शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार उस व्याध से समझाया गया वह अपने घर गया और माता-पिता की सेवा कर ससार में कीर्तिमान हुआ और मृत्यूपश्चात भी अपने यशः शरीर से अमर हो गया।¹
इसलिए "तुम अपने कुल क्रमागत वणिग्धर्म का स्मरण करो तदनुसार कर्म करो और माता-पिता के प्रति विनयशील बनो।"²
इस प्रकार उपदिष्ट हुआ वह मदनविनोद माता-पिता को नमस्कार कर उनकी आज्ञा लेकर, पत्नी से पूछकर एवं विदा होकर नौका द्वारा विदेश चला गया।
तत्पश्चात् व्यभिचार मार्ग पर जाने के लिए उद्यत प्रभावती से शुक कहता है—तुम कुमार्ग पर मत जाओ अन्यथा पराभव का पात्र होगी। क्योंकि—
विपत्ति आ पडने पर दुष्ट तमाशा ही देखना चाहते हैं (कोई सहायता नहीं करता) जैसे भास भर की भूखी पूर्णा दूती, बनिये के लडके के केश पकड़ कर उसकी पत्नी खींचने लगी तो वह तमाश ही देखती रही।
तब उस प्रभावती ने शुक का समादर करते हुए घबडा कर "यह आख्यान कैसे है"—पूछा। तो शुक ने कहा—
चन्द्रावती पुरी में भीम नामक राजा था। उस पुरी में मोहन नामक सेठ का सुधन नामक पुत्र था। वह उस नगर के निवासी हरिदत्त की पत्नी लक्ष्मी के साथ रति-क्रीडा करना चाहता था किन्तु लक्ष्मी सहमत नहीं थी। तब उस सुधन ने मास भर की भूखी पूर्णा नाम की स्त्री के पास जाकर उसे खूब धन देकर, जब हरिदत्त नगर से बाहर गया तब दूती बनाकर भेजा। उसने भी प्रिय बचनों से लक्ष्मी को प्रसन्न
1 व्याधेन बोधितस्तेन स ययौ गृहमात्मनः।
अभवत्कीर्त्तिमाँल्लोके परतः कीर्त्तिभाजनम्।।
शुकसप्ततिः श्लोक स० 6, पेज पृष्ठ 6,
2 तस्माद्वणिग्धर्मं स्वकुलोद्भवं स्मर पित्रोश्च विनयपरो भव।
शुकसप्ततिः पृष्ठ सं० 8,
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