शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीड़ा भी दूर करनी पडती है, हलवाहे का यह वचन सुनकर, "यह निर्दोष है" अतः लोगो का कथन मिथ्या मानकर शूरपति लज्जित हो घर गया।
कथा- 38
"प्रियंवद विप्र और खटिया के पावे की कथा"
देवि! प्राचीनकाल में प्रियंवद नामक पथिक विप्र था। एक बार मार्ग में जाते हुये, सुदर्शन गाँव मे किसी बनिये के घर पहुँचा। उसकी पत्नी पुँश्चली व्यभिचारिणी थी। रात में उस ब्राह्मण ने कामातुर हो उससे रति याञ्चा की और बनिये के बाजार जाने पर अँगूठी देकर उसके साथ रतिक्रीडा की। प्रातः उसने अँगूठी माँगी किन्तु उसने नहीं दिया।
जब माँगने पर भी उसने नहीं दिया तब वह ब्राह्मण चारपाई का एक पाया लेकर बनिये के पास गया और पाया दिखाकर रोने लगा।
उसने कहा इस पाया के टूट जाने पर तुम्हारी स्त्री ने मेरी अंगूठी ले ली। वह बनियाँ उसके कथन को सुनकर भार्या से बोला-ऐसा प्रमाद करने पर हमारे घर कोई पथिक नहीं आयेगा।
ऐसा निष्ठुर वचन सुनकर भूमि के गड्ढे से अँगूठी निकालकर पथिक के हवाले कर दिया और वह अपने अभीष्ट स्थान को चला गया।
कथा- 39
"भूधर वणिक् और उसकी तराजू की कथा"
कुण्डिन नगर में भूधर नाम का एक पथिक पुण्यनाश होने से धनहीन हो गया था। लोगों ने उसे त्याग दिया।
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