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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

तब ग्राम के मुखिया ने मोहिनी समेत विष्णु को पकड लिया। पूछने पर विष्णु ने उत्तर दिया कि मैने इसे विवाहा है। मेरी भार्या को मार्ग मे देखकर यह पथिक इसे ग्रहण करना चाहता है। गोविन्द ने भी पूछने पर यही उत्तर दिया। मन्त्री ने दोनों का एक ही उत्तर सुनकर जाति आदि पूछा, तीनों एक ही उत्तर देते हैं। पुनः मन्त्री ने पूछा कि तुम लोगों का यात्रा में कितने दिनों से साथ हुआ। उन लोगों ने कहा प्रातः भोजन के पश्चात साथ हुआ। तब मन्त्री ने पृथक-पृथक दोनों ब्राह्मणों से पूछा-मोहिनी ने भोजन के समय क्या भोजन किया। मोहिनी के भोजन के विषय में गोविन्द ही जानता था। दूसरा नही। तब वह दूसरा मन्त्री से निरादृत हुआ। तब मन्त्री ने गोविन्द को शिक्षा दी की इस ब्राह्मणी को धिक्कार है। इस लोक एवं परलोक में दुखदायिनी इस स्त्री का तुम परित्याग कर दो।¹

लेकिन वह नहीं माना और उस मोहिनी को लेकर चला और मार्ग में उसी के लिए मार डाला गया।

इसलिए हे देवी! वृद्धों के सिखाने पर भी जो इस प्रकार उनके वचनों का तिरस्कार करता है वह गोविन्द ब्राह्मण की भाँति नष्ट हो जाता है।

कथा- 5

"बालपण्डिता की कथा"

उज्जायिनी नाम की नगरी का राजा विक्रमादित्य था जिसकी रानी का नाम कामलीला था। एक दिन भोजन के समय राजा ने रानी को कुछ मछलियाँ खाने को दिया जिसे रानी ने खाने क्या छूने से भी इन्कार कर दिया। तब वे मछलियाँ हँसने


¹ धिग्मा ब्राह्मणी परत्रेह च दुःखदा मुञ्च शीघ्रम्।
शुकसप्ततिः, पृष्ठ स० 28

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