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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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जब वह बाजार गयी तो वही पर गेहूँ खरीदते समय उसने उपपति को देखा और संकेत द्वारा अपने पास बुलाया और गेहूँ की गठरी बाजार में छोड़कर उसके साथ चली गयी। मौका पाकर बनिये ने गठरी से गेहूँ निकालकर उसमें धूल भर दिया और बहुत देर से आने के कारण वह गठरी बिना देखे ही घर लेकर आयी। जब सास ने गठरी खोल कर देखा तो उसमें धूल, तब सास ने बहू से पूछा- यह क्या? तब उसने बताया कि मात' मेरे हाथ से बाजार के कुछ आगे ही द्रम्म पृथ्वी पर गिर पडे थे। इसलिए मैं धूल ही उठा लायी तब वह धूल में द्रम्म न देखकर बहुत दुःखी हुई।

कथा- 33

"मालिनी और रम्भिका की कथा"

शंखुपुर नगर में शकर नामक सम्पतिशाली माली था। उसकी पत्नी रम्भिका को रति अत्यन्त प्रिय थी और वह अनेक पुरुषों से सम्बन्ध रखती थी। एक दिन शंकर के घर में श्राद्ध दिवस था, उस दिन उसकी पत्नी बाजार में फूल बेचने गयी वही पर ग्राम मुख्य, वणिकपुत्र, अंकरक्षक तथा सेनाध्यक्ष चार उपपतियों को पृथक-पृथक अपने घर आने के लिए आमन्त्रित किया। वे चारों एक दूसरे के अमन्त्रण का ज्ञान नहीं रखते थे।

दूसरे दिन जब माली फुलवारी में चला गया, तभी वणिक् पुत्र उसके घर स्नान, भोजन, रमण के उद्देश्य से आया। इधर वणिक् आधा ही स्नान किया था कि दरवाजे पर ग्राममुख्य आता दिखाई पड़ा। उसको देखकर भययुक्त वणिक् उसी स्थिति में बाँस के एक झावे में बैठा दिया गया। ग्राममुख्य भी आधा ही नहा चुका था कि बाहर अंकरक्षक आ गया। उसे देखकर उसे झावे में बैठा दिया गया और कहा गया कि नीचे सर्पिणी ने बच्चे दिये हैं। अंगरक्षक भी आधा स्नान ही कर चुका था कि बलाध्यक्ष को देखकर उसे बर्तनों के समूह के बीच स्थापित कर दिया गया। माली को आता देख बलाधिप भी वहीं स्थापित किया गया। तब माली और अन्य बहुत से लोगों

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