भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 208 में से

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उसने वैसा ही किया। इसी बीच मोहिनी ने जार को छोडकर भीतर बँधे कुत्ते के पट्टे की जिह्वा को पकडकर उसी प्रकार सो गयी। हाथ में छडी और दीप लेकर आये पति ने पूछा-क्या यह कुत्ते की जिह्वा? यहॉ कैसे?

पत्नी ने कहा-वह भूखा है। इससे मुक्त की गयी चाटने से यह दुर्बल है।

इस प्रकार कथन प्रतिकथन से वह मोहिनी से पराजित हो गया और लज्जित होकर सो गया।

कथा- 28

"देविका और प्रभाकर ब्राह्मण की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि -कुहाड ग्राम मे जरसाख्य नाम का महामूर्ख गृहस्थ रहता था। उसकी पत्नी का नाम देविका पुँश्चली था। उसके साथ प्रभाकर नाम का विप्र गुप्त स्थान में रमण करता था। इस बात को लोगों के द्वारा सुनने के बाद वह स्वयं देखने के लिए गया। वृक्ष पर चढ़कर उसने वैसा ही देखा। देखकर पेड़ पर स्थित ही उसने कहा-धूर्ति के! बहुत दिनों के बाद आज पकड़ मिली हो।

तब उस गृहस्थ की पत्नी ने चतुराई से उस जार को भेज दिया और जब पति पेड से उतरा तो उसने उलाहना देते हुए कहा-स्वामी यह वृक्ष ही ऐसा है कि इस पर चढ़े व्यक्ति को मिथुन जोड़ा दिखाई पड़ता है।

तब पति ने कहा-तुम चढ़कर देखो।

उसने वैसा ही किया और वृक्ष पर चढ़कर कहा बहुत दिनों बाद अन्य नारी के साथ गमन करते हुए दिखाई पड़ रहे हो।

उस मूर्ख ने इस बात को सत्य समझा और उसे शान्त कर घर ले गया।

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