तति, श्लोक सं० 316, पृष्ठ स० 264
2 असता सङ्गदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम्।
दुर्योधनप्रसङ्गेन भीष्मो गोहरणे गतः।।
— शुकसप्तति, श्लोक सं० 336, पृष्ठ स० 279
3 सर्वत्र शुचयो धीरा सुकर्मबलगर्विता ।
कुकर्मभयसन्त्रस्ताः पापाः सर्वत्र शङ्किता ।।
— शुकसप्तति, श्लोकसं० 323, पृष्ठसं० 272
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