श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 100, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ वा मुच्यत इति संसारमोक्ष- | किस साधनसे वह मुक्त होता है इस | प्रकार संसार और मोक्षका हेतु हेतुप्रदर्शनायाह— | दिखलानेके लिये श्रुति कहती है— सर्वाजीवे सर्वसंस्थे बृहन्ते अस्मिन्हंसो भ्राम्यते ब्रह्मचक्रे । पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति ॥ ६ ॥ जीव अपनेको और सर्वनियन्ता परमात्माको अलग-अलग मानकर इस समस्त भूतोंके जीवननिर्वाहक ( भोगभूमि ) और सबके आश्रयभूत ( प्रलयस्थान ) महान् ब्रह्मचक्रमें भ्रमता रहता है; और जब उससे अभिन्नरूपसे सेवित होता है तब अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ सर्वाजीव इति । सर्वेषामाजी- | 'सर्वाजीवे' इत्यादि । जिसमें समस्त वनमस्मिन्निति सर्वाजीवे । सर्वेषां | भूतोंका जीवन है उस सर्वाजीव | तथा जिसमें सबकी संस्था—समाप्ति संस्था समाप्तिः प्रलयो यस्मि- | यानी प्रलय होती है उस सर्वसंस्थ न्निति सर्वसंस्थे । बृहन्तेऽस्मि- | बृहन्त ( महान् ) ब्रह्मचक्रमें हंस- | जीव, संसारमार्गमें हनन—गमन न्हंसो जीवः । हन्ति गच्छत्यध्वा- | करता है इसलिये जीव हंस कहा नमिति हंसः । भ्राम्यतेऽनात्म- | जाता है, भ्रमता रहता है, अर्थात् | अनात्मभूत देहादिको आत्मा मानता भूतदेहादिमात्मानं मन्यमानः | हुआ देवता, मनुष्य एवं तिर्यगादि सुरनरतिर्यगादिभेदभिन्नानायो- | भेदोंवाली अनेकों योनियोंमें भ्रमण | करता है । इसी प्रकार भ्रमण करता निषु । एवं भ्राम्यमाणः परिवर्तत | हुआ सब ओर भटकता रहता है— इत्यर्थः । | ऐसा इसका तात्पर्य है ।