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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

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पृष्ठ 203

कृतक मन्ये भयं योषिता।¹

स्त्रियो का भय कृत्रिम मानता हूँ।

दुर्लभोऽय बुधः। सुलभाः खलु नार्य।²

यह विद्वान दुर्लभ है, नारियाँ तो सुलभ होती हैं।

ततः स्त्रीणां वशगः को न विडम्बितः।³

स्त्रियों के अधीन होकर कौन तिरस्कृत नहीं होता।

यतः सता सन्नतगात्रि सङ्गतं मनीषिभिः।⁴

सज्जनो के साथ सात पग चलने मात्र से अथवा सात वाक्य बोलने मात्र से मित्रता हो जाती है।

य. कश्चिद्धितं वाक्यं शृणोति करोति च स शर्मभाग्भवति।⁵

जो कोई हितवाक्य सुनता है और तदनुसार कार्य करता है वह इस लोक तथा परलोक मे कल्याण का भागी होता है।

सत्यस्य वाचो वक्ता श्रोता च न लभ्यते।⁶

सत्य की बात कहने वाला और सुनने वाला दोनो नहीं मिलते।

(ल) ‘‘पद्यात्मक सूक्तियाँ ‘‘प्राकृत भाषा में’’ :

छिज्जउ सीसं अह होउ बन्धणं चअउ सव्वहा लच्छी।
पडिवण्णपालणे सुपुरिसाणं जं होउ तं होउ।¹


1 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 233.
2 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 234.
3 शुकसप्तति, पृष्ठ सं० 241
4 शुकसप्ततिः, पृष्ठ स० 265.
5 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 272.
6 शुकसप्तति, पृष्ठ स० 273.

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