शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतरुणी रमणी रतिरम्यतरा प्रमदा सुखदा च सदा समदा।
यदि सा सुभगा हृदये निहिता क्व जयः क्व जय. क्व जयः क्व जयः।¹
युवावस्था को प्राप्त, रमण करने योग्य, रति से भी अधिक रम्य, सुख देने वाली, सदा काम-मद से युक्त सुन्दरी प्रमदा यदि हृदय में बस गयी तो फिर जय कहाँ? (तब तो महान व्यक्ति की भी पराजय निश्चित है)।
(र) गद्यात्मक सूक्तियाँ :
निजशरीरस्य कतिचिद्दिनस्थायियौवनस्य पुराषान्तररमणाद् गृहाण फलम्।²
अन्य पुरुष के साथ रमण करती हुई अपने शरीर, जिसका यौवन कतिपय दिनों तक ही स्थिर रहेगा का फल प्राप्त कर ले।
युक्तमिदं कर्तव्यमेव परं दुष्करं निन्दितं च कुलस्त्रीणाम्।³
कुल स्त्रियों (उच्चकुल में उत्पन्न हुई) के लिये यह कर्म दुष्कर एवं निन्दित है।
व्यसनागमे, यदा कस्यचिदुपरि विपद् आपतति तदा दुर्जना. दुष्टाः नित्यम्।⁴
विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं (कोई सहायता नहीं करता)।
यो दान कुर्यात्स भवेत्सर्वसम्पदां स्थानम्।⁵
जो दान करता है वह सकल सम्पत्तियों का आगार होता है।
यतो राज्ञां दुष्टनिग्रह. शिष्टपालनं च स्वर्गाय।⁶
1 शुकसप्तति., श्लोक स० 338, पृष्ठ स० 280.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 7.
3 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 8.
4 शुकसप्तति., पृष्ठ सं० 9.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 16.
6 शुकसप्तति., पृष्ठ स० 20.
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