शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसोपचाराणि वाक्यानि शत्रूणामिह लक्षयेत्।
अविचारितगीतार्था मृगा यान्ति पराभवम्।।$^1$।।
संसार में शत्रुओं के सत्कारपूर्वक वचनों को समझना चाहिए। गीत का प्रयोजन न सोचने के कारण ही मृग विपत्ति में फँस जाते है।
चन्दनं शुचिवस्त्रं च पानीयं शुचि शीतलम्।
सेव्यमानोऽपि मधुरः शुचिर्जयति नान्यथा।$^2$
ग्रीष्म ऋतु को सेवन किया जाता हुआ चन्दन, उज्जवल शीतल वस्त्र, पवित्र एवं शीतल जल, ओदन तथा चन्द्रमा ही जीतता है, अन्यथा वह जीता नहीं जा सकता।
नासाहसं समालम्ब्य नरो भद्राणि पश्यति।
साहसी सर्वकार्येषु लक्ष्मीभाजनमुत्तमम्।$^3$
बिना साहस का आश्रय लिए मनुष्य का कल्याण नहीं होता। जो सब कामों में साहसी होता है वही लक्ष्मी को प्राप्त कर पाता है।
भूमेश्च देशस्य गुणान्वितस्य भृत्यस्य वा बुद्धिमread बुद्धिमतः प्रणाशे।
भृत्यप्रणाशे मरणं नृपाणां नष्टापि भूमिः सुलभा न भृत्याः।$^4$
देश की भूमि तथा गुणशाली एवं बुद्धिमान् सेवक के विनाश में (भूमि का विनाश ठीक है किन्तु ऐसे सेवक का नहीं क्योंकि) ऐसे भृत्य का विनाश होने पर राजा का ही विनाश हो जाता है और नष्ट हुई भूमि पुनः मिल सकती है किन्तु ऐसे भृत्यों का विनाश होने पर पुनः मिलना सम्भव नहीं।
1 शुकसप्तति, श्लोक स० 122, पृष्ठ स० 106
2 शुकसप्तति., श्लोक स० 141, पृष्ठ स० 117
3 शुकसप्ततिः, श्लोक स० 155, पृष्ठ स० 124
4 शुकसप्तति., श्लोक सं० 231, पृष्ठ स० 199
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